गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

हिंदुस्तान करवट ले रहा है

                         हिंदुस्तान करवट ले रहा है

   भारतीय राजनीति में लम्बे समय से कायम गतिरोध में थोड़ी हलचल आई है और उसकी प्रकृति भारतीय समाज में उभर रहे एक नए मध्यवर्ग की आकांक्षाओं को अपने में समाहित करती है . क्या यह कोई तात्कालिक घटना है या इसकी कोई गहरी पृष्ठभूमि भी है? क्या हमें इसके लिए बदलते युवा भारत की उस पीढ़ी के चरित्र को समझने की जरुरत नहीं है जिसका एक बड़ा हिस्सा मानसिक विचारों के स्तर पर मध्यवर्गीय है लेकिन अपनी अंतर्वस्तु या वस्तुस्थिति में सर्वहारा है . ऐसा सर्वहारा जो लगातार अपनी पूंजी खोता जा रहा है उसका लगातार अवमूल्यन हो रहा है . दो साल पहले चले देशभर में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का अगुआ कौन था ? इसकी शुरुवात किसने की . दिल्ली का बैरिकेड किसने तोडा किसने कहा कि भ्रष्टाचार केवल भारतीय समाज के नैतिक पतन भर का मामला नहीं है वह नीतिगत मामला है . आखिर नैतिकता का भी कोई आर्थिक राजनैतिक आधार होता है की नहीं?धर्मों  के उदय ने इस बात को साबित किया कि जो उनके उपदेश थे वे किन्हीं खास सामाजिक राजनीतिक परिस्थितियों की ही उपज थे .ऐसे में आम आदमी पार्टी के उदय की परिघटना और इसका संसदीय राजनीति में आम जनता के सवालों को भारतीय राजनीति का मुख्य एजेंडा बना देना क्या कोई चमत्कारिक घटना है ? क्या यह भारतीय वामपंथ के हाशिये पर चले जाने के कारण उत्पन्न गैप को भरने की सफलतापूर्ण कोशिश है ? या अब पुराने ज़माने की कार्यशैली वाली कम्युनिष्ट पार्टियों के दिन लद गए? क्या यह लम्बे समय से तीसरे मोर्चे की जरुरत की प्रखर पार्टीगत अभिव्यक्ति है? जिसने कार्पोरेट फासीवाद की प्रबल आशंका और उदारवादी छुपे रुस्तम फासीवाद की बढती गति को एक ब्रेक दिया है . क्या अब यह समय भारत में वामपंथ के पुनर्विचार का समय है ? इसी तरह के ढेरों सवालों के बीच यदि हम आम आदमी पार्टी की दिल्ली में सफलता को देखें तो यह हमें पुनर्चिन्तन पर विवश करती है. सबसे पहला सवाल कि आम आदमी पार्टी ने वह क्या सपना दिखाया जनता को जो और लोगों ने नहीं दिखाया? जनता के किस हिस्से ने इस पार्टी को बनाने में अपना योगदान दिया और किस हिस्से ने इसकी जीत को मुकम्मल बनाया.इस पार्टी ने सबसे पहला वादा किया कि वह भ्रष्टाचार दूर करेगी इसके लिए वह सरकार में आते ही कुछ ही दिनों में जनलोकपाल बिल पारित करेगी . दिल्ली में जिस तरह से इसको सफलता मिली है क्या यह सफलता पुरे देश के स्तर पर मिल पायेगी ? जिस तरह के सवाल इसने उठाये हैं क्या इन्हीं सवालों पर पुरे देश में राजनीति की जा सकती है ? क्या जो सवाल उत्तर प्रदेश और बिहार का है क्या वही सवाल कश्मीर और मणिपुर का भी है ? इन सवालों के बावजूद इसने तो भारत के उन लोगों को संबोधित किया है जो सही मायने में तीसरे विकल्प की तलाश कर रहे थे . इसने शहरी मध्यवर्ग को संबोधित किया है. जब मैं शहरी मध्यवर्ग कह रहा हूँ तब उसमे फैक्टरी मजदूर से लेकर घरों में काम करने वाले मजदूर सभी शामिल हैं. आखिर यह कैसे संभव हुआ की भ्रष्टाचारी और भ्रष्टाचार से लड़ने वाला दोनों की चहेती पार्टी आम आदमी पार्टी बन गयी. क्या यह विनोवा भावे की भूदान आन्दोलन की रणनीति की याद नहीं ताजा कर देती है. मजदूरों ने भ्रष्टाचार को अपने जिंदगी से जोड़कर कैसे सूत्रबद्ध किया होगा और इस पार्टी को जीताने का निर्णय लिया होगा ? क्या उसमे यह बात निहित नहीं है कि उसकी जिस न्यूनतम मजदूरी को उसका मालिक पूरा नहीं देता वही उसके लिए भ्रष्टाचार है और इसी भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने गुस्से की  अभिव्यक्ति उसने दिल्ली चुनाव में किया है. 
 आम आदमी पार्टी ने अपना प्रयोग महानगर में किया इसको जहाँ निचले स्तर के मजदूरों ने समर्थन किया वहीँ कारखाना मालिकों ने भी इसका समर्थन किया. यह किस बात को दिखाता इससे कोई यदि यह निष्कर्ष निकाले कि अब वर्गीय राजनीति की सम्भावना और जरुरत खत्म हो गयी तो सायद यह ठीक नहीं है. कुछ लोग इस सफलता से इतने अभिभूत हैं कि वे यह मानने लगे हैं कि अब भारतीय राजनीति में वर्ग की राजनीति का भविष्य संकट पूर्ण हो गया है. लेकिन ऐसे लोग भी हैं जो यह मानते हैं कि वर्ग की राजनीती की प्रासंगिकता ख़त्म नहीं हुई है. डॉ बजरंग बिहारी तिवारी का मानना है कि ‘ आम आदमी पार्टी के जो मुद्दे हैं वे वामपंथियों के ही मुद्दे हैं. वामपंथियों द्वारा जनता की नब्ज पकड़ने में चुक हुई है. नयी पीढ़ी की जो आमद वामपंथ में होती थी वह रुकी हुई है. एक बड़ा तबका आया है जो अपने ओरिएंटेशन में वामपंथी है लेकिन सैद्धांतिक रूप से उसका वह स्तर नहीं है . आम आदमी पार्टी का एफ डी आई के खिलाफ बोलना यह साबित करता है कि उसके नजर में वर्ग का भी सवाल है . वह कार्पोरेटटीकरण के खिलाफ हैं. मेरे हिसाब से वामपंथ और आम आदमी पार्टी के बीच कोई एकता बननी चाहिए यह संभव और जरुरी भी है.इन सबे बीच पढ़े लिखे दलित बुद्धिजीवी आम आदमी पार्टी के खिलाफ हैं यह इसलिए क्योंकि आरक्षण पर केजरीवाल का पहले का स्टैंड उसके खिलाफ है. इसकी जीत एक पैन इण्डिया फिनामिना बनने जा रही है.’ इस के ऊपर अभी भी लोगों के मन में संकाएँ हैं लेकिन यह भी मान रहे हैं कि बहुत हद तक इसने जनता की भावना को अभिव्यक्त किया है. कर्मेंदु शिशिर जी का मानना है कि ‘ यह जीत कोई भारतीय जनता के मूल एजेंडे पर नहीं हुई है बल्कि तात्कालिक मुद्दे पर हुई है.मूल एजेंडा तो कार्पोरेट द्वारा भारतीय प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे के खिलाफ लडाई का है . इस पार्टी ने इस  मूल एजेंडे पर अभी अपना मत नहीं रखा है. यह भुमंदालिकरण का तीसरा दसक है. इसमें नया मध्यवर्ग आया है. यह तात्कालिकता में विश्वास करता है. इसका लालन पालन बाजार के बीच हुआ है . यही चीज आम आदमी की जीत कारण बनी है. वामपंथी राजनीति के सामने चुनौती खड़ी हो गयी है यह सही है . वामपंथ ने अपने आप को आत्मघाती तरीके से अप्रासंगिक बना लिया . उसको आधुनिक भारत की नयी व्याख्या करनी चाहिए थी . जिन मुद्दों को आम आदमी पार्टी ने उठाया वे मध्यवर्ग और निम्न वर्ग दोनों के हैं. लेकिन इन सब से यह स्पष्ट नहीं है कि वर्गीय राजनीति ख़त्म हो गयी. हर समाज में वर्गों के बीच परिवर्तन होता है. अब क्लासिकल मार्क्सवाद के द्वारा इस पूंजीवाद से नहीं लड़ा जा सकता है.आप के ऊपर अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है. जीवन शैली से कोई मतलब नहीं है. उसका प्रदर्शन नहीं होना चाहिए. पानी और बिजली के बारे में इसके पास एक ब्लू प्रिंट होना चाहिए था. इससे यह स्पष्ट है कि उनके पास कोई लम्बा विजन नहीं है. कार्पोरेट फासीवाद कभी-कभी अपने ही खिलाफ प्रतिरोध को खड़ा कर देता है.’ आम आदमी की अवधारणा को इस पार्टी ने बदल दिया है एक भ्रम पैदा किया है अनीता भारती के अनुसार ‘ आम आदमी की परिभाषा भ्रमित करने वाली है, जो साधनहीन है उसी को हम आम आदमी मानते थे लेकिन बड़े बड़े अधिकारी इसमें आ रहे हैं यह आम आदमी का हक़ छिनने वाली परिभाषा है. इनकी जनता में पैठ नहीं है. दलितों को अन्य पार्टियाँ तवज्जो नहीं देती थीं. इसी कारण उसने इसे जिताया. गरीबों महिलाओं और दलितों के पक्ष में जो तीसरा मोर्चा बनना चाहिए था उसको केजरीवाल ने भुनाया. ‘आप’ के लिए समानता उसके एजेंडे में नहीं है. वे मानते ही नहीं कि भारत में जाति प्रथा है. महिला उत्पीडन है.इसका विस्तार तो होगा, पावर हमेशा लोगों को आकर्षित करता है. मुझे निराशा हुई जब वामदल समर्थन में आ गए. आंधी हमेशा झोपड़ी ही उड़ाती है इसी लिए दलित इसका विरोध कर रहे हैं. देखते हैं महिला सुरक्षा पर बहुत कुछ कहा गया था , क्या करते हैं.’ वीरेन्द्र यादव ने भी आम आदमी की बदलती परिभाषा को चिन्हित किया है,  अब 'आम आदमी' की परिभाषा बदल रही है .रायल बैंक आफ स्काटलैंड की इण्डिया हेड मीरा सान्याल ने आम आदमी पार्टी में शामिल होने की घोषणा करते हुए कल कई मीडिया चैनलों पर कहा कि 'मैं आम आदमी हूँ . जो अपने परिवार की बेहतरी और बच्चों के अच्छे भविष्य का सपना देखता है वह आम आदमी है" .वे आर्थिक मसलों पर 'आप' के लिए काम करना चाहती हैं और नव उदारवादी आर्थिक नीतियों की समर्थक हैं .उन्होंने यह भी कहा कि यह समझना गलत है कि आप की आर्थिक नीतियाँ वाम के करीब हैं. इसके पूर्व इनफ़ोसिस के बालाकृष्णन ने भी आप में सामिल होने की घोषणा की है . वे भी नयी आर्थिक नीतियों के पैरोकार हैं कार्पोरेट दुनिया से आप पार्टी में सामिल होने का उत्साह देखते ही बन रहा है. इसके निहितार्थ भी समझे जाने चाहिए.’ त है कि 'आप' की आर्थिक नीतियां वाम के करीब हैं .इसके पूर्व इनफ़ोसिस के बालाकृष्णन ने भी आप में शामिल होने की घोषणा की है .वे भी नयी आर्थिक नीतियों के पैरोकार है .कार्पोरेट दुनिया से 'आप' पार्टी में शामिल होने का उत्साह देखते ही बन रहा है . इसके निहितार्थ भी समझे जाने चाहिए .त है कि 'आप' की आर्थिक नीतियां वाम के करीब हैं .इसके पूर्व इनफ़ोसिस के बालाकृष्णन ने भी आप में शामिल होने की घोषणा की है .वे भी नयी आर्थिक नीतियों के पैरोकार है .कार्पोरेट दुनिया से 'आप' पार्टी में शामिल होने का उत्साह देखते ही बन रहा है . इसके निहितार्थ भी समझे जाने चाहिए डॉ आशुतोष कुमार कहते हैं कि उम्मीद किसी को नहीं है कि वह दिल्ली में समाजवाद ले आयेगी . लेकिन अगर वह आम आदमी को भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए प्रभावी जनलोकपाल का औजार दे पाती है , मज़दूर (मलिन) बस्तियों में बुनियादी सेवाओं की बहाली कर पाती है , बिजली-पानी की कीमतों में कुछ रियायत कर पाती है , सरकारी दफ्तरों , स्कूलों और हस्पतालों में नागरिकों के प्रति जिम्मेदारी की भावना पैदा कर पाती है , कर्मचारियों की वाजिब मांगों पर कार्रवाई शुरू कर पाती है , निजी स्कूलों और हस्पतालों में बेरोकटोक चलने वाली लूट पर लगाम लगाने का कोई रास्ता खोज पाती है ---या यह सब करने की अपनी ईमानदार कोशिशों में लोगों का भरोसा जगा पाती है , तो मोदी साहेब को ब्लॉग लेखन के नए करियर पर गम्भीरता से ध्यान देने की जरूरत होगी. आम आदमी पार्टी की देशव्यापी सफलता के भविष्य के बारे में अभी से कुछ कह पाना संभव नहीं है. जब तक यह पार्टी अपने मुद्दों को राष्ट्र व्यापी नहीं बनाएगी तबतक उसको राष्ट्र व्यापी समर्थन संभव नहीं है. भारत में बहुतों ऐसे आन्दोलन चल रहे हैं जो अपने आप में इस पार्टी के आन्दोलन की तुलना में ज्यादे आगे बढे हुए और अपने विजन में दूरगामी आमूल अपरिवर्तन वादी हैं. मणिपुर में शर्मीला इरोम द्वारा चलाया जा रहा आन्दोलन ऐसा ही आन्दोलन है. बहुत सारे सवाल ऐसे हैं जिनपर अभी उनका कोई स्टैंड नहीं है. जब यह पार्टी इन सवालों को अपने दायरे में लाएगी तो स्वाभाविक है कि उसको बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. पुरे देश में वैसी ही स्थिति नहीं है जिस तरह दिल्ली में है. एक बात तो तय है कि यह पार्टी आमूल परिवर्तन कर पायेगी या नहीं यह कहना मुस्किल है लेकिन इसने भारतीय समाज की राजनैतिक विकल्पहीनता को एक रास्ता मुहैया कराया है. ऐसे में यदि कोई कम्युनिष्ट पार्टी जनता की जनवादी परिस्थिति के पक्ष में खड़ी होती है तो यह वामपंथ के उस रूप को दिखाता है जिसको जनता की नब्ज पहचानने की जरुरत है . यह समर्थन आलोचना का विषय नहीं होना चाहिए. यह समर्थन जनता की बदलावकारी आकांक्षा के पक्ष में खड़ा होना है. सही मायने में वही इस आन्दोलन को आगे बढ़ाएगा जो आज इसके पक्ष में खड़ा होगा. यह समर्थन यह दिखाता है कि वामपंथ जनता के सवालों से पीछे नहीं हट रहा है बल्कि वह आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारी को ले रहा है. यह कदम उन लोगों के लिए जवाब भी है जो यह कह रहे हैं कि वामपंथ की प्रासंगिकता ख़त्म हो गयी. जो लोग यह मानते हैं कि आम आदमी पार्टी के भीतर कुछ कमियां हैं उसकी कुछ सीमाएं हैं तो उनको क्या यह नहीं सोचना चाहिए कि उस कमी को पूरा करने वाली शक्ति कौन होगी. जिस दिन देश की जनता को इस बात का एहसास होगा कि यह पार्टी हमारी जिंदगी के मूल सवालों को नहीं बदल पायेगी तो उसकी आकांक्षा को दिशा देने वाला कौन होगा?
 इस पार्टी का सबसे महत्वपूर्ण पहलु जिसपर बात होनी चाहिए वह यह कि जिस तरह से इसमें बड़े बड़े लोग सामिल हो रहे हैं . यह इस बात का संकेत है कि नयी राजनीती में हम पढ़े लिखे लोगों को ज्यादे तवज्जो दे रहे हैं. कई बार यह कहा जाता है कि बहुत पढ़े लिखे लोग ,समझदार लोग राजनीति में नहीं आते हैं इसलिए खराब लोग राजनीती में आकर उसको गन्दा कर देते हैं . लेकिन इस बार पढ़े लिखे लोग राजनीती में आ रहे है. कहीं ऐसा तो नहीं है कि इस बहस में हम सही मायने में इस देश के गरीबों को राजनीति में आने से रोक देंगे. कहीं यह फिर उसी बहस की अनिवार्यता को जन्म तो नहीं दे देगा जिसमे आंबेडकर यह कह रहे थे कि कम्युनिष्ट पार्टी ‘बंच आफ ब्राह्मण ब्याज’ है . कहीं ऐसा तो नहीं है कि पढ़े लिखे समझदार नेत्रित्व की शर्त पर हम अब तक अनपढ़ गरीब नेत्रित्व की सम्भावना को ख़त्म कर रहे हैं. इस पक्ष की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है. आम आदमी पार्टी का सांकृतिक पहलु भी बहस योग्य है. जिस दिन अरविन्द केजरीवाल सपथ ले रहे थे उस दिन का यदि भाषण देखा जाय तो उसमे उन्होंने अपनी जित के लिए इश्वर को धन्यवाद किया. यह खेल मैदान में जीत के समय खिलाडियों द्वारा इश्वर को दी जाने वाली ब्रांडेड बधाई की ही तरह ब्रांडेड थी. अरविन्द केजरीवाल को कभी भी माथे पर तिलक लगाते हुए नहीं देखा था लेकिन उन्होंने इसका इस्तेमाल किया . क्या यह वैसा ही नहीं था जैसा अन्य नेता तलवार लेकर और मुकुट धारण करके करते हैं. यह किसके लिए संकेत था. अंततः यह तो राजनीतिक प्रतीक ही है जो किसी सामाजिक हिस्से को आश्वस्त करता है. क्या अरविन्द को इस बात का एहसास होगा कि जिन भारतीय समाजों में तिलक खौफ का प्रतीक है ,वर्चस्व का प्रतीक है उनमे लोगों ने इस को कैसे देखा होगा? यह व्यवहार राष्ट्र राज्य को वैज्ञानिक होने से रोकता है. कुल मिलाकर यह आम आदमी पार्टी की धर्म निरपेक्षता की समझ को दिखाता है. जिसमे सभी धर्म समान हैं लेकिन जिन धर्मों ने इंसानी गैर बराबरी को अपने धर्म का आधार बना रखा है उनके प्रति राज्य के प्रतिनिधि का यह व्यवहार उचित नहीं लगता है . दरसल यह समय सामाजिक मुद्दों के बाजारीकरण का है. उनके व्यवसायीकरण का है. आज के युवा भारत की यह जिम्मेदारी है की वह इस चीज को सूक्ष्मता से समझे.   
 आज का समय आलोचनात्मक दृष्टि के साथ बदलाव के पक्ष में खड़े होने का समय है. सक्रिय हस्तक्षेप का समय है. दिल्ली में इस पार्टी की जीत कोई क्रांति तो नहीं है लेकिन यह अपनी कमियों के बावजूद इसने हमें इस बात का गहराई से आभास कराया कि इस देश में बड़ा बदलाव संभव है. इसने उस मान्यता को ध्वस्त कर दिया है जिसके तहत यह कहा जाता था कि यह देश अब ऐसी स्थिति में चला गया है की कोई बदलाव अब संभव नहीं है.
                         
                                  राम नरेश राम


                            आदिवासी साहित्य विमर्श की अवधारणा
अब तक विक्सित आलोचना की कोई भी दृष्टि इस बात का दावा नहीं कर सकती कि उसने साहित्य के सारे पहलुओं और हिस्सों की व्याख्या के औजार विकसित कर लिए हैं .यही करण है कि हिंदी आलोचना की स्थापित पद्धतियों और प्रतिमानों ने साहित्य के बहुत सारे हिस्सों को अपने केंद्र में नहीं रखा. लगातार साहित्यिक लोकतंत्र की बढ़ती मांग और आवश्यकता ने नविन आलोचना दृष्टियों के उदय को प्रस्तावित किया है . हर आलोचना दृष्टि अपने पूर्ववर्ती से संघर्ष करती हुई नकारती हुई और ग्रहण करती हुई अपने अस्तित्व की अनिवार्यता को सिद्ध करती है .इसी प्रक्रिया में हिंदी की परंपरागत आलोचना पद्धति के इतर दलित ,स्त्री और अब आदिवासी साहित्य विमर्श के रूप में नयी आलोचना दृष्टि का उदय हुआ है . अभी हाल ही में अनामिका प्रकाशन से प्रकाशितगंगा सहाय मीणा की सम्पादित पुस्तक इसी की एक कड़ी है . यह पुस्तक अब तक प्रचलित आलोचना दृष्टि और साहित्यिक अवधारणा को उनकी सीमाओं के करण प्रश्नांकित करती है और आदिवासी साहित्य विमर्श को पूरक के रूप में स्थापित करती है . एनी अस्मिताओ से पार्थक्य दिखाते हुए गंगा जी लिखते हैं , ‘स्त्री और दलित साहित्य से भिन्न आदिवासी साहित्य की एक प्रमुख प्रवृत्ति इसमें अन्य अस्मिताओं के के प्रति सहयोगी का भाव है. यह समूह और सहयोग का साहित्य है . स्त्रवादी साहित्य ने जाति के प्रश्न की जटिलताओं को नहीं समझा और दलित साहित्य ने स्त्री के सवालों को तरजीह नहीं दी ,जिसके फलस्वरूप ‘दलित स्त्री विमर्श’ अस्तित्व में आया. चुकी आदिवासी समाज में श्रम में भागीदारी के करण स्त्री अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रही है , इसलिए साहित्य में भी बड़ी संख्या में स्त्री रचनाकारों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है’ गंगा जी का लेख ‘आदिवासी : अवधारणा और अर्थ’ आदिवासी साहित्य की अवधारणा को स्थापित करने की प्रक्रिया में आदिवासी के वैश्विक से लेकर भारतीय और वह भी हिंदी के अर्थ पर अधिक केन्द्रित लगता है. यह और भी बेहतर हो सकता था यदि भारतीय भाषाओँ में भी आदिवासी के अर्थों को देखने का प्रयास किया जाता. रमणिका गुप्ता का लेख ‘ आदिवासी लेखन : एक उभरती चेतना’ आदिवासी साहित्य लेखन के लिए उत्तरदायी परिस्थितियों को वाहरु सोनवरे की कविता ‘स्टेज’ के माध्यम से रेखांकित करता है. जिस तरह से स्त्री, दलित और दलित स्त्री को कर्ता (अभिव्यक्ति और नेतृत्व के सन्दर्भ में ) की भूमिका से हमेशा बहिष्कृत किया जाता रहा और उसने इसको अपनी जोरदार उपस्थिति से पूरा किया वैसे ही बहिष्करण की रणनीति को पहचानकर आदिवासी साहित्य ने भी अपनी अलग जगह बनाई. इस भाव को बहरू की कविता अभिव्यक्त करती है- ‘हम स्टेज पर गए ही नहीं /जो हमारे नाम पर बनाई गयी थी /हमे बुलाया भी नहीं गया /ऊँगली के इशारे से /हमारी जगह हमें दिखा दी गयी /हम वहीँ बैठ गए /हमे खूब शाबासी मिली /और ‘वे’स्टेज पर खड़े होकर /हमारा दुःख हमें ही बताते रहे/ ‘हमरा दुःख अपना ही रहा / जो कभी उनका हुआ ही नहीं’... यह कविता सहानुभूति और स्वानुभूति की बहस के लिए पर्याप्त जगह देती है . इस विन्दु पर आदिवासी साहित्य विमर्श अपने उदय की परिस्थिति के स्तर पर दूसरी उपेक्षित अस्मिताओं से मिल जाता है .
 पुस्तक में बहुमुखी चिंताएं खासकर भषा संरक्षण की चिंता उसको एक ऐसे विन्दु पर ला खड़ा करती है जहाँ भाषा का अस्तित्व समाज के अस्तित्व के लिए आवश्यक और जरुरी बन जाता है. निर्मला पुतुल के लेख ‘ वैश्वीकरण के भवंर में आदिवासी भाषा-साहित्य’ में यह चिंता जाहिर होती है – ‘ दरसल भाषा की मौत व्यक्ति से भी बड़ी परिघटना है. भाषा एक सामाजिक संपत्ति है , सामूहिक विरासत है . इसलिए किसी भाषा की मौत का अर्थ है एक जाति ,एक समुदाय एक समूह के पुरे वजूद की समाप्ति . भाषा की मौत के साथ ही उस जाति ,समुदाय ,समूह का इतिहास ,भूगोल सांस्कृतिक मूल्य ,सौन्दर्य चेतना का अंत हो जाता है जिसका निर्माण सदियों –सदियों में बड़ी मुश्किल से होता है’. यह पुस्तक नए सौन्दर्यशास्त्र की आवश्यकता ,उपनिवेशवाद विरोध में आदिवासियों की भूमिका के रेखांकन , भाषा संरक्षण ,संस्कृति संरक्षण , नवसाम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के विरोध की आवश्यकता को प्रस्तावित करती है- ‘ औपनिवेशिक युग में जितने भी विद्रोह आदिवासियों ने किये हैं, उतने भारत के किसी जाति ने नहीं किये हैं. इसका कारण था कि औपनिवेशिक सत्ता ने आदिवासियों के जंगल, जमीन का वास्तविक आधार ही छीन लिया था. वंदना टेटे अपने लेख में कहती हैं –‘ दुनिया की किसी आदिवासी  भाषा में ‘गाली’ अथवा इंसानी गरिमा को कमतर करने वाला एक भी शब्द मौजूद नहीं है.’ आदिवासी भाषाओँ में लिंगभेद न हो लेकिन वह मानती हैं-‘ लेखकों को समझना होगा कि भारत के हिन्दू समाज की अपेक्षा आदिवासी समाज में महिलाओं की स्थिति भिन्न है . यह भिन्नता सामाजिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक लगभग सभी स्तरों पर देखि जा सकती है.इसके बावजूद आदिवासी महिलाएं वैसी ही हैं जैसी कि अन्य भारतीय महिलाएं .’ पुस्तक में वीरेंदर मीणा का लेख ‘साहित्य आलोचना के संदर्भ में सबाल्टर्न दृष्टि की प्रासंगिकता’ में आदिवासी साहित्य और आलोचना को ‘अपनी ढपली अपना राग’ के आत्मघाती राह पर न जाने के लिए आगाह करते हैं-‘ मैं आदिवासी साहित्य और आलोचना को अन्य समस्त वर्गों और उपवर्गों के सन्दर्भ में ही स्थापित करने का पक्षधर हूँ . यदि आदिवासी साहित्य और आलोचना ‘अपनी ढपली अपना राग’ वाली कहावत पर चलेगी तो यह हमारे समाज में विसंगति के आलावा और कोई भूमिका अदा नहीं कर सकती .’
अस्मितावादी साहित्य विमर्श के ऐतिहासिक अनुभवों से जो दिशा मिली है उसने परवर्ती आलोचना दृष्टियों को पूर्ववर्ती खतरों से सचेत किया है.इस पुस्तक के अधिकांश लेखक इस बात से सचेत दिखाई देते हैं . इसलिए इसमें सर्वसमावेशी और संवादी होने की पूरी सम्भावना है. चूकी आदिवासी समाज अपनी मौलिक संस्कृति में हिन्दू संस्कृतियों की विसंगति से बहुत हद तक मुक्त है. और उनका सीधा सीधा ग्रामीण भारत के जाति संरचना वाले समाज से उस तरह का रिश्ता नहीं है जिस तरह से दलितों का है इसलिए उनके अनुभव जातीय दंश और छुआछूत वाले नहीं हैं जबकि दलित अस्मिता जाति समाज के भीतर है और इसीलिए अभिव्यक्ति में ब्राह्मणवाद का विरोध केन्द्रीय स्थान प्राप्त कर लेता है . जबकि आदिवासी साहित्य में यह सवाल गौड़ रह जाता है. दोनों तीनो अस्मिताएं –आदिवासी ,दलित ,स्त्री किसी न किसी रूप में स्थानीय सामाजिक वर्चस्ववादी सत्ता , राज सत्ता या साम्राज्यवादी सत्ता से दमित हैं इसलिए इन सब के दमन के खिलाफ एक साझी आलोचनात्मक दृष्टि भी बन सकती है .और यहीं सबके साझी मुक्ति का रास्ता भी हो सकता है नहीं तो अस्मिताओं के प्रतिक्रियावाद में बदल जाने और उसका इस्तेमाल कर लिए जाने से कोई नहीं बचा सकता है . अनुभव यदि साझे हैं तो मुक्ति का रास्ता भी साझा ही होगा.

                                                                 राम नरेश राम
                                                               naynishnaresh@gmail.com

          

नयी दुनिया का स्वप्न और हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन

राजीव गांधी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित इस दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के इस दूसरे दिन के दूसरे सत्र के अध्यक्ष आदरणीय कम...