मंगलवार, 30 जुलाई 2013

दलित-मुक्ति चेतना के विकास में हिंदी सिनेमा का योगदान

                दलित-मुक्ति चेतना में हिंदी सिनेमा का योगदान
   विज्ञान और तकनिकी के विकास ने मनुष्य के मनोरंजन और उसकी चेतना को समृद्ध करने का रास्ता विकसित किया. दलित और गरीब समाज साहित्य और सिनेमा में आरम्भ से ही उसकी विषयवस्तु के रूप में जगह पाते रहे है . शुरुआती हिंदी फिल्मों ने हिन्दू आदर्शों का ही सहारा लिया जिसके कारण  वे कोई प्रतिरोध नहीं निर्मित कर पायीं. उल्टे ये फ़िल्में ब्राह्मणवादी विचारों को ही फैलाती हैं. जितेन्द्र विसारिया के अनुसार-“यों देखा जाये तो ब्राह्मण श्रेष्ठता और वर्णव्यवस्था को हर परिस्थिति में अक्षुण बनाये रखने (भले ही स्वयं या पत्नी-पुत्र को बीच बाजार में बेचना पड जाये .)का यशगान तो हिंदी की पहली फिल्म ‘हरिश्चंद्र तारामती’ से ही प्रारंभ हो जाता है .छ्द्म्भेशी ब्राह्मण विश्वामित्र को दिए वचन पर अटल अयोध्या का राजा हरिश्चंद्र अपने राज्य के अतिरिक्त साठ भार सोने से ऊरीन होने के लिए काशी के बाजार में स्वयं और अपनी पत्नी तारामती एवं पुत्र रोहिताश्व के साथ बिक जाता है .सत्य(वर्णधर्म )पर अटल यह परिवार संकट के समय में भी एक दूसरे की मदद (कथानक में रानी तारामती कृशकाय हुए हरिश्चंद्र का घड़ा इसलिए सर पर नहीं रखवाती ,क्योंकि वह एक ब्राह्मण की क्रीतदास है और राजा काशी के कालू नामक चांडाल (दलित)का श्मशान रक्षक हैं. अपनी आत्मकथा ‘मेरे सत्य के प्रयोग’ में गाँधी जी जिस ‘सत्य हरिश्चंद्र नाटक का अपने जीवन पर अमिट प्रभाव बताते हैं,वह गुजराती नाटक और इस फिल्म का कथानक एक ही है –संकट की विकट परिस्थितियों में भी अपने जाति और वर्णधर्म पर अटल बने रहना और दलित द्वेष ...इस प्रकार दलित दृष्टिकोण से देखा जाय तो हिंदी सिनेमा की प्रारंभिक फिल्म ही हमें निराश करती है . उसमे प्रगतिशील तत्वों की अपेक्षा प्रतिगामी तत्वों का समावेश ही प्रमुख है .जातिवाद और वर्णवाद के विरुद्ध न जाकर यह सिनेमा उसका खुला समर्थन करता है सामाजिक यथार्थ की अपेक्षा पौराणिक फंतासियों का पुनरुत्पादन’’..१ . इन फिल्मों में ‘हरिश्चंद्र तारामती’, मोहिनी भस्मासुर ,लंका दहन , कृष्ण जन्म, कालिय मर्दन जैसी धार्मिक फ़िल्में थीं. इसके बाद भी कि इन फिल्मों ने हिन्दू आदर्शों को ही प्रचारित किया फिर भी इनमे ऐसा क्या था जिसके कारण इनको निषिद्ध ज्ञान की श्रेणी में डाल दिया गया ? जितेन्द्र विसारिया ने इसकी पड़ताल करते हुए लिखा है-“इसका मुलभूत कारण भारत में रंगमंच और प्रदर्शनकारी कलाओं में दलित पिछड़ों का सर्वेसर्वा होना है और यही कारण है कि देश में दलितों की ही तरह संगीत ,नृत्य और अभिनय कला को सदैव उपेक्षा की दृष्टि से देखा गया.”२  यहीं से सिनेमा के निषिद्ध ज्ञान बनने की शुरुआत लगती है.और दूसरा कारण लगता है स्त्री और पुरुष का अपने घरों की चारदीवारी को लांघकर अपने लिए एक दूसरी दुनिया का निर्माण, चाहे इस दुनिया की आरंभिक मूल्यगत नीव स्त्री जीवन के प्रति यथास्थितिवाद पर ही क्यों न टिकी हो. अर्थात जिस सिनेमा को समाज में उसके स्थापित मूल्य-भंजक सम्भावना के चलते समाज और परिवार में देखना निषिद्ध था उसमे परदे पर दिखने वाली स्त्री छवि भी समाज की परंपरागत स्त्री की छवि से अलग नहीं थी . “फ़िल्में सामाजिक नैतिकता स्वीकार भी करती हैं,उन्हें तोड़ती भी हैं”३ . लेकिन फिल्मों के प्रतिगामी मूल्यों को सिरे से ख़ारिज करना इनके महत्वपूर्ण योगदान को नकारना है. परिवारों में फिल्मों का निषेध इस बात का प्रमाण है कि फिल्मे समाज में प्रचलित मूल्यों से अलग भी मूल्य प्रस्तुत करती थीं . सिर्फ यही नहीं वल्कि यौनिकता भी फिल्म निषेध का बड़ा कारण था.फिल्मों के यथास्थितिवादी मूल्यों के प्रति बड़े फिल्म आलोचक जवरीमल्ल पारख भी यह मानते हैं कि हिंदी सिनेमा यथास्थिति का समर्थक है – “हम जानते हैं कि हिंदी का लोकप्रिय सिनेमा बुनियादी तौर पर यथास्थिति का समर्थक है लेकिन लोगों को यथास्थिति का समर्थक बनाये रखने के लिए उसे नए-नए तरीके और नई-नई तकनीकें अपनानी पड़ती हैं”.४ सिनेमा में इप्टा के आने के बाद उसकी विषय वस्तु और चरित्र बदल गया. इस समय के सिनेमा में दलित समाज सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन गरीब की भूमिका में दिखाई देता है... “विषय प्रधान फिल्मों के अलावा चालीस से पचास के दशक में दलित विमर्श से सम्बंधित फिल्मों का अभाव है.”५  यानि की जाति का सवाल अभी प्रमुख नहीं बन पाया था यह ठीक वैसे ही है जैसे भारत के वामपंथ ने शुरुआत में जाति के सवाल पर रुख अपनाया.
 मेरा ऊद्देश्य समसामयिक फिल्मो का दलित चेतना पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना है अतः समकालीन विषयों की ही चर्चा करूँगा . जिस तरह से भारतीय नवजागरण आधुनिकता  और पुनरुत्थानवाद के द्वंद्व से गुजर रहा था वैसे ही हिंदी सिनेमा भी इस प्रक्रिया से अछूता नहीं था. धीरे-धीरे आदर्शवाद से यथार्थ की तरफ बढ़ता हुआ सिनेमा अब जनपक्षधर आधुनिकता और पूजीवादी आधुनिकता का सघर्षविन्दु बन गया . यह परिस्थिति दमित अस्मिताओं के मुक्ति आकांक्षा को पंख लगा रही थी. हिंदी सिनेमा ने दलित समाज को बहुत हद तक मुक्ति चेतना से जोड़ा.फ्परख जी के अनुसार –“दलित समस्या पर फिल्मों का बनना १९३६ में ही शुरू हो गया था ,जब बाम्बे टाकिज ने अछूत कन्या फिल्म बनाई थी.आजादी के बाद सुजाता (१९५९)जैसी फिल्म बनाकर इस समस्या की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित किया. लेकिन भारतीय समाज में निहित जातिवादी जटिलताओं को कहीं ज्यादा सूक्ष्मता से चित्रित उनुन फिल्मकारों ने किया है जिन्होंने यथार्थवादी परंपरा से अपने को जोड़ा है.१९७० के आस-पास भारतीय सिनेमा में यथार्थवाद की जो नई लहर उभरी उसने दलित समाज की समस्याओं को अपना विषय बनाया. श्याम बेनेगल ने आरम्भ से ही इस ओर ध्यान दिया है.अंकुर(१९७३),मंथन(१९७६)और समर(१९९८)में उनहोंने दलित समस्या को अपनी फिल्मों का विषय बनाया.इसी तरह मृणाल सेन की फिल्म ‘मृगया’(१९७६),गोविन्द निहलानी की फिल्म ‘आक्रोश’(१९८०),सत्यजित राय की सद्गति(१९८१),गौतम घोष की फिल्म पार(१९८४),प्रकाश झा की फिल्म ‘दामुल’(१९८४),अरुण कौल की फिल्म ‘दीक्षा’(१९९१)और शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’(१९९५)में किसी न किसी रूप में हम दलित यथार्थ का चित्रण देख सकते हैं. इन फिल्मों की विशेषता यह है कि ये फ़िल्में दलितों के सवाल को व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखती हैं.इनमे न तो आर्थिक शोषण को ही मूल सवाल मानकर सामाजिक उत्पीड़न के सवाल को छोड़ दिया गया है और न ही सामाजिक अन्याय के प्रश्न की आड़ में आर्थिक सवालों की उपेक्षा की गई है.इस तरह हिंदी सिनेमा ने दलित अधिकार और सामाजिक न्याय के प्रति अपनी जागरूकता का परिचय सामाजिक दायित्व की पूर्ति की है.”६   इस तरह कम ही सही लेकिन हिंदी सिनेमा ने दलित समस्या को उठाया. लेकिन सवाल ये है कि जो फ़िल्में दलित समस्या को उठाती हैं वे क्या जेंडर के सवाल को ध्यान में रखती हैं? समकालीन फिल्मों में ‘आरक्षण’, ‘शुद्रा द राइजिंग’, ‘बवंडर’ जैसी फिल्मों ने दलित समाज के सवालों को उठाया और उनमे स्वाभिमान और प्रतिरोध का भाव पैदा किया.लेकिन इस तरह के फिल्मों की सख्या कम है. हालीवुड की फिल्मों में वहाँ के अश्वेतों को जिस तरह से चिन्हित किया गया उसको फैनन ने एक खास निर्मित का हिस्सा माना-“फैनन ने नश्ल्वादी व्यवहारके तमाम रूपों का विवेचन किया है.उप्निवेशितों और अश्वेतों को बालसुलभ मानते हुए संरक्षण और सहायता की मुद्रा,उन्हें बदनाम करना (मसलन किसी जिप्सी को चोर मान लेना,यहूदी को बेईमान या फिर अश्वेत को निकम्मा मानना),संदिग्ध मानना (तरह बिना गिने पैसा खर्च करने वाला यहूदी संदिग्ध है ,वैसे ही मांटेस्क्यू को उद्धृत करने वाले अश्वेत पर भी निगाह रखनी चाहिए),हंसी उड़ाना(उन्हें या बेढब वयस्कों की तरह हंसी का पात्र मानना. फैनन ने १९३० और १९४० के दशक की हालीवुड की फिल्मों में अश्वेत घरेलु नौकरों की हंसी को आलंबन के रूप में पेश करने का जिक्र किया है.)”७ क्या कुछ ऐसी ही स्थिति हिंदी सिनेमा में भी थी?यह एक विचारणीय प्रश्न है.   अब तो हिंदी सिनेमा अपने समाज से ही  अलगाव का शिकार हो रहा है तो दलितों की जिंदगी का दस्तावेज कैसे बन सकता है? जितेन्द्र विसारिया की उपरोक्त स्थापना को अगर आधार बनाया जाय तो यह सवाल विचारणीय हो जाता है कि आखिर किस तरह दलित और पिछड़ों को प्रदर्शनकारी कलाओं से बहिष्कृत कर दिया गया? ऐसा लगता है कि सिनेमा जैसे-जैसे पैसे और वर्चस्व का माध्यम बनता गया वैसे- वैसे इसमें गरीब और दलित जातियों का प्रतिनिधित्व कम होता गया.और उसी के अनुपात में दलित और ग्रामीण पृष्ठभूमि भी सिनेमा से गायब होने लगी.समकालीन हिंदी सिनेमा में अधिकांश फिल्मे सरोकारों को ध्यान में रखकर बनती ही नहीं हैं जो बनती भी हैं उनके ऊपर भी व्यावसायिकता का दबाव इतना होता है कि कथा की यथार्थता ही धूमिल होने लगती है . सिनेमा के घटते सामाजिक सरोकार का मुख्या कारण मल्टीप्लेक्सों की संस्कृति का बढ़ना है .अब सिनेमा की न तो विषय वस्तु ग्रामीण होती है और न ही आने वाली फ़िल्में गरीबों की पहुँच में होती हैं.अगर कुछ फ़िल्में बनती भी हैं सामाजिक सरोकारों या दलित सवालों पर या प्रगतिवादी चेतना पर वे बहुत सारे पहलुओं का ध्यान नहीं रखती हैं.
 ‘शुद्र द राइजिंग’ फिल्म के शीर्षक से ही लगता है की यह उभरते हुए दलित समुदाय के पीड़ादायक अनुभवों पर आधारित है.फिल्म मुख्यतः तीन दृश्यों पर केन्द्रित है.यह क्रमशः ब्राह्मण ,क्षत्रिय और वैश्य के द्वारा दलितों की प्रताड़ना को दिखने का प्रयास करती है. विषयवस्तु के लिहाज से यह एक अच्छी फिल्म है लेकिन इसकी ऐतिहासिकता को परदे पर उतारने की प्रक्रिया में यह अस्वभाविकता का शिकार हो जाती है. फिल्म का जो गीत है “ एक बेबस के नीर से पूछो कितनी पीर है छाती में,क्या है उसका दोश क्यों जन्मा इस जाति में ....समाज की दारुण दशा को दिखाती है.दलित आक्रोश को दिखने का प्रयास भी इसमें है , “ उ पानी पानी न जो मनई के कम ना आ सके उ मनई के मूत है मूत !”अपनी अस्वभाविकता के बाद भी यह फिल्म दलित मुक्ति –चेतना को उद्द्वेलित करती है. बवंडर में दलित समाज की समस्या से ज्यादे उसके लिए कम करने वाली संस्थाओं और न्यायपालिका की ब्राह्मणवादी निर्मिती को दिखाया गया है जबकि आरक्षण फिल्म में सामाजिक –आर्थिक पिछड़ेपन को और गैरबराबरी को दूर करने के संवैधानिक प्रावधान पर ही प्रहार को दिखाया गया है .अपनी तमाम कमियों के बाद भी ये फिल्मे दलित समाज को प्रतिरोध करने की प्रेरणा देती हैं. लेकिन मुख्या धरा की फिल्मे अभी भी इन विषयों पर कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं करतीं . ब्राह्मणवादी मूल्य फिल्म जगत और अन्य संस्थाओं में किस तरह अभी भी गुथा हुआ है इसका उदहारण अंग्रेजों के ज़माने में बना हुआ सेंसर बोर्ड है जो इस तरह के विषयों वाली फिल्मों को जल्दी पास ही नहीं करता है .यह केवल दलित विषयो वाली फिल्मों के सन्दर्भ में ही नहीं वल्कि प्रगति की चेतना वाली फिल्मों के साथ भी ऐसा ही करता है .
   
सन्दर्भ-                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     १ .विसारिया जीतेन्द्र –हिंदी सिनेमा में प्रतिरोध की संस्कृति दलित और हाशिये का समाज, समसामयिक सृजन ,अक्तूबर-मार्च २०१२-13 पृष्ठ.४६
२. वही,पृष्ठ ४५     
३ कुवरपाल सिंह –सिनेमा और संस्कृति , वाणी प्रकाशन २००९ की भूमिका
४.जवरीमल्ल पारख – हिंदी सिनेमा का समाजशास्त्र, ग्रंथशिल्पी प्रकाशन,दिल्ली  प्रथम संस्करण २००६ पृष्ठ ९ .
५. जितेन्द्र विसारिया –हिंदी सिनेमा में प्रतिरोध की संस्कृति दलित और हाशिये का समाज ,समसामयिक सृजन ,पृष्ठ ४६
६.जवरीमल्ल पारख –हिंदी सिनेमा का समाजशास्त्र, ग्रंथशिल्पी प्रकाशन ,दिल्ली, प्रथम संस्करण २००६ ,पृष्ठ १७  
७.प्रणय कृष्ण –उत्तर-औपनिवेशिकता के स्रोत और हिंदी साहित्य ,हिंदी परिषद् प्रकाशन ,इलाहबाद विश्वविद्यालय इलाहबाद ,संस्करण २००८ ,पृष्ठ १००
                                      राम नरेश राम
                                      शोध छात्र
                                     हिंदी विभाग

                           दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली           

सोमवार, 29 जुलाई 2013

दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय पाठ्यक्रम पर


                

                          शिक्षा: सामाजिक यथार्थ और सामाजिक सरोकार

“और आप की शिक्षा !क्या वह भी सामाजिक नहीं है और उन सामाजिक अवस्थाओं से ,जिनमे आप शिक्षा देते हैं,स्कूलों के जरिये समाज के,प्रत्यक्क्ष या परोक्ष ,हस्तक्षेप आदि से निर्धारित नहीं होती ?शिक्षा में समाज का हस्तक्षेप कम्युनिस्टों  की ईजाद नहीं है ; कम्युनिस्ट तो केवल इस हस्तक्षेप के स्वरूप को बदलना और शिक्षा का शासक  वर्ग के प्रभाव से उद्धार करना चाहते हैं. ’’ शिक्षा को शासक वर्ग की प्रेत छाया से मुक्त करने की यह  बात सन १९४८ में कमुनिस्ट घोषणा पत्र में कही गई थी . इसी तरह की प्रेत छाया हिन्दुस्तान को भी सता रही है जिसमे प्राथमिक शिक्षा हो या उच्च शिक्षा हर जगह इस प्रेत का प्रभाव दिखाई दे रहा है . शासक वर्ग शिक्षा को हमेशा अपनी विचारधारा को प्रचारित करने का माध्यम मानता रहा है . इसलिए शिक्षा प्रणाली में वह अपने हित में बदलाव भी करता रहा है .उसका शिक्षा के सामाजिक सरोकारों से बहुत लेना-देना नहीं होता है. उसके लिए शिक्षा ज्ञान निर्माण का माध्यम न होकर ‘मॉल’ होती है अथवा खरीद-फरोख्त की वस्तु जिसके माध्यम से फायदा कमाया  जा सके . ऐसे में शिक्षा के सामाजिक सरोकार वाले पहलू को धक्का पहुँचता है ,सामाजिक सरोकार को धक्का पहुँचने का अर्थ है किसी ऐसे समुदाय विशेष को नुकसान होना जो समाज की मुख्या धारा में शामिल ही नहीं था .ऐसा नहीं है कि शासक वर्ग जिस शिक्षा को निर्धारित करता है उसका कोई सामाजिक सरोकार होता ही नहीं है लेकिन उस सामाजिक सरोकार का उद्देश्य वह नहीं होता जो वास्तव में होना चाहिए.

    ज्ञान मुक्ति का साधन भी है और वर्चस्व का माध्यम भी.इसीलिए ज्ञान पर भी कब्जे की लड़ाई चलती रहती है और वर्चस्ववादी हमेशा अपने ज्ञान को श्रेष्ठ घोषित करता रहता है ताकि उसका प्रतिपक्षी उसके वर्चस्व को स्वीकार कर ले  . वर्चस्ववादी ज्ञान निर्माण के साथ-साथ संहिता का भी निर्माण करता है जिसमे यह नियम होता है कि उसके द्वारा निर्मित ज्ञान कौन से लोग  हासिल करने के अधिकारी हैं . ज्ञान पर कब्जे के संघष का वैश्विक सन्दर्भ भी है और स्थानीय भी .अंग्रेजों के भारत आने से पहले यहाँ ज्ञान पर स्थानीय वर्चस्ववादियों का कब्ज़ा था लेकिन उनके भारत आने के बाद वर्चस्वा के स्वरुप और उसकी भौगोलिकता में बदलाव आगया . अब ब्रिटिश ज्ञान ने भारतीय ज्ञान की वैधता को ख़ारिज कर दिया और अपनी श्रेष्ठता साबित कर भारतीय ज्ञान तंत्र को अपने अधीन कर लिया या एक तरह से दोनों ही ज्ञानों के बिच संश्रय कायम हुआ जिसमे ब्रिटिश ज्ञान अग्रणी भूमिका में था . दोनों ही ज्ञानों की प्रकृति में इस बात में अंतर था कि जहाँ ब्रिटिश ज्ञान की सामाजिकता अपने राष्ट्र की सीमा पार कर अपने राष्ट्र के हित में दूसरे राष्ट्र और समुदाय का दमन करने की प्रवृत्ति रखती थी वहीँ भारतीय ज्ञान पद्धति और तंत्र स्थानीय दमन की प्रवृत्ति में निपुण था . दोनों की एक उभयनिष्ठ विशेषता सामाजिकता का नकार और सामूहिकता का दमन था . ज्ञान की इस प्रवृत्ति में कोई बदलाव दिखाई नहीं देता है वल्कि ज्ञान के असमाजीकरण की प्रवृत्ति और बढ़ी है . इस तरह शिक्षा के मूल्यगत और उद्देश्यगत स्वरूपों में  कोई खास बदलाव नहीं दिखता. सरकार  शिक्षा में व्यापक बदलाव के माध्यम से गरीब और वंचित तबकों को ज्ञान हासिल करने के अधिकार से रोक रही है .

 अध्यापक और शिक्षा ; सरकार की नीतियों ने अध्यापक जैसे पदों को ही नहीं वल्कि और भी दूसरे क्षेत्र के पदों के सम्मानजन स्तर को गिरा दिया है जिसके कारण अध्यापन सहित सारी नौकरियों  का स्तर प्रभावित हुआ है . नौकरियों के ठेकाकरण के कारण , उनमे स्थायित्व की भावना नहीं है जिसका परिणाम ज्ञान निर्माण की प्रकिया पर भी पड़ता है,काम की गुणवत्ता पर भी  . तो यही हो रहा है उच्च शिक्षा में भी . इस सब का शिकार समाज के सबसे गरीब और सामाजिक ,आर्थिक रूप से पिछड़े हुए दलित,,पिछड़े , अल्पसंख्यक पृष्ठभूमि के लोग हो रहे हैं . भारत में प्राथमिक शिक्षा का जो हाल है उसका शिकार कौन सबसे ज्यादा हुआ है ? नौकरियों में निजीकरण और अंग्रेजी के प्रभाव के कारण लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी निजी विद्यालयों में पढाना पसंद कर रहे है जहाँ बड़े पैमाने पर फ़ीस वसूली जाती है . जिसके पास पैसा है वो ही इनमे अपने बच्चों को पढ़ा सकता है .गरीबों दलितों आदिवासियों और अल्पसंख्यकों तथा महिलाओं के लिए फिर क्या बचता है. उनके लिए तो टूटी हुई इमारतों में उपेक्षित विद्यालय ही नसीब होगें . कुल मिलाकर वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में वंचितों के लिए जगह नहीं है . वे  हर संस्थान से खदेड़े जा रहे हैं .इतना ही नहीं वर्तमान शिक्षा किस तरह सामाजिक गैरबराबरी को बढ़ावा दे रही है इसका उदहारण कोठारी आयोग की रिपोर्ट में मौजूद है “यह शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि विभिन्न सामाजिक तबकों और समूहों को नजदीक लाये और इस प्रकार समता मूलक एवं एकजुट समाज के उभरने में मददगार हो . लेकिन वर्तमान में ऐसा करने के बजाय शिक्षा स्वयं ही सामाजिक भेदभाव और वर्गों के बीच फासले को बढा  रही है ... यह स्थिति गैर लोकतान्त्रिक है और समतामूलक समाज के आदर्श से मेल नहीं खाती है .यह केवल गरीब बच्चों के लिए ही नहीं वरन संपन्न व् सुविधाभोगी समूहों के बच्चों के लिए भी ख़राब है .”

  विश्वविद्यालय ऐसी जगहें हैं जहा सृजनात्मकता ,आलोचनात्मक विवेक अपनी उन्मुक्तता के साथ जीवन पाता है . वहाँ  ज्ञान का निर्बाध विस्तार होता है जहा ज्ञान की द्वंद्वात्मकता अपने चरम पर होती है ,जहा उपदेशात्मकता ,नैतिकता तर्क के आगे पानी भरते हैं और वैज्ञानिकता खुले आसमान के नीचे साँस लेती है लेकिन अफ़सोस की इन पर सत्ता के घने बादल घिर रहे हैं और ज्ञान की उर्वरता को नष्ट करने की तैयारी में हैं . आजकल दिल्ली विश्वविद्यालय के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है जो नई शिक्षा नीति की प्रयोग स्थली बन गया है. दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग पुरे देश से हर सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि के विद्यार्थी आते हैं; बिहार हो उत्तर प्रदेश हो या देश के सुदूर राज्य. यहाँ केवल उच्च आयवर्ग के ही विद्यार्थी नहीं आते हैं वल्कि गरीब और उपेक्षित सामाजिक आर्थिक समुदायों के विद्यार्थी भी आते हैं. बहुत सारे विद्यार्थी तो पार्ट टाइम नौकरी करते हुए पढने की लालसा के साथ आते हैं लेकिन इन सब के बीच विश्वविद्यालय ने चार वर्षीय पाठ्यक्रम लाकर जैसे छात्रों का भविष्य ही उनसे छीन लिया है .समस्या यह नहीं है की तीन साल के स्नातक पाठ्यक्रम की जगह चार साल का कर दिया गया . वल्कि चार साल के पाठ्यक्रम को जिस तरह से बनाया गया है उसकी वजह से शिक्षा की गुणात्मकता प्रभावित हो रही है . इसमें कई ऐसे प्रावधान हैं जिसका इस्तेमाल गरीब और वंचित तबकों और छात्राओं के साथ भेदभाव के लिए किया जा सकता  है .विश्वविद्यालय में भेदभाव के ढेरों उदहारण मिल जायेंगे . जिस संस्थान को वैज्ञानिक और जनपक्षधर माहौल तैयार करना चाहिए वह ब्राह्मणवाद की प्रयोग स्थली बना हुआ है और चार वर्षीय पाठ्यक्रम इसको मजबूत और संस्थागत कर देगा .नए पाठ्यक्रम के हिसाब से विद्यार्थी अब दो साल, तीन साल और चार साल के किसी भी पड़ाव पर शिक्षा बंद कर सकता है और प्रशासन के अनुसार उसको दो साल में छोड़ने पर डिप्लोमा ,तीन साल पर स्नातक और चार पर ऑनर्स की डिग्री मिलेगी जिससे बिच में ही पढाई छोड़ने पर उनको खाली हाथ नहीं लौटन पड़ेगा . विश्वविद्यालय के अनुसार वह यह सब छात्रों के हित में कर रहा है लेकिन सच्चाई इसके ठीक विपरीत है .सबसे पहले तो यह बदलाव राष्ट्रिय शिक्षा नीति के खिलाफ है . यह पैसे वाले लोगों के लिए एक तरह से शिक्षा को आरक्षित करना ही हुआ . यह सब लोकतंत्र के मूल्यों का गला घोटने की शर्त पर हो रहा है जिसमे सरकार, न्यायपालिका और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग सब शामिल हैं . जब सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की गई तब राज्य मंत्री शशि थरूर ने अध्यापकों और बुद्धिजीवियों तथा छात्रों को यह कहकर शर्मिंदा किया कि वे सरकार को विश्वविद्यालय की स्वायत्तता भंग करने का न्योता दे रहे हैं . ऊपर से देखने पर यह बहुत ही मामूली बात जैसी लग सकती है कि तीन साल से बढाकर चार साल ही तो कर दिया गया लेकिन यह जीतनी सरल है उतनी ही कठिन और जनविरोधी भी .आखिर इस पर इतना हो हल्ला क्यों? इससे कौन लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे ?जाहिर सी बात है दलितों ,महिलाओं ,पिछड़ों तथा आदिवासियों पर ही इसकी गाज गिरेगी. बीच में शिक्षा छोड़ने की दर इन्ही समुदायों से सबसे ज्यादा होती है सबसे ज्यादे डिप्लोमाधारी ये ही लोग होंगे .इसका अर्थ  यह हुआ कि दिल्ली विश्वविद्यालय अनुपयोगी डिप्लोमा धारियों का कारखाना बनने जा रह है. ऐसे में कौन उपयोगी डिप्लोमा की जगह अनुपयोगी डिप्लोमा लेना चाहेगा . भारतीय समाज अभी भी जिस तरह से पुरुषवादी आग्रहों से भरा पड़ा है ऐसे में छात्राओं के लिए चार साल तक स्नातक कौन करने देना चाहेगा ,जहाँ अधिकांश अभिभावकों को  जितनी जल्दी हो अपने सर का बोझ हल्का करना होता है . पुत्र मोह भी छात्राओं के इस चार साला डिग्री लेने में बाधा पैदा करेगा .

   पूरे देश में शिक्षा का स्तर बहुत गिर रहा है ऐसे में सरकार की जो शिक्षा नीति है वही इसके लिए जिम्मेदार है .वह शिक्षकों की नियमित भर्ती पर मौन साधे हुए है इस मसले पर उसको विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की याद नहीं आती है . दरसल यह प्रक्रिया शिक्षा को बेचने की तैयारी का हिस्सा है जिसमे शिक्षा तो बिकेगी लेकिन सरकार जो चाहेगी . अब मानविकी और आलोचनात्मक ज्ञान निर्माण वाले विषयों पर खतरा बढ़ रहा है . उनको विश्वविद्यालयों से खदेड़ने का अर्थ है प्रश्न करने वालों और उसकी संस्कृति को खदेड़ना . कठिनाई उनके लिए सबसे ज्यादा है जिस समुदाय की अभी पहली पीढ़ी के लोग ही प्रतीकात्मक प्रतिधित्व के रूप में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे .इन समुदायों के लिए अधिकतर तो मानविकी के विषय ही सर्वसुलभ और आवश्यक हैं . क्योंकि विज्ञानं ,वाणिज्य और बाजार के दूसरे विषय उनके लिए खरीद क्षमता में नहीं आता यदि आता भी है तो इस पृष्ठभूमि के खरीददारों का प्रतिशत बहुत कम है  . इस तरह भारतीय शिक्षा व्यवस्था एक बड़े सदमे से गुजर रही है. दिल्ली विश्वविद्यालय में जो हो रहा है उसकी खामियों की  आलोचना करने पर सरकार ने उसको हल करने के बजाय  उल्टा इसको देश के सारे ही विश्वविद्यालयों में लागू करने का माहौल बना रही है .जब सरकार या दूसरी कोई संस्था चार साल का पाठ्यक्रम अन्य विश्वविद्यालयों में लागू करने की सलाह देती है तब क्या वह एनी विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का दमन नहीं कर रही होती है? शिक्षा की सर्वसुलभता तो खतरे में है ही उसकी सामाजिक सरोकारों वाली अंतर्वस्तु सबसे ज्यादा खतरे में है .    

   दरसल सरकार अपने ही नागरिकों के खिलाफ साजिस रच रही है उनको वह बाजार के छेनी हथौड़ी से बाजार लायक खरीदार तराश रही है इसलिए वह उनको एटीएम चलाने लायक , नेट मार्केटिंग करने लायक बनाना चाहती है लोग हैं की बनने  को तैयार ही नहीं हैं. एक महोदय की माने तो देश के प्रशासक  लायक अब पाठ्यक्रम आया है मानो जो ५४ हजार जिन  छात्रों का दाखिला होने वाला है उनमे सारे के सारे  लोग आईएएस ही बनना चाहते हों और सरकार इनके लिए पद सृजित करके बैठी हुई हो .

     

   

लोकतंत्र और हिंदुत्व का दर्शन- हिंदू सांप्रदायिक बहुमत के जहरीले दांत तोड़ने के लिए भावी संविधान मे प्रावधान न किए जाने पर भारत लोकतंत्र के सुरक्षित नहीं रह पाएगा ।बाबा साहब की यह टिप्पड़ी हिंदु समाज मे व्याप्त सांप्रदायिक प्रवृत्ति की  विध्वंशकरी भूमिका को ही रेखांकित करती है ।लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ राजनीतिक लोकतंत्र नहीं होता वल्कि सामाजिक लोकतंत्र भी होता है और मुझे लगता है की बाबा साहब की बात मे यह निहित है।सामाजिक लोकतंत्र का स्वरूप राजनीतिक लोकतंत्र को निर्मित करता है।यदि कोई समाज गैर-बराबरी पर टीका हुआ है तो उसमे लोकतंत्र तो हो ही नहीं सकता। जाति व्यवस्था हिंदु धर्म की आत्मा है।इसीलिए भारतीय समाज मे व्याप्त गैर-बराबरी के दार्शनिक मान्यताओं का आलोचनात्मक विश्लेषण डा।अम्बेडकर ने बहुत ही तार्किक और वैज्ञानिक तरीके से किया । वह भारत मे हिंदु सांप्रदायिक चेतना की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करते हैं । इसके पीछे उनका जो उदेश्य था । वह भारत को एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र बनाने का था और वह सांप्रदायिकता को चुनौती दिये बगैर संभव नहीं था इसलिए उनका संपूर्ण अध्ययन भारतीय समाज और राजव्यवस्था को लोकतान्त्रिक बनाने के लिए आवश्यक उपायों पर केंद्रित था । उनकी दृष्टि मे न्याय सबसे महत्वपूर्ण मानदंड है जिस पर ही किसी समाज और व्यवस्था के लोकतान्त्रिक स्तर को मापा जा सकता है उनके यहाँ न्याय का अर्थ स्वतंत्रता ,समानता और बंधुत्व था । जाहिर है यह नारा फ़ांसीसी क्रांति की देंन है जिससे आंबेडकर गहरे प्रेरित दिखाई देते हैं ।जब न्याय को कसौटी बनाकर भारतीय समाज का अध्ययन किया जाता है तो उसमे बहुस्तरीय पूर्वाग्रह और दमनकारी दर्शन दिखाई देता है । हिदुत्व एक दमनकारी ,वर्चस्ववादी चेतना है और अब वह व्यवस्थित विचार धारा बन चुकी है । जिसका नेतृत्व कुछ पार्टियाँ घोषित रूप से और कुछ अघोषित रूप से कतरी हैं । उनका राजनीतिक दर्शन कई बार उनके सामाजिक दर्शन के विपरीत होता है आंबेडकर का राजनीतिक दर्शन अपने समय के लोकप्रिय राजनीतिक दर्शन को चुनौती देता है और हिंदुत्व के दर्शन को धरण करने वाली कांग्रेस पार्टी के अगुआ गांधी से वे बहस करके दरअसल यह दिखाना चाहते हैं की कंगेस पार्टी दलितों की हितैषी नहीं है क्योंकि गांधी का दर्शन हिंदुत्व का दर्शन है अर्थात गांधी वर्णव्यवस्था मे विश्वास करते थे । इस तरह अम्बेडकर भारत को एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र बनाने की लड़ाई लड़ रहे थे । इतनी सचेत लड़ाई के बाद भी भारत अभी भी एक लोकतांत्रिक राष्ट्र नहीं बन पाया है । वैसे कहने को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है ।

   उत्तर प्रदेश ,गुजरात महाराष्ट्र या यूँ कहा जय की पूरा भारत ही हिंदुत्ववादियों के लिए प्रयोग स्थली बन चुका है धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी उसूलों का दावा करने वाली सपा सरकार भी केवल राजनीतिक मजबूरी मे ही मुशलिम सवाल उठती है ।उसने सत्ता मे आने से पहले जो वादा किया था उसको पूरा नहीं कर पाई । उत्तर प्रदेश के मुशलिम नौजवान राजकीय आतंक से सबसेन ज्यादा असुरक्षित हैं किसी भी वक्त गायब कर दिये जाने ,आतंकी घोषित किए जाने या फर्जी मुटभेड़ के शिकार हो जाने के लिए अभिशप्त हैं । सपा जो मुशलिम समर्थक पार्टी मानी  जाती है वह भी उनके साथ न्याय नहीं कर पाई । यह कैसा समाजवाद है की उसी के समर्थक  दंगों मे आगे बढ़कर उसको अंजाम देते है । उत्तर प्रदेश ने इस बार अपना जनादेश एक युवा को दिया उसमे अपना विशास जताया है की सायद एक युवा युवाओं का दर्द समझे लेकिन इस्थिति ठीक उलट है । वह युवा युवा नहीं शासक है और शासक की उम्र उसकी साशकीय नीति को निर्धारित नहीं करती । एक प्रदेश का युवा मुख्यमंत्री युवाओं के सपनों का सौदागर बनने की कगार पर है । आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुये उत्तर प्रदेश मे राजनीतिक माहौल तेज हो गया है । मायावती जी भी अपनी खोई हुई शक्ति पाने के लिए ब्राह्मण सम्मेलन कर रही है । उन्होंने तो स्वतंत्रता ,समानता और बंधुत्व का नारा ही लगाना बंद ही कर दिया है। अब समरसता का नारा लगा रही हैं ,जो केवल ब्राह्मण और दलित एकता मे ही उनको दिखाई देती है । बसपा की पुरानी सोसल इंजीनियरिंग असफल होती नजर आ रही है । समरसता का सामाजिक जमीनी यथार्थ बहुत कड़वा है । इस समीकरण मे अवसरवादिता है । मायावती हो या मुलायम (अखिलेश)दोनों के ही दलों की आर्थिक और सांस्कृतिक नीति लगभग एक जैसी है । परियोजनाओं का नामकरण भर बादल जाने से असलियत नहीं

 

दल जाती है । नई सरकार आने पर जो महत्वपूर्ण दिख रहा है वह है समाजवादी स्वास्थ्य सेवा के तहत अस्पतालों मे अंबुलेंस की उपलब्धता । लेकिन सवाल यह है की जब अस्पतालों मे बुनियादी सुविधाएँ ही नहीं होंगी ,दवाएँ नहीं होंगी ,नियमित डाक्टर और कर्मचारी नहीं होंगे तो यह योजना सिर्फ दूरदराज के इलाक़ों से मरीजों को अस्पतालों तक पाहुचा भर सकती है । आबादी और  भौगोलिक विस्तार के हिसाब से अस्पतालों की संख्या बढ़नी चाहिए लेकिन इसकी चिंता किसी को नहीं है । इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश मे छात्र नौकरियों के नाम पर कंगाल और कर्ज मे फँसते जा रहे हैं । एक मित्र ने फोन पर बताया की उसने विशिष्ट बी टी सी के लिए चालीस फार्म भरा प्रत्येक फार्म के हिसाब से उसने बीस हजार रुपये का कर्जदार है इसी अनुपात मे और भी छात्र होंगे जो सरकारी लूट के शिकार हो जाते हैं उत्तर प्रदेश मे गोरखपुर ,आजमगढ़,महराजगंज जैसे जिलोन मे सांप्रदायिक संगठनों का नेटवर्क बढ़ा है । मराजजीले के परतवाल बाजार के चौराहे पर हिंदु युवा वाहिनी का एक बोर्ड लगा है जिस पर लिखा हुआ है-हिंदुत्व एक स्ंचेतना इस पर प्रहार महाप्रलय को आमंत्रण है । यह एक तरह से आदित्य नाथ की पारिभाषिक धमकी वाला वक्तव्य है जो हिंदुत्व के रास्ते अलग चलने वालों और हिंदुत्व की आत्मा वर्णव्यवस्था पर प्रहार करने वालों को सबक सीखने की धमकी है । यह है दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक राज्य की तस्वीर जहाँ खुलेआम सांप्रदायिक उन्माद भड़काने वालों की गिरफ्तारी नहीं होती है जबकि संदेह के आधार पर किसी खास धर्म विशेष के नौजवानों को वीणा किसी सबूत के उठा लिया जाता है।  आंबेडकर अपनी किताब हिंदुत्व का दर्शन मे जिस हिंदुत्व की आलोचनात्मक विवेचना करते हैं वह बादल चुका है उसमे लचीलपन आ गया है पहले जैसी रूढ़िवादिता नहीं रही ।  उसकी दार्शनिक मान्यताओं थोड़ा सुधार हुआ है या यूँ कहें की चालाकी आयी है उसका दर्शन जिन जातियों ,समुदायों ,धर्मों और लिंग के खिलाफ है उसी के बीच वह अपनी वैधता की तलाश करता है और उनके ही बीच से प्रचलित मिथकों को आधार बनाकर उनको जोड़ने का प्रयास करता है गोरक्षनाथ पीठ मे केवल सवर्ण बच्चे नहीं पढ़ते हैं वलकी दलित बच्चे भी हैं जिनका छुआ भोजन आज भी गाँवों मे नहीं खाया जाता है जिनके माता –पिता किसी सवर्ण समुदाय मे सहभोज नहीं कर सकते । भारतीय राजनीति मे सत्ता के कड़े होने के संकेत मिलने लगे हैं राहुल गांधी ने हल ही मे कार्पोरेट घरानों को यह विश्वास दिलाने और मोदी की कड़ी छवि का विकल्प बनाने की इच्छा के साथ यह कहा कि-मेरा आदर्श मेरी माँ नहीं मेरी दादी इन्दिरा हैं । यह कहकर उन्होने कई संदेश दिये हैं उनकी माँ विदेशी मूल कि भले ही हों लेकिन राहुल कि बात अलग है । दूसरा यह कि उनको मनमोहन कि तरह उदार न समझा जाय वलकी दादी इन्दिरा कि तरह कठोर समझा जाय जिसकी आज शासक वर्ग जरूरत है ।कौन नहीं जनता है कि इन्दिरा गांधी अपने तानाशाही रवैये के कारण जानी जाती हैं । तो ऐसे मे राहुल का यह वक्तव्य गौर करने लायक है इसमे एक आलोकतांत्रिक भारत कि तस्वीर कैद है । आंबेडकर इसी चिंता को लेकर भारतीय समाज कि व्याख्या कर रहे थे ।                  ( राम नरेश राम )  

            

शासन की अराजकता


                  शासन की अराजकता

  अराजकता राज्य के नियमों का उलंघन है. इस आधार पर अपने समय के सवालों से टकराने वाले अक्सर अराजकतावादी घोषित कर दिए जाते हैं. लेकिन क्या यह सोचने का विषय नहीं है कि राज्य भी कभी अराजक हो सकता है. मै समझता हूँ कि जनता के खिलाफ राज्य का व्यवहार उसको इस श्रेणी में डाल देता है . राज्य की सत्ता मनुष्य की सत्ता के बिना संभव नहीं है या यूँ कहें कि मनुष्य ही राज्य की सत्ता का अभिकर्ता है. कहा जाता है कि अपने समय में गाँधी भी अराजक थे वे ब्रिटिश शासन के नियमों को नहीं मानते थे. भगत सिंह को तो उस समय के अराजकतावादी गाँधी समेत अंग्रेज भी अराजक मानते थे. लेकिन जब एक अराजक दूसरे अराजक को अराजक कहता है तो उस समय पहला दूसरे के सापेक्ष राज्य का समर्थक हो जाता है.ऐसी स्थिति में गाँधी अंग्रेजी शासन वाले राज्य का समर्थक ठहरते हैं.

  किसी समाज में अपराध उसकी संरचना और नागरिकों के राज्य पर विश्वास पर निर्भर करता है. यदि नागरिक अपने राज्य व्यवस्था में जीवन की न्यूनतम नागरिक सेवाएं नहीं पाता है तो वह असंतोष से भर उठता है,लेकिन इसका यह अर्थ विल्कुल नहीं है कि नागरिक अपराधी हो जाता है वल्कि इसके उलट नागरिकों को राज्य द्वारा बाधित किया जाता है कि वे अपराध करें. कई बार तो यह उसके  व्यापार और अर्थ नीति के जीवन के लिए जरुरी होती है.अक्सर बौद्धिक समाज द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि अमुक इलाके में अपराध या अराजकता इसलिए बढ़ रही है कि वहा विकास नहीं है. दरसल विकास न करना क्या अपराध की श्रेणी में नहीं आता है ? यदि आता है तो नागरिकों का ‘अपराध’ राज्य प्रायोजित अपराध के खिलाफ नए राज्य-निर्माण की आकांक्षा की अभिव्यक्ति ही मानी जाएगी. भारतीय राज्य की अराजकता चौतरफा बढ़ रही है वह अपने नागरिकों में असुरक्षा की भावना भर रहा है .यह अराजकता अपराधिक अराजकता है . वह नागरिकों को उनकी स्थानीय और सामाजिक असमानता के आधार पर आपस में ही लड़ाता है और अपने किये का दोष किसी दूसरे सामाजिक समुदाय पर डाल कर आसानी से नागरिक युद्ध का मजा लेता है. और अक्सर तो वह खुद ही आक्रान्ता बन कर अपने ही नागरिकों के पैसे से तैयार व्यवस्था का प्रयोग कर उनको सबक सिखाता है .जैसे  पहले प्राथमिक शिक्षा में निवेश को कम कर वहा अध्यापकों की भारती न कर उसने उनकी व्यवस्था को रौंद दिया . विद्यालयों में नियमित और प्रशिक्षित अध्यापक नहीं दिया  बुनियादी सुविधाओं का आभाव रखा . फिर जब बिहार में मिड डे मिल खाकर बच्चों की मौत होती है तो दोष एक महिला कर्मचारी पर आता है और वह गिरफ्तार कर ली जाती है . क्या यह महज संयोग है कि पुरे देश में मिड डे मिल खाने से बच्चों की मौतें हो रही हैं और वे बिमार पड़ रहे हैं . क्या इसके लिए मात्र एक महिला या पुरुष जिम्मेदार है या राज्य व्यवस्था ? इस स्थिति में मुकदमा सरकार के खिलाफ चलना चाहिए या नागरिक के खिलाफ,  क्या यह शासन की अराजकता नहीं है?

 प्राथमिक विद्यालयों की यह स्थिति उत्तर प्रदेश में भी है. प्रदेश शासन पर सवाल करिए तो कहा जायेगा कि यह तो केंद्र का मामला है लेकिन जो राज्य का मामला है उसमे भी इससे कम अराजकता नहीं है. चुनावी गणित भी अपराध और अराजकता के गतिविज्ञान को निर्धारित करती है. उत्तर प्रदेश एक बार फिर मंडल विरोधी आग में जल रहा है जिसका केंद्र इलाहाबाद बना हुआ है इसकी झलकियाँ दिल्ली में भी दिख जाती है वैसे तो कई बार दिल्ली ही इसकी अगुआई कर चुकी है. आरक्षण के खिलाफ समाज में  विरोध छुपे स्तरों पर रहता है जो समय – समय  पर हिंसक रूप में अभिव्यक्त होता रहता है . कुछ समुदायों  का मानना है कि यदि  आरक्षण का लाभ उठाने वाले किसी सामाजिक समुदाय की स्थिति सवर्ण के बराबर हो गयी है तो उसको ‘ओपन फाइट’ के लिए आरक्षण से वंचित कर दिया जाना चाहिए.लेकिन आजादी के पैंसठ सालों बाद भी जब जातिवाद का स्तर संस्थाबद्ध हो तो ऐसे में आरक्षण को ख़त्म करना सामाजिक रूप से पिछड़े या दलित लोगों के लिए क्या घातक नहीं हो सकता ? दरसल नौकरियों के लिए कम होते अवसर के कारण लोगों में असुरक्षा की भावना जन्म लेती जा रही है . सवर्णों को लगता है कि यदि आरक्षण ख़त्म कर दिया जाय तो उनकी नौकरी के अभाव का सवाल हल हो जायेगा .जबकि सच्चाई यह नहीं है. नौकरियों का घटना तो सरकारों की नीतियों के कारण है. सरकार भी यह जानती है कि हल यह नहीं है लेकिन वह  जान- बुझकर यह संघर्ष की स्थिति पैदा करती है. उत्तर प्रदेश में यही हो रहा है . वैधानिक स्थिति यह है कि जिसको ‘सामान्य’ पद कहा जाता है वह तो सभी वर्गों के लिए खुली प्रतियोगिता के लिए होता है . लेकिन असुरक्षा और वर्चस्व के शिकार उसकी व्याख्या ऐसे करते हैं मानो सामान्य का अर्थ सवर्ण हो .स्थिति कुछ भी हो राज्य इसमें दोषी है वह समुदायों का संघर्ष कराकर अपने वोट बैंक का ध्रुवीकरण कर रहा है. कुछ लोगों को लग सकता है कि अखिलेश सरकार यादवों या पिछड़ों की भलाई कर रही है लेकिन भलाई तो तब होगी जब समाज के सारे नौजवानों को रोजगार मिल सके उनकी असुरक्षा कम हो सके. अखिलेश सरकार को पिछड़ों का हितैसी तब माना जाता जब वह नोएडा में मजदूरों के ऊपर फर्जी मुकदमे नहीं लादती ,उनको जेलों में नहीं ठुसती, क्या कोई सपा समर्थक यह बताएगा कि उन मजदूरों में कितने पिछड़ी सामाजिक पृष्ठभूमि वाले हैं जिनको फक्तारियों में न्यूनतम मानवीय परिस्थिति भी नहीं उपलब्द्ध है जिसमे वे पेशाब तक करने का अवकाश नहीं पा  सकते. यह कौन सा पिछड़ा प्रेम है कि  उनको न्यूनतम मजदूरी की भी गारंटी नहीं की जा सकती है . ऐसा ही है तो केंद्र सरकार को ऐसे मुद्दों पर समर्थन क्यों जिनसे पिछड़ों का अहित हो रहा है?

  उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा की कमोबेस वही स्थिति है जो केंद्र में कांग्रेस और भाजपा की है, फर्क सिर्फ इतना है कि सपा – बसपा अपने अपने दम पर सरकार बना रही हैं जबकि कांग्रेस- भाजपा गठबंधन सरकार चलाते हैं .इनके माध्यम से शासकीय अराजकता अपने-अपने शासन क्षेत्रों में मिसाल कायम कर रही है. उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार के पहले मायावती जी के शासन काल में शासकीय अराजकता का आलम यह था कि अगले विधान सभा चुनाव में उनको हराकर जनता ने सबक सिखा दिया.लेकिन सपा सरकार के बनते ही राज्य भर में आपराधिक ग्राफ ऊँचा हो गया. हाल ही में सगड़ी विधान सभा जिला आजमगढ़ के सपा के ही पूर्व विधायक की हत्या हो गयी . मिडिया में हत्या के कई कारण बताये जा रहे हैं. प्रतापगढ़ में जियाउल हक़ की हत्या के ज्यादे दिन नहीं बीते हैं. इन हत्याओं ने आम नागरिकों में दहसत पैदा किया होगा कि यदि सी.ओ और विधायक तक जिस राज्य में सुरक्षित नहीं हैं उसमे आम नागरिकों का क्या होगा? लगता है जनता की संपत्ति की लुट और उस पर वर्चस्व की लड़ाई में कुछ हत्याए जनता के लिए सबक सन्देश भी हैं.अखिलेश सरकार उत्तर प्रदेश में दलितों ,गरीब पिछड़ों और अल्पसंख्यको के सवालों पर असफल सिद्ध हुई है . खालिद की हत्या का मामला अभी चल ही रहा है .  सरकार ने लैपटॉप बांटकर सोचा था कि वह छात्रों को उनके मूल सवालों से भटका देगी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. विद्वानों का मानना है कि पूजी अपने साथ अपनी संस्कृति भी लाती है और भारत में आने वाली पूंजी लम्पट है आक्रामक है जो भारत में आते ही ब्राह्मणवादी मूल्यों से समझौता कर खूंखार हो उठती है. इस पूंजी ने राजनीति का अपराधीकरण किया है. मिसाल के तौर पर भारत में विकास के नाम पर आने वाली विदेशी पूंजी यहाँ के सामाजिक ताने –बाने को नष्ट कर विकासमान बनाने के बजाय वह दमन कर रही है. भूमि अधिग्रहण का मामला इसका सबसे बड़ा उदहारण है . क्या अखिलेश सरकार वर्तमान आर्थिक नीति की आलोचना करती है ? यदि नहीं तो वह पिछड़ों की क्या उत्तर प्रदेश के आम नागरिकों की हितैसी नहीं हो सकती . आगामी लोकसभा चुनाव में जनता किस तरह से हिसाब लेगी  कहना मुस्किल है. कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश देश कि राजनीति की दिशा निर्धारित करता है क्या यह आगामी नयी दिशा देश और प्रदेश के गरीबों के लिए कोई ख़ुशी लेकर आएगी . ऐसे समय में जब यू.पी.ए सरकार भाजपा और अमेरिका के दबाव और निर्देशन में देश को गर्त में ले जा रही है और देश के नागरिकों से युद्ध (आपरेशन...) कर रही है ताकि उनका भौतिक अस्तित्व ही मिटा दे तो यह सवाल और भी मौजू हो जाता है कि जनता के साथ कौन है ?

 

 

 

 

                                                    राम नरेश राम
                                                    शोध छात्र
                                                    हिंदी विभाग
                                            दिल्ली विश्वविद्यालय ,दिल्ली

नयी दुनिया का स्वप्न और हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन

राजीव गांधी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित इस दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के इस दूसरे दिन के दूसरे सत्र के अध्यक्ष आदरणीय कम...