डॉ. वीरेन्द्र प्रताप

साले कंजर, मेहतर, मांग, बसोर क्यों चले आते हैं पढ़ने?जाओ अपने माँ-बाप के साथ सड़कें झाड़ो, कचरा उठाओ, मैला उठाओ।होमवर्क नहीं करते, पढ़ाई नहीं करते तब कक्षा में क्यों चले आते हो।(पृष्ठ 34,नीला आकाश)"

साले कंजर, मेहतर, मांग, बसोर क्यों चले आते हैं पढ़ने?जाओ अपने माँ-बाप के साथ सड़कें झाड़ो, कचरा उठाओ, मैला उठाओ।होमवर्क नहीं करते, पढ़ाई नहीं करते तब कक्षा में क्यों चले आते हो।(पृष्ठ 34,नीला आकाश)"

यह कथन है सुशीला टाकभौरे जी के 'नीला आकाश' उपन्यास के एक मास्टर पात्र का।यहाँ मास्टर की जाति से मतलब नहीं है जरूरी यह है कि यह किस वर्ग के लिए आज़ादी के बाद भारत के शिक्षा मंदिर में कही जा रही थी।ऐसे संदर्भ अनेक दलित साहित्य में मिल जाता है।यह कोई फंतासी, लफ्फाज़ी या कपोल कल्पना नहीं है ।यह उस समय का सच है जिसे दलितों-पिछड़ों ने भोगा है।
सुशीला टाकभौरे जी' का दो बैठक में पढ़ लिया जाने वाला उपन्यास है"नीला आकाश"।
पृष्ठ संख्या की दृष्टि से बहुत बड़ा नहीं है।लगभग 100 पेज का उपन्यास अपने भीतर आकाश के अनंत विस्तार को समाहित करने वाला है और अनंत दूरी को कम करने वाला भी है। यहाँ आकाश असीमित ही नहीं है सीमित भी है।कहते हैं दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो कुछ भी असंभव नहीं।यही शक्ति असीम को सीमित कर देती है।
दलित जीवन की अशिक्षा, गरीबी और उससे उपजी उपेक्षा से शुरू होकर डॉ अम्बेडकर के मौलिक सिद्धांतों को समाहित करते हुए शिक्षा, संघठन और संघर्ष की ओर बढ़ जाता है।दलित वर्ग के भीतर की जातीय संरचना और भेदभाव को भी बखूबी उठाया गया है।शिक्षा के लिए दलित समाज के संघर्ष पर खूब गहराई से चिंतन और चित्रण किया गया है।
यह सच है कि कोई भी समाज बिना शिक्षित हुए न संगठित हो सकता है और न ही अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर सकता है।शिक्षा ही गुलामी की जंजीरों को काटती है और गुलाम बनाए जाने वाले कारणों से परिचित कराती है फिर भी जीवन के रूढ़ संस्कारों से मुक्त हो पाना आसान नहीं होता है।यह कसमकस बहुत दिनों तक चलती रहती है।इसके लिए जरूरी है परिवर्तन कामी विचारों से परिचित होना और साहित्य को पढ़ना है।
उपन्यास में अन्नाभाऊ साठे और डॉ अम्बेडकर के साहित्य की चर्चा इसीलिए बार-बार की गई है।
एक बात जो मुझे लगती है कि बेहतर जीवन जीने का हक़ हर किसी नागरिक का अधिकार है।लेकिन बिडम्बना यह है कि यह अधिकार आज भी हर किसी को सामाजिक रूप से प्राप्त नहीं हो पाया है।तमाम हाशिए के विमर्श इसका गवाह हैं।इसलिए आज हाशिए के समाज को अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।यह सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता की लड़ाई है।यह संघर्ष किसी को अपमानित करने और पददलित करने का नहीं है।
हमें यह समझना होगा कि न्याय के लिए संघर्ष करना अन्य के लिए अन्याय नहीं है।ऐसा सोचना एक गलतफहमी है।यही वजह है कि स्त्री, दलित, आदिवासी या अन्य हाशिए के लेखन को अक्सर संदेह की दृष्टि से न सिर्फ देखा जाता है कि वल्कि इनके अधिकारों की बात होते ही कुछ लोगों को यह महसूस होने लगता है कि उनका अधिकार छीना जा रहा है।
आज़ादी के बाद भारतीय समाज में दलितों की स्थिति और शिक्षा के लिए संघर्ष का एक दस्तावेज है यह उपन्यास।नागपुर के पास कन्हान का क्षेत्र और वहाँ के मातंग और बाल्मीकि मुहल्ले की कहानी है यह।मातंग जाति के कुछ घरों से बना'मांग वाडा'।दरअसल ये जातियाँ सेवा के कार्य से जुड़ी हुई थीं, चाहे बाल्मीकियों का सफाई का पेशा हो या मातंगों का बाजा बजाने का इसीलिए इन्होंने अपने मुहल्ले का नाम'सेवानगर'रख लिया था।इसी मुहल्ले के भीकूजी और चन्दरी के जीवन संघर्ष से यह कहानी शुरू होती है।
भीकूजी और चन्दरी के जीवन यापन का पारंपरिक पेशा है।भीकूजी घेरा बजाता है और चन्दरी साफ-सफाई के अलावा खाली समय में सूपा-डलिया बीनने का काम करती है।जीवन अपनी गति से चलता रहता है।उसमें कोई व्यवधान नहीं है।गरीबी को नियति मान लिया जाए तो उपेक्षा-अपमान में जीवन जीते रहना सहज हो जाता है।सदियों से दलितों-पिछड़ों के साथ यही तो होता रहा है।लेकिन समय एक जैसा नहीं होता है।बदलता है और इस बदलाव की प्रक्रिया में बहुत कुछ बदल जाता है।बस उसके लिए चाहिए एक विचार, परिवर्तन की एक चेतना,एक मानसिक द्वंद्व।मानसिक द्वन्द्व ही तो है जो जीवन में उथल-पुथल मचाता है।यह बहिर्मुखी हो या अंतर्मुखी,बाहर का हो या भीतर का।हां इतना जरूर है कि बाहर का द्वंद्व भीतर भी प्रवेश करता है, परेशान करता है।अगर ऐसा हुआ तो यह समझ जाना चाहिए कि अब स्थिति में कुछ न कुछ बदलाव जरूर होगा।
भीकूजी और चन्दरी के भीतर भी एक द्वंद्व पैदा होता है।आज़ादी और भारतीय संविधान ने हर भारतीय नागरिक को समानता का दर्जा देता है।तो क्या यह आज़ादी भीकूजी और चन्दरी के लिए नहीं थी या उन्हीं के जैसे तमाम दलित-शोषित जातियों के लिए नहीं थी?और थी तो उन्हें समान दृष्टि से क्यों नहीं देखा गया?यह इस उपन्यास में चेतना का प्रस्थान बिंदु है।
एक तरफ गाँधी की राजनीतिक सक्रियता और हरिजन उद्धार जैसी योजनाओं ने सिर्फ ऊपरी तौर पर दलितों के सम्मान की हिमायत करती रहीं जबकि वास्तविक दृष्टि से यह कदम वर्ण व्यवस्था के भीतर दलितों की यथास्थिति को बनाए रखने का पक्षपात करती हैं।दूसरी ओर डॉ बाबा साहब अम्बेडकर का जाति उन्मूलन का प्रयास वास्तविक धरातल पर दलितों-पिछड़ों को समता, स्वतंत्रता प्रदान करने का प्रयास है।वे जाति आधारित कर्म को समाप्त करना चाहते थे।क्योंकि यह व्यवस्था व्यक्ति को पारंपरिक पेशे से बाँधे रखती है और पेशा व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का सूचक है।अपने फन में उस्ताद भीकूजी आखिर क्यों सोचता है कि"कितनी भी कलाकारी करो, कितनी भी प्रगति करो आखिर जाति तो वही रहती है।ये जात-पात, भेदभाव की बात लोग भूलते क्यों नहीं।"(22) यही वजह थी कि भीकूजी के मन में जाति व्यवस्था को लेकर घृणा पैदा हो जाती है।वह महसूस करता है कि कलाओं का भी अपना एक जातीय समीकरण होता है।उच्च वर्ग का व्यक्ति उच्च वर्ग का कलाकार होता है और निम्न वर्ग का व्यक्ति उच्च वर्ग का कलाकार होकर भी शुद्र जाति का ही होता है।कला से अलग होते ही उसकी जातीय पहचान उभर आती है।उसकी जाति उसके जन्म के साथ ही चिपक जाती है जो छूटती ही नहीं।यह बात अब बार-बार भीकूजी के जेहन में आती है।इसके साथ ही उसे याद आता है आज़ादी के दिनों में दिया जाने वाला भाषण।जिसमे जोर देकर कहा जाता था कि 'हम भारतवासी आपस में भाई-भाई हैं।हमें अपने देश की उन्नति में आपसी भेदभाव भुला कर सहयोग देना चाहिए'।(22)।
फिर भीकूजी जी के साथ भाई-भाई का व्यवहार क्यों नहीं किया जाता है?भीकूजी भी इसी देश का नागरिक है ।यदि वह भी स्वतंत्र है तो उसे शिक्षा पाने का अधिकार क्यों नहीं है?उसे ऊंची नौकरी प्राप्त करने, सम्मान का जीवन जीने और देश की उन्नति में सहयोग देने का अधिकार क्यों नहीं है?यह कुछ ऐसे सवाल थे जो बार-बार भीकूजी के जेहन में आते हैं।इन सवालों का उसे सिर्फ एक ही जबाब सूझता है शिक्षा।शिक्षा ही ने तो फुले, अण्णाभाऊ साठे और बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के जीवन को बदल दिया है।
शिक्षा और संगठन की बात,बाबा साहब का धर्मांतरण, कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन और महाड़ तालाब आंदोलन भीकूजी के मन में बैठ जाती है।वह यह भी देखता है कि महार जाति के लोगों ने बाबा साहब का अनुकरण करके अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बदल लिया है।शिक्षा का मूलमंत्र उसे मिल गया है।वह ठान लेता है कि अपनी बेटियों और बेटे को अच्छी शिक्षा देगा और अच्छी शिक्षा से उसका भी जीवन बदलेगा।लेकिन भीकूजी को यह कहाँ पता था कि शिक्षा के मंदिर में भी अन्य मंदिरों के जैसे ही कुछ खास जातियों का वर्चस्व है।वह तो तब पता चलता है जब अपने बच्चों का स्कूल में नामांकन कराता है और उन्हें न सिर्फ स्कूल में झाड़ू -पोंछा करना पड़ता है बल्कि सबसे पीछे अलग थलग बैठने, छुआछूत का शिकार होने, उपेक्षित-अपमानित होने के बाद भी दूसरे-तीसरे दर्जे से आगे नहीं बढ़ने दिया जाता है।
यहाँ से शुरुआत होती है संगठन की और संघर्ष की।भीकूजी जी और चन्दरी समझ चुके थे कि बिना संगठित हुए जातिवादी व्यवस्था से लोहा नहीं लिया जा सकता है।यह सांगठनिक चेतना उन्हें बार-बार डॉ अम्बेडकर के विचारों की ओर ले जाती है।धीरे-धीरे उन्हें हिन्दू वर्ण व्यवस्था की जड़ें भी दिखाई देने लगती हैं।बेटा रामकिसन का 8वीं में तीन बार फेल कर दिया जाना भीकूजी जी हताश करता है लेकिन वह पराजित नहीं होता है।उसे उम्मीद है कि आने वाला समय जरूर बदलेगा।इसी उम्मीद के साथ वह फिर आगे बढ़ता है और नीलिमा को खूब पढ़ाने का दृढ़ संकल्प लेता है।
नीलिमा और आकाश तीसरी पीढ़ी के ऐसे पात्र हैं जो बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के विचारों और संघर्षों को पूरी तरह से आत्मसात करते हैं।और समाज को नई दिशा देते हैं।न सिर्फ खुद आगे बढ़ते हैं बल्कि सामूहिक चेतना का विस्तार करके लोगों को संगठित करते हैं, जन जागृति के माध्यम से अनेक रूढ़ियों-कुप्रताओं का ध्वंश करते हैं।और डॉ बाबा साहब और महात्मा बुद्ध के विचारों को आत्मसात कर अंतरजातीय विवाह भी करते हैं।
उपन्यास में हिन्दू कोड बिल की भी खूब चर्चा हुई है।यह न सिर्फ दलित स्त्रीवाद बल्कि स्त्रीवाद की एक सार्थक पहल है।जो इस बात का प्रमाण है कि दलित लेखन या हाशिये का लेखन सिर्फ अपनी अस्मिताओं का लेखन नहीं है, सम्पूर्ण मानवता का लेखन है, मानवीय न्याय और करुणा का लेखन है।
नीलिमा का जीवन संघर्ष पूरी तरह से लेखिका का जीवित संघर्ष है।बीएड और हिन्दी विषय से पीएचडी की डिग्री प्राप्त करना इस तथ्य को पुष्ट करता है।वैसे तो लेखक अपनी हर कृति में मौजूद होता ही है।सुशीला जी की कहानी'सिलिया' की सिलिया और इस उपन्यास की नीलिमा में पूरा का पूरा जीवन ही समाहित दिखता है।इन पत्रों के माध्यम से लेखिका का पूरा अम्बेडकरवादी दर्शन कथा में अभिव्यक्त हो गया है।
स्त्री चेतना की दृष्टि से भी यह बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास है।दलित जीवन के साथ ही दलित स्त्री का जीवन अपनी सम्पूर्ण त्रासदी के साथ अभिव्यक्त हुआ है।लेखिका की लेखकीय चेतना में न सिर्फ महात्मा बुद्ध, फुले और डॉ अम्बेडकर के चिंतन की सघनता है, मुक्ति की प्रबल आकांक्षा भी है।
मेरा मानना है कि यह खूब पठनीय उपन्यास है और बुद्ध जी की समता,फुले की क्रांतिकारी चेतना और डॉ अम्बेडकर के शिक्षा, संगठन और संघर्ष से सराबोर भी।
मौका मिले तो जरूर पढ़ें।
डॉ. वीरेन्द्र प्रताप
इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय ,
अमरकंटक , मध्यप्रदेश के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.
डॉ. वीरेन्द्र प्रताप
इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय ,
अमरकंटक , मध्यप्रदेश के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.





