दलित-मुक्ति चेतना
में हिंदी सिनेमा का योगदान
विज्ञान और तकनिकी के विकास
ने मनुष्य के मनोरंजन और उसकी चेतना को समृद्ध करने का रास्ता विकसित किया. दलित
और गरीब समाज साहित्य और सिनेमा में आरम्भ से ही उसकी विषयवस्तु के रूप में जगह
पाते रहे है . शुरुआती हिंदी फिल्मों ने हिन्दू आदर्शों का ही सहारा लिया जिसके
कारण वे कोई प्रतिरोध नहीं निर्मित कर
पायीं. उल्टे ये फ़िल्में ब्राह्मणवादी विचारों को ही फैलाती हैं. जितेन्द्र
विसारिया के अनुसार-“यों देखा जाये तो ब्राह्मण श्रेष्ठता और वर्णव्यवस्था को हर
परिस्थिति में अक्षुण बनाये रखने (भले ही स्वयं या पत्नी-पुत्र को बीच बाजार में
बेचना पड जाये .)का यशगान तो हिंदी की पहली फिल्म ‘हरिश्चंद्र तारामती’ से ही
प्रारंभ हो जाता है .छ्द्म्भेशी ब्राह्मण विश्वामित्र को दिए वचन पर अटल अयोध्या का
राजा हरिश्चंद्र अपने राज्य के अतिरिक्त साठ भार सोने से ऊरीन होने के लिए काशी के
बाजार में स्वयं और अपनी पत्नी तारामती एवं पुत्र रोहिताश्व के साथ बिक जाता है .सत्य(वर्णधर्म
)पर अटल यह परिवार संकट के समय में भी एक दूसरे की मदद (कथानक में रानी तारामती
कृशकाय हुए हरिश्चंद्र का घड़ा इसलिए सर पर नहीं रखवाती ,क्योंकि वह एक ब्राह्मण की
क्रीतदास है और राजा काशी के कालू नामक चांडाल (दलित)का श्मशान रक्षक हैं. अपनी
आत्मकथा ‘मेरे सत्य के प्रयोग’ में गाँधी जी जिस ‘सत्य हरिश्चंद्र नाटक का अपने
जीवन पर अमिट प्रभाव बताते हैं,वह गुजराती नाटक और इस फिल्म का कथानक एक ही है –संकट
की विकट परिस्थितियों में भी अपने जाति और वर्णधर्म पर अटल बने रहना और दलित द्वेष
...इस प्रकार दलित दृष्टिकोण से देखा जाय तो हिंदी सिनेमा की प्रारंभिक फिल्म ही
हमें निराश करती है . उसमे प्रगतिशील तत्वों की अपेक्षा प्रतिगामी तत्वों का
समावेश ही प्रमुख है .जातिवाद और वर्णवाद के विरुद्ध न जाकर यह सिनेमा उसका खुला
समर्थन करता है सामाजिक यथार्थ की अपेक्षा पौराणिक फंतासियों का पुनरुत्पादन’’..१ .
इन फिल्मों में ‘हरिश्चंद्र तारामती’, मोहिनी भस्मासुर ,लंका दहन , कृष्ण जन्म,
कालिय मर्दन जैसी धार्मिक फ़िल्में थीं. इसके बाद भी कि इन फिल्मों ने हिन्दू
आदर्शों को ही प्रचारित किया फिर भी इनमे ऐसा क्या था जिसके कारण इनको निषिद्ध
ज्ञान की श्रेणी में डाल दिया गया ? जितेन्द्र विसारिया ने इसकी पड़ताल करते हुए
लिखा है-“इसका मुलभूत कारण भारत में रंगमंच और प्रदर्शनकारी कलाओं में दलित पिछड़ों
का सर्वेसर्वा होना है और यही कारण है कि देश में दलितों की ही तरह संगीत ,नृत्य
और अभिनय कला को सदैव उपेक्षा की दृष्टि से देखा गया.”२ यहीं से सिनेमा के निषिद्ध ज्ञान बनने की शुरुआत
लगती है.और दूसरा कारण लगता है स्त्री और पुरुष का अपने घरों की चारदीवारी को
लांघकर अपने लिए एक दूसरी दुनिया का निर्माण, चाहे इस दुनिया की आरंभिक मूल्यगत
नीव स्त्री जीवन के प्रति यथास्थितिवाद पर ही क्यों न टिकी हो. अर्थात जिस सिनेमा
को समाज में उसके स्थापित मूल्य-भंजक सम्भावना के चलते समाज और परिवार में देखना
निषिद्ध था उसमे परदे पर दिखने वाली स्त्री छवि भी समाज की परंपरागत स्त्री की छवि
से अलग नहीं थी . “फ़िल्में सामाजिक नैतिकता स्वीकार भी करती हैं,उन्हें तोड़ती भी
हैं”३ . लेकिन फिल्मों के प्रतिगामी मूल्यों को सिरे से ख़ारिज करना इनके
महत्वपूर्ण योगदान को नकारना है. परिवारों में फिल्मों का निषेध इस बात का प्रमाण
है कि फिल्मे समाज में प्रचलित मूल्यों से अलग भी मूल्य प्रस्तुत करती थीं . सिर्फ
यही नहीं वल्कि यौनिकता भी फिल्म निषेध का बड़ा कारण था.फिल्मों के यथास्थितिवादी
मूल्यों के प्रति बड़े फिल्म आलोचक जवरीमल्ल पारख भी यह मानते हैं कि हिंदी सिनेमा
यथास्थिति का समर्थक है – “हम जानते हैं कि हिंदी का लोकप्रिय सिनेमा बुनियादी तौर
पर यथास्थिति का समर्थक है लेकिन लोगों को यथास्थिति का समर्थक बनाये रखने के लिए
उसे नए-नए तरीके और नई-नई तकनीकें अपनानी पड़ती हैं”.४ सिनेमा में इप्टा के आने के
बाद उसकी विषय वस्तु और चरित्र बदल गया. इस समय के सिनेमा में दलित समाज सीधे तौर
पर तो नहीं लेकिन गरीब की भूमिका में दिखाई देता है... “विषय प्रधान फिल्मों के
अलावा चालीस से पचास के दशक में दलित विमर्श से सम्बंधित फिल्मों का अभाव है.”५ यानि की जाति का सवाल अभी प्रमुख नहीं बन पाया
था यह ठीक वैसे ही है जैसे भारत के वामपंथ ने शुरुआत में जाति के सवाल पर रुख
अपनाया.
मेरा ऊद्देश्य समसामयिक
फिल्मो का दलित चेतना पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना है अतः समकालीन विषयों
की ही चर्चा करूँगा . जिस तरह से भारतीय नवजागरण आधुनिकता और पुनरुत्थानवाद के द्वंद्व से गुजर रहा था
वैसे ही हिंदी सिनेमा भी इस प्रक्रिया से अछूता नहीं था. धीरे-धीरे आदर्शवाद से
यथार्थ की तरफ बढ़ता हुआ सिनेमा अब जनपक्षधर आधुनिकता और पूजीवादी आधुनिकता का
सघर्षविन्दु बन गया . यह परिस्थिति दमित अस्मिताओं के मुक्ति आकांक्षा को पंख लगा
रही थी. हिंदी सिनेमा ने दलित समाज को बहुत हद तक मुक्ति चेतना से जोड़ा.फ्परख जी
के अनुसार –“दलित समस्या पर फिल्मों का बनना १९३६ में ही शुरू हो गया था ,जब
बाम्बे टाकिज ने अछूत कन्या फिल्म बनाई थी.आजादी के बाद सुजाता (१९५९)जैसी फिल्म
बनाकर इस समस्या की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित किया. लेकिन भारतीय समाज में निहित
जातिवादी जटिलताओं को कहीं ज्यादा सूक्ष्मता से चित्रित उनुन फिल्मकारों ने किया
है जिन्होंने यथार्थवादी परंपरा से अपने को जोड़ा है.१९७० के आस-पास भारतीय सिनेमा
में यथार्थवाद की जो नई लहर उभरी उसने दलित समाज की समस्याओं को अपना विषय बनाया.
श्याम बेनेगल ने आरम्भ से ही इस ओर ध्यान दिया है.अंकुर(१९७३),मंथन(१९७६)और
समर(१९९८)में उनहोंने दलित समस्या को अपनी फिल्मों का विषय बनाया.इसी तरह मृणाल
सेन की फिल्म ‘मृगया’(१९७६),गोविन्द निहलानी की फिल्म ‘आक्रोश’(१९८०),सत्यजित राय
की सद्गति(१९८१),गौतम घोष की फिल्म पार(१९८४),प्रकाश झा की फिल्म ‘दामुल’(१९८४),अरुण
कौल की फिल्म ‘दीक्षा’(१९९१)और शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’(१९९५)में किसी न
किसी रूप में हम दलित यथार्थ का चित्रण देख सकते हैं. इन फिल्मों की विशेषता यह है
कि ये फ़िल्में दलितों के सवाल को व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखती
हैं.इनमे न तो आर्थिक शोषण को ही मूल सवाल मानकर सामाजिक उत्पीड़न के सवाल को छोड़
दिया गया है और न ही सामाजिक अन्याय के प्रश्न की आड़ में आर्थिक सवालों की उपेक्षा
की गई है.इस तरह हिंदी सिनेमा ने दलित अधिकार और सामाजिक न्याय के प्रति अपनी
जागरूकता का परिचय सामाजिक दायित्व की पूर्ति की है.”६ इस तरह
कम ही सही लेकिन हिंदी सिनेमा ने दलित समस्या को उठाया. लेकिन सवाल ये है कि जो
फ़िल्में दलित समस्या को उठाती हैं वे क्या जेंडर के सवाल को ध्यान में रखती हैं?
समकालीन फिल्मों में ‘आरक्षण’, ‘शुद्रा द राइजिंग’, ‘बवंडर’ जैसी फिल्मों ने दलित
समाज के सवालों को उठाया और उनमे स्वाभिमान और प्रतिरोध का भाव पैदा किया.लेकिन इस
तरह के फिल्मों की सख्या कम है. हालीवुड की फिल्मों में वहाँ के अश्वेतों को जिस
तरह से चिन्हित किया गया उसको फैनन ने एक खास निर्मित का हिस्सा माना-“फैनन ने
नश्ल्वादी व्यवहारके तमाम रूपों का विवेचन किया है.उप्निवेशितों और अश्वेतों को
बालसुलभ मानते हुए संरक्षण और सहायता की मुद्रा,उन्हें बदनाम करना (मसलन किसी
जिप्सी को चोर मान लेना,यहूदी को बेईमान या फिर अश्वेत को निकम्मा मानना),संदिग्ध
मानना (तरह बिना गिने पैसा खर्च करने वाला यहूदी संदिग्ध है ,वैसे ही मांटेस्क्यू को
उद्धृत करने वाले अश्वेत पर भी निगाह रखनी चाहिए),हंसी उड़ाना(उन्हें या बेढब
वयस्कों की तरह हंसी का पात्र मानना. फैनन ने १९३० और १९४० के दशक की हालीवुड की
फिल्मों में अश्वेत घरेलु नौकरों की हंसी को आलंबन के रूप में पेश करने का जिक्र
किया है.)”७ क्या कुछ ऐसी ही स्थिति हिंदी सिनेमा में भी थी?यह एक विचारणीय प्रश्न
है. अब तो हिंदी सिनेमा अपने समाज से ही अलगाव का शिकार हो रहा है तो दलितों की जिंदगी का
दस्तावेज कैसे बन सकता है? जितेन्द्र विसारिया
की उपरोक्त स्थापना को अगर आधार बनाया जाय तो यह सवाल विचारणीय हो जाता है कि आखिर
किस तरह दलित और पिछड़ों को प्रदर्शनकारी कलाओं से बहिष्कृत कर दिया गया? ऐसा लगता
है कि सिनेमा जैसे-जैसे पैसे और वर्चस्व का माध्यम बनता गया वैसे- वैसे इसमें गरीब
और दलित जातियों का प्रतिनिधित्व कम होता गया.और उसी के अनुपात में दलित और
ग्रामीण पृष्ठभूमि भी सिनेमा से गायब होने लगी.समकालीन हिंदी सिनेमा में अधिकांश
फिल्मे सरोकारों को ध्यान में रखकर बनती ही नहीं हैं जो बनती भी हैं उनके ऊपर भी
व्यावसायिकता का दबाव इतना होता है कि कथा की यथार्थता ही धूमिल होने लगती है .
सिनेमा के घटते सामाजिक सरोकार का मुख्या कारण मल्टीप्लेक्सों की संस्कृति का बढ़ना
है .अब सिनेमा की न तो विषय वस्तु ग्रामीण होती है और न ही आने वाली फ़िल्में
गरीबों की पहुँच में होती हैं.अगर कुछ फ़िल्में बनती भी हैं सामाजिक सरोकारों या
दलित सवालों पर या प्रगतिवादी चेतना पर वे बहुत सारे पहलुओं का ध्यान नहीं रखती
हैं.
‘शुद्र द राइजिंग’ फिल्म के
शीर्षक से ही लगता है की यह उभरते हुए दलित समुदाय के पीड़ादायक अनुभवों पर आधारित
है.फिल्म मुख्यतः तीन दृश्यों पर केन्द्रित है.यह क्रमशः ब्राह्मण ,क्षत्रिय और
वैश्य के द्वारा दलितों की प्रताड़ना को दिखने का प्रयास करती है. विषयवस्तु के
लिहाज से यह एक अच्छी फिल्म है लेकिन इसकी ऐतिहासिकता को परदे पर उतारने की
प्रक्रिया में यह अस्वभाविकता का शिकार हो जाती है. फिल्म का जो गीत है “ एक बेबस
के नीर से पूछो कितनी पीर है छाती में,क्या है उसका दोश क्यों जन्मा इस जाति में ....समाज
की दारुण दशा को दिखाती है.दलित आक्रोश को दिखने का प्रयास भी इसमें है , “ उ पानी
पानी न जो मनई के कम ना आ सके उ मनई के मूत है मूत !”अपनी अस्वभाविकता के बाद भी
यह फिल्म दलित मुक्ति –चेतना को उद्द्वेलित करती है. बवंडर में दलित समाज की
समस्या से ज्यादे उसके लिए कम करने वाली संस्थाओं और न्यायपालिका की ब्राह्मणवादी
निर्मिती को दिखाया गया है जबकि आरक्षण फिल्म में सामाजिक –आर्थिक पिछड़ेपन को और
गैरबराबरी को दूर करने के संवैधानिक प्रावधान पर ही प्रहार को दिखाया गया है .अपनी
तमाम कमियों के बाद भी ये फिल्मे दलित समाज को प्रतिरोध करने की प्रेरणा देती हैं.
लेकिन मुख्या धरा की फिल्मे अभी भी इन विषयों पर कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं
करतीं . ब्राह्मणवादी मूल्य फिल्म जगत और अन्य संस्थाओं में किस तरह अभी भी गुथा
हुआ है इसका उदहारण अंग्रेजों के ज़माने में बना हुआ सेंसर बोर्ड है जो इस तरह के
विषयों वाली फिल्मों को जल्दी पास ही नहीं करता है .यह केवल दलित विषयो वाली
फिल्मों के सन्दर्भ में ही नहीं वल्कि प्रगति की चेतना वाली फिल्मों के साथ भी ऐसा
ही करता है .
सन्दर्भ- १ .विसारिया जीतेन्द्र –हिंदी
सिनेमा में प्रतिरोध की संस्कृति दलित और हाशिये का समाज, समसामयिक सृजन
,अक्तूबर-मार्च २०१२-13 पृष्ठ.४६
२. वही,पृष्ठ ४५
३ कुवरपाल सिंह –सिनेमा और संस्कृति , वाणी प्रकाशन २००९ की भूमिका
४.जवरीमल्ल पारख – हिंदी सिनेमा का समाजशास्त्र, ग्रंथशिल्पी
प्रकाशन,दिल्ली प्रथम संस्करण २००६ पृष्ठ ९
.
५. जितेन्द्र विसारिया –हिंदी सिनेमा में प्रतिरोध की संस्कृति दलित
और हाशिये का समाज ,समसामयिक सृजन ,पृष्ठ ४६
६.जवरीमल्ल पारख –हिंदी सिनेमा का समाजशास्त्र, ग्रंथशिल्पी प्रकाशन
,दिल्ली, प्रथम संस्करण २००६ ,पृष्ठ १७
७.प्रणय कृष्ण –उत्तर-औपनिवेशिकता के स्रोत और हिंदी साहित्य ,हिंदी
परिषद् प्रकाशन ,इलाहबाद विश्वविद्यालय इलाहबाद ,संस्करण २००८ ,पृष्ठ १००
राम नरेश राम
शोध छात्र
हिंदी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली