सोमवार, 25 मई 2020

शिक्षा ही गुलामी की जंजीरों को तोड़ सकती है: सुशीला टाकभौरे का उपन्यास *नीला आकाश*

डॉ. वीरेन्द्र प्रताप


साले कंजर, मेहतर, मांग, बसोर क्यों चले आते हैं पढ़ने?जाओ अपने माँ-बाप के साथ सड़कें झाड़ो, कचरा उठाओ, मैला उठाओ।होमवर्क नहीं करते, पढ़ाई नहीं करते तब कक्षा में क्यों चले आते हो।(पृष्ठ 34,नीला आकाश)"
       
यह कथन है सुशीला टाकभौरे जी के 'नीला आकाश' उपन्यास के एक मास्टर पात्र का।यहाँ मास्टर की जाति से मतलब नहीं है जरूरी यह है कि यह किस वर्ग के लिए आज़ादी के बाद भारत के शिक्षा मंदिर में कही जा रही थी।ऐसे संदर्भ अनेक दलित साहित्य में मिल जाता है।यह कोई फंतासी, लफ्फाज़ी या कपोल कल्पना नहीं है ।यह उस समय का सच है जिसे दलितों-पिछड़ों ने भोगा है।
   सुशीला टाकभौरे जी' का दो बैठक में पढ़ लिया जाने वाला उपन्यास है"नीला आकाश"।
  पृष्ठ संख्या की दृष्टि से बहुत बड़ा नहीं है।लगभग 100 पेज का उपन्यास अपने भीतर आकाश के अनंत विस्तार को समाहित करने वाला है और अनंत दूरी को कम करने वाला भी है। यहाँ आकाश असीमित ही नहीं है सीमित भी है।कहते हैं दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो कुछ भी असंभव नहीं।यही शक्ति असीम को सीमित कर देती है।
  दलित जीवन की अशिक्षा, गरीबी और उससे उपजी उपेक्षा से शुरू होकर डॉ अम्बेडकर के मौलिक सिद्धांतों को समाहित करते हुए शिक्षा, संघठन और संघर्ष की ओर बढ़ जाता है।दलित वर्ग के भीतर की जातीय संरचना और भेदभाव को भी बखूबी उठाया गया है।शिक्षा के लिए दलित समाज के संघर्ष पर खूब गहराई से चिंतन और चित्रण किया गया है।
  यह सच है कि कोई भी समाज बिना शिक्षित हुए न संगठित हो सकता है और न ही अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर सकता है।शिक्षा ही गुलामी की जंजीरों को काटती है और गुलाम बनाए जाने वाले कारणों से परिचित कराती है फिर भी जीवन के रूढ़ संस्कारों से मुक्त हो पाना आसान नहीं होता है।यह कसमकस बहुत दिनों तक चलती रहती है।इसके लिए जरूरी है परिवर्तन कामी विचारों से परिचित होना और साहित्य को पढ़ना है।
उपन्यास में अन्नाभाऊ साठे और डॉ अम्बेडकर के साहित्य की चर्चा इसीलिए बार-बार की गई है।
  एक बात जो मुझे लगती है कि बेहतर जीवन जीने का हक़ हर किसी नागरिक का अधिकार है।लेकिन बिडम्बना यह है कि यह अधिकार आज भी हर किसी को सामाजिक रूप से प्राप्त नहीं हो पाया है।तमाम हाशिए के विमर्श इसका गवाह हैं।इसलिए आज हाशिए के समाज को अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।यह सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता की लड़ाई है।यह संघर्ष किसी को अपमानित करने और पददलित करने का नहीं है।
    हमें यह समझना होगा कि न्याय के लिए संघर्ष करना अन्य के लिए अन्याय नहीं है।ऐसा सोचना एक गलतफहमी है।यही वजह है कि स्त्री, दलित, आदिवासी या अन्य हाशिए के लेखन को अक्सर संदेह की दृष्टि से न सिर्फ देखा जाता है कि वल्कि इनके अधिकारों की बात होते ही कुछ लोगों को यह महसूस होने लगता है कि उनका अधिकार छीना जा रहा है।
     आज़ादी के बाद भारतीय समाज में दलितों की स्थिति और शिक्षा के लिए संघर्ष का एक दस्तावेज है यह उपन्यास।नागपुर के पास कन्हान का क्षेत्र और वहाँ के मातंग और बाल्मीकि मुहल्ले की कहानी है यह।मातंग जाति के कुछ घरों से बना'मांग वाडा'।दरअसल ये जातियाँ सेवा के कार्य से जुड़ी हुई थीं, चाहे बाल्मीकियों का सफाई का पेशा हो या मातंगों का बाजा बजाने का इसीलिए इन्होंने अपने मुहल्ले का नाम'सेवानगर'रख लिया था।इसी मुहल्ले के भीकूजी और चन्दरी के जीवन संघर्ष से यह कहानी शुरू होती है।
   भीकूजी और चन्दरी के जीवन यापन का पारंपरिक पेशा है।भीकूजी घेरा बजाता है और चन्दरी साफ-सफाई के अलावा खाली समय में सूपा-डलिया बीनने का काम करती है।जीवन अपनी गति से चलता रहता है।उसमें कोई व्यवधान नहीं है।गरीबी को नियति मान लिया जाए तो उपेक्षा-अपमान में जीवन जीते रहना सहज हो जाता है।सदियों से दलितों-पिछड़ों के साथ यही तो होता रहा है।लेकिन समय एक जैसा नहीं होता है।बदलता है और इस बदलाव की प्रक्रिया में बहुत कुछ बदल जाता है।बस उसके लिए चाहिए एक विचार, परिवर्तन की एक चेतना,एक मानसिक द्वंद्व।मानसिक द्वन्द्व ही तो है जो जीवन में उथल-पुथल मचाता है।यह बहिर्मुखी हो या अंतर्मुखी,बाहर का हो या भीतर का।हां इतना जरूर है कि बाहर का द्वंद्व भीतर भी प्रवेश करता है, परेशान करता है।अगर ऐसा हुआ तो यह समझ जाना चाहिए कि अब स्थिति में कुछ न कुछ बदलाव जरूर होगा।
    भीकूजी और चन्दरी के भीतर भी एक द्वंद्व पैदा होता है।आज़ादी और भारतीय संविधान ने हर भारतीय नागरिक को समानता का दर्जा देता है।तो क्या यह आज़ादी भीकूजी और चन्दरी के लिए नहीं थी या उन्हीं के जैसे तमाम दलित-शोषित जातियों के लिए नहीं थी?और थी तो उन्हें समान दृष्टि से क्यों नहीं देखा गया?यह इस उपन्यास में चेतना का प्रस्थान बिंदु है।
    एक तरफ गाँधी की राजनीतिक सक्रियता और हरिजन उद्धार जैसी योजनाओं ने सिर्फ ऊपरी तौर पर दलितों के सम्मान की हिमायत करती रहीं जबकि वास्तविक दृष्टि से यह कदम वर्ण व्यवस्था के भीतर दलितों की यथास्थिति को बनाए रखने का पक्षपात करती हैं।दूसरी ओर डॉ बाबा साहब अम्बेडकर का जाति उन्मूलन का प्रयास वास्तविक धरातल पर दलितों-पिछड़ों को समता, स्वतंत्रता प्रदान करने का प्रयास है।वे जाति आधारित कर्म को समाप्त करना चाहते थे।क्योंकि यह व्यवस्था व्यक्ति को पारंपरिक पेशे से बाँधे रखती है और पेशा व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का सूचक है।अपने फन में उस्ताद भीकूजी आखिर क्यों सोचता है कि"कितनी भी कलाकारी करो, कितनी भी प्रगति करो आखिर जाति तो वही रहती है।ये जात-पात, भेदभाव की बात लोग भूलते क्यों नहीं।"(22) यही वजह थी कि भीकूजी के मन में जाति व्यवस्था को लेकर घृणा पैदा हो जाती है।वह महसूस करता है कि कलाओं का भी अपना एक जातीय समीकरण होता है।उच्च वर्ग का व्यक्ति उच्च वर्ग का कलाकार होता है और निम्न वर्ग का व्यक्ति उच्च वर्ग का कलाकार होकर भी शुद्र जाति का ही होता है।कला से अलग होते ही उसकी जातीय पहचान उभर आती है।उसकी जाति उसके जन्म के साथ ही चिपक जाती है जो छूटती ही नहीं।यह बात अब बार-बार भीकूजी के जेहन में आती है।इसके साथ ही उसे याद आता है आज़ादी के दिनों में दिया जाने वाला भाषण।जिसमे जोर देकर कहा जाता था कि 'हम भारतवासी आपस में भाई-भाई हैं।हमें अपने देश की उन्नति में आपसी भेदभाव भुला कर सहयोग देना चाहिए'।(22)।
  फिर भीकूजी जी के साथ भाई-भाई का व्यवहार क्यों नहीं किया जाता है?भीकूजी भी इसी देश का नागरिक है ।यदि वह भी स्वतंत्र है तो उसे शिक्षा पाने का अधिकार क्यों नहीं है?उसे ऊंची नौकरी प्राप्त करने, सम्मान का जीवन जीने और देश की उन्नति में सहयोग देने का अधिकार क्यों नहीं है?यह कुछ ऐसे सवाल थे जो बार-बार भीकूजी के जेहन में आते हैं।इन सवालों का उसे सिर्फ एक ही जबाब सूझता है शिक्षा।शिक्षा ही ने तो फुले, अण्णाभाऊ साठे और बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के जीवन को बदल दिया है।
   शिक्षा और संगठन की बात,बाबा साहब का धर्मांतरण, कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन और महाड़ तालाब आंदोलन भीकूजी के मन में बैठ जाती है।वह यह भी देखता है कि महार जाति के लोगों ने बाबा साहब का अनुकरण करके अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बदल लिया है।शिक्षा का मूलमंत्र उसे मिल गया है।वह ठान लेता है कि अपनी बेटियों और बेटे को अच्छी शिक्षा देगा और अच्छी शिक्षा से उसका भी जीवन बदलेगा।लेकिन भीकूजी को यह कहाँ पता था कि शिक्षा के मंदिर में भी अन्य मंदिरों के जैसे ही कुछ खास जातियों का वर्चस्व है।वह तो तब पता चलता है जब अपने बच्चों का स्कूल में नामांकन कराता है और उन्हें न सिर्फ स्कूल में झाड़ू -पोंछा करना पड़ता है बल्कि सबसे पीछे अलग थलग बैठने, छुआछूत का शिकार होने, उपेक्षित-अपमानित होने के बाद भी दूसरे-तीसरे दर्जे से आगे नहीं बढ़ने दिया जाता है।
 यहाँ से शुरुआत होती है संगठन की और संघर्ष की।भीकूजी जी और चन्दरी समझ चुके थे कि बिना संगठित हुए जातिवादी व्यवस्था से लोहा नहीं लिया जा सकता है।यह सांगठनिक चेतना उन्हें बार-बार डॉ अम्बेडकर के विचारों की ओर ले जाती है।धीरे-धीरे उन्हें हिन्दू वर्ण व्यवस्था की जड़ें भी दिखाई देने लगती हैं।बेटा रामकिसन का 8वीं में तीन बार फेल कर दिया जाना भीकूजी जी हताश करता है लेकिन वह पराजित नहीं होता है।उसे उम्मीद है कि आने वाला समय जरूर बदलेगा।इसी उम्मीद के साथ वह फिर आगे बढ़ता है और नीलिमा को खूब पढ़ाने का दृढ़ संकल्प लेता है।
  नीलिमा और आकाश तीसरी पीढ़ी के ऐसे पात्र हैं जो बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के विचारों और संघर्षों को पूरी तरह से आत्मसात करते हैं।और समाज को नई दिशा देते हैं।न सिर्फ खुद आगे बढ़ते हैं बल्कि सामूहिक चेतना का विस्तार करके लोगों को संगठित करते हैं, जन जागृति के माध्यम से अनेक रूढ़ियों-कुप्रताओं का ध्वंश करते हैं।और डॉ बाबा साहब और महात्मा बुद्ध के विचारों को आत्मसात कर अंतरजातीय विवाह भी करते हैं।
   उपन्यास में हिन्दू कोड बिल की भी खूब चर्चा हुई है।यह न सिर्फ दलित स्त्रीवाद बल्कि स्त्रीवाद की एक सार्थक पहल है।जो इस बात का प्रमाण है कि दलित लेखन या हाशिये का लेखन सिर्फ अपनी अस्मिताओं का लेखन नहीं है, सम्पूर्ण मानवता का लेखन है, मानवीय न्याय और करुणा का लेखन है।
  नीलिमा का जीवन संघर्ष पूरी तरह से लेखिका का जीवित संघर्ष है।बीएड और हिन्दी विषय से पीएचडी की डिग्री प्राप्त करना इस तथ्य को पुष्ट करता है।वैसे तो लेखक अपनी हर कृति में मौजूद होता ही है।सुशीला जी की कहानी'सिलिया' की सिलिया और इस उपन्यास की नीलिमा में पूरा का पूरा जीवन ही समाहित दिखता है।इन पत्रों के माध्यम से लेखिका का पूरा अम्बेडकरवादी दर्शन कथा में अभिव्यक्त हो गया है।
स्त्री चेतना की दृष्टि से भी यह बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास है।दलित जीवन के साथ ही दलित स्त्री का जीवन अपनी सम्पूर्ण त्रासदी के साथ अभिव्यक्त हुआ है।लेखिका की लेखकीय चेतना में न सिर्फ महात्मा बुद्ध, फुले और डॉ अम्बेडकर के चिंतन की सघनता है, मुक्ति की प्रबल आकांक्षा भी है।

    मेरा मानना है कि यह खूब पठनीय उपन्यास है और बुद्ध जी की समता,फुले की क्रांतिकारी चेतना और डॉ अम्बेडकर के शिक्षा, संगठन और संघर्ष से सराबोर भी।
मौका मिले तो जरूर पढ़ें।

डॉ. वीरेन्द्र प्रताप 
इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय ,
अमरकंटक , मध्यप्रदेश के  हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.

शुक्रवार, 15 मई 2020



दुनिया के बादशाह की हकीकत उर्फ़ कोरोना काल में नस्लीय भेदभाव:  द ब्लैक प्लेग 
(किंगा यामहत्ता टायलर अमेरिकी विद्वान् लेखिका हैं. वह अमेरिका के प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में अफ्रीकन-अमेरिकन स्टडीज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. उन्होंने 'ब्लैक लाइव मास्टर टू ब्लैक लिबरेशन'  शीर्षक से एक किताब भी लिखी है और इस किताब के लिए सन २०१६ में लंनन फाउंडेशन की ओर से 'कल्चरल फ्रीडम अवार्ड' भी दिया गया था. इनका ' द ब्लैक प्लेग' शीर्षक यह लेख 16 अप्रैल को न्यू यॉर्ककर में छपा था. इस लेख में अमेरिकी  चिकित्सा प्रणाली और वहां के समाज  में व्याप्त  नस्लीय भेदभाव को चिन्हित किया गया है.) 
यह लेख 'न्यू यॉर्ककर ' से  साभार प्रकाशित किया जा रहा है. 



किंगा यामहत्ता टायलर
(अनुवाद : राम नरेश राम)
पुरानी अफ्रीकन-अमेरिकन कहावत है “ जब स्वेत अमेरका को ठण्ड लगती है तो अश्वेत अमेरिका को न्यूमोनिया हो जाता है” अब यह कुछ इस तरह हो गयी है “ श्वेत अमेरिका को जब नावेल कोरोना हो रहा है तो अश्वेत अमेरिका मर रहा है.”
कोरोना वायरस से हजारों श्वेत अमेरिकी भी मर चुके हैं लेकिन जिस पैमाने पर अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों की मौतें हो रही हैं उसने यहाँ की स्वास्थ्य व्यवस्था को नस्लीय और वर्गीय गैरबराबरी के मामले में एक सबक की चीज बना दिया है. रायटर्स की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में किसी और समूह की तुलना में अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों की मौतें ज्यादा हो रही हैं. यह कोरोना संकट की शुरूआती स्थिति है, इसलिए यह आंकड़ा अभी अधूरा है लेकिन अमेरिका में नस्लीय भेदभाव की स्थिति को समझने के लिए यह पर्याप्त है.    


उत्तरपूर्व और मध्यपश्चिम के बाहर लुसियाना में संक्रमितों की संख्या इक्कीस हजार से ज्यादा बताई गयी है. जब राज्य के गवर्नर जॉन बेल एडवर्ड्स ने हाल ही में घोषणा किया कि वे जिनकी मृत्यु हुई है उनसे जुड़े हुए नस्लीय और स्थानिक आंकड़े जल्द ही उपलब्द्ध कराना शुरू करेंगे, उन्होंने अपनी घोषणा में दुखद जानकारी यह दिया कि लुसियाना की कुल आबादी का ३३ प्रतिशत अफ्रीकन-अमेरिकन हैं जबकि यहाँ कोरोना से हुई कुल मौतों का ७० प्रतिशत इन्हीं में से है.
 जार्जिया का छोटा शहर अल्बनी जो साऊथ अटलांटा से दो सौ मील दूर है, वह १९६० के दशक में शहर के अश्वेत निवासियों और श्वेत पुलिस अधिकारियों के बीच नागरिक अधिकारों पर व्यापक संघर्ष का केंद्र बन गया था.  आज 12 सौ से अधिक लोग इस क्षेत्र(काउंटी) में कोरोना से संक्रमित पाए गए हैं और कम से कम ७८ लोगों की मौत हो गयी है. हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार ८१ प्रतिशत मौतें अफ्रीकन-अमेरिकन की हुई हैं.
मिशिगन में अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों की संख्या राज्य की कुल जनसँख्या का 14 प्रतिशत है इनमे से 30 प्रतिशत लोग संक्रमित हो गए हैं, जबकि 40 प्रतिशत लोगों की मौत हो चुकी है. राज्य में कुल संक्रमितों का 26 प्रतिशत और कुल मौत का २५ प्रतिशत डेट्रॉइट शहर में है जहाँ ७९ प्रतिशत अफ्रीकन-अमेरिकन की संख्या है. इसके उपनगर में जहाँ अश्वेत लोंगों की संख्या ज्यादा है वहां भी कोविड-१९ तबाही मचा रहा है.
वायरस ने सिकागो में अफ्रीकन-अमेर्रिकन लोगों को हिला कर रख दिया है जहाँ के कुल संक्रमित लोगों की संख्या का ५२ प्रतिशत ये ही लोग हैं और कुल मौत का ७२ प्रतिशत भी इन्हीं लोगों का है. इस शहर में भी इनकी संख्या का अनुपात सबसे ज्यादा है.
 जैसा की पहले से ही लोग जानते हैं कि अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों का स्वास्थ्य की परिस्थितियां पहले से ही बहुत ख़राब हैं यही कारण है भयंकर बीमारी उन्हीं के लिए  ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है. यह बिलकुल सत्य है. सुगर, अस्थमा, ह्रदय रोग और मोटापा जैसी बीमारियों की परिस्थियाँ ही इनके लिए खतरनाक कारण बन रही हैं. जैसा कि विद्वान् रूथी विल्सन गिलमोर कई वर्षों से इस बात को कहती हैं कि अमेरिका में लम्बे समय से व्याप्त नस्लीय भेदभाव ने उनके असमय मृत्यु दर को बढ़ा दिया है. अमेरिकन गुलामी के रूप में नस्लीय भेदभाव ने लगभग सभी अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों के जीवन की सभी संभावनाओं को कम कर दिया है. काले लोग सबसे गरीब हैं और उनमें से बहुत सारे लोगों के पास कोई रोजगार नहीं है, ख़राब घरों में रहने को मजबूर हैं और उनको उनकी नस्ल के कारण सबसे ख़राब स्वास्थ्य सुविधाएँ मिल पाती हैं. इसी से पता चलता है कि स्वेत अमेरिकन की तुलना में 60 प्रतिशत अफ्रीकन-अमेरिकन लोग सुगर के शिकार क्यों हैं और स्वेत महिलाओं की तुलना में 60 प्रतिशत अश्वेत महिलाएँ उच्च रक्त चाप की बीमारी से ग्रसित क्यों हैं. इस तरह की स्वास्थ्य विषमता, सामूहिक कैद जैसी जिंदगी या आवासीय सुविधाओं में भेदभाव जैसी चीजें नस्लीय भेदभाव के सबसे बड़े सबूत हैं.
अफ्रीकन अमेरिकन लोगों की इस असंतुलित स्वास्थ्य सुविधाओं की परिस्थियों के कारण यह समझना आसान है कि आखिर अमेरिका में इनकी मृत्यु दर बढ़ने के कारण क्या हैं. लेकिन यह भी जानना जरुरी है कि खासतौर पर अश्वेत लोगों की मौतें इसलिए ज्यादा हो रही हैं क्योंकि कोरोना के मामले में संघीय सरकार का रवैया लगातार उपेक्षापूर्ण है. जितना बड़ा नरसंहार ट्रम्प के अमेरिका में हो रहा है उतना कभी नहीं हुआ. कोविड-19 की जाँच बेहद असंगत ढंग से हो रही है और अनुपलब्द्ध भी है इसीलिए इसका प्रभाव संभावित सीमा रेखा को भी पार कर गया है. फिलाडेल्फिया में ड्रेक्सेल यूनिवर्सिटी के एक वैज्ञानिक ने पाया कि ज़िप कोड्स में ‘कम अनुपात वाले अल्पसंख्यकों और ऊँची आया वाले लोगों की’ सबसे ज्यादा संख्या में जाँच की गयी. जबकि ज़िप कोड्स में बेरोजगार और बिना बिमा वाले निवासियों की संख्या सबसे ज्यादा है लेकिन उनका सबसे कम टेस्ट किया गया. उच्च आय वाले पड़ोसियों की जाँच गरीबों की तुलना में छः गुना ज्यादा हुई है.
असंगत ढंग से जाँच और इस वायरस के खतरे को वाइट हॉउस की तरफ से लगातार इंकार करने के कारण इस तबाही से निपटने की तैयारी में कमी रह गयी. इस संकट से पूरी क्षमता के साथ लड़ने के लिए शुरू में ही अस्पतालों में आवश्यक उपकरण और पर्याप्त संख्या में कर्मचारियों की व्यवस्था होनी चाहिए थी. अब इसके परिणाम विनाशकारी हो गए हैं. डेट्रॉइट क्षेत्र में जहाँ बीमारी बढ़ रही है, अस्पताल के 15 सौ कर्मचारी जिसमें मिशीगन की सबसे बड़ी अस्पताल व्यवस्था बौमोंट हेल्थ की 5 सौ नर्स भी शामिल हैं, कोरोना वायरस के लक्षणों के चलते नौकरी पर नहीं हैं. संकट के शुरुआत में न्यू यॉर्क शहर के माउंट सिनाई हॉस्पिटल की नर्सें अपनी सुरक्षा के लिए कूड़ा फेंकने वाली पोलीथिन पहनने के लिए मजबूर हुईं. पूरे देश में स्वास्थ्य कर्मचारियों को अपना चेहरा और पूरे शरीर को ढंकने के लिए कहा जा रहा है इसी उपलब्द्ध विकल्प के कारण इन कर्मचारियों के संक्रमण में आश्चर्यजनक रूप से इजाफ़ा हो रहा है और जिसके चलते पहले से ही मरीजों से भरे हुए अस्पतालों पर दबाव बढ़ता जा रहा है.

गुरुवार, 14 मई 2020

उनकी दुनिया का इतिहास चक्र पीछे घूम जायेगा

(फेसबुक से साभार )
राम नरेश राम

दुनिया आज एक ऐसी महामारी से खौफजदा है जिसका कोई चिकित्सकीय हल अभी निकट के दिनों में नहीं दिख रहा है। इसलिए अनुमान है कि इसकी विकरालता और इससे उपजने वाले संकट लंबे समय तक बरक़रार रहेंगे। इसने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था को जन्म दिया है जिसमें हर कोई एक दूसरे को संदेह की नजर से देख रहा है। चाह कर भी लोग अपने परिजनों के प्रति आवयविक ढंग से लगाव और प्यार व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं। इसने एक खास तरह की अलगाववादी भावना को जन्म दिया है। इस अलगाव से लड़ने के तरीके के तौर पर तकनिकी ने  एक माध्यम के रूप में विकल्प मुहैया कराया है। हमें भूलना नहीं चाहिए। यह वही तकनिकी है जिसके बारे में यह कहा जा रहा था कि इसने मनुष्य के बीच कायम भौतिक दूरी को नजदीकी आभास में भले ही बदल दिया है। लेकिन यह आभासी नजदीकी आवयविक भौतिक नजदीकी का विकल्प नहीं हो सकती। इस तकनिकी ने हमारे चिंतन पद्धति को बदल दिया है। फेसबुक जैसे माध्यमों पर किसी विषय विशेष पर मित्र सूची के लोगों के आपसी संवाद की प्रकृति के बारे में लोगों का मूल्यांकन यह होता था कि अपनी प्रतिक्रियाओं में लोग कठोर होते जा रहे हैं। लेकिन वे ही मित्र जब भौतिक रूप से एकदूसरे के आमने सामने होकर संवाद करते हैं तो उस संवाद की प्रकृति और आपसी सद्भाव का स्तर ज्यादा मानवीय होता है। क्या कोरोना काल ने अब उस आभासी कही जाने वाली दुनिया के व्यवहार को भौतिक व्यवहार में बदल दिया है? क्या हम अब इस आभासी कही जाने वाली दुनिया में सहज होते जा रहे हैं? क्या मनुष्य का व्यवहार,उसका स्वाभव पूरी तरह बदल जायेगा? क्या हमारे पुराने किस्म के सामाजिक व्यवहार बीते जमाने की बात हो जायेगे? निःसंदेह दुनिया के एक हिस्से का स्वाभाव और व्यवहार हमेशा के लिए बदल जायेगा। यह अनायास ही नहीं  है कि दुनिया के अनेक चिंतकों ने कोरोना के बाद दुनिया के बदल जाने की बात कही है। लेकिन यह बदली हुई दुनिया कुछ लोगों के आधिपत्य की दुनिया होगी। एक तरफ तकनिकी के बेतहाशा प्रयोग से आधुनिकता के दूसरे चरण की जहाँ पुष्टि होगी वहीँ कुछ लोगों के लिए दुनिया के इतिहास का चक्र पीछे की तरफ घूम जायेगा। दुनिया में पहले से व्याप्त गैरबऱाबरी की गली और चौड़ी हो जायेगी।
यह महज संयोग नहीं है कि दुनिया भर की राज्य व्यवस्थाओं के लिए यह बीमारी एक 'अवसर' लेकर आई है। वे इस अवसर का इतेमाल अपने आप को एकाधिकारवादी ढंग से मजबूत करने में कर रही हैं। अनेकों लोग इस बात को महसूस कर रहे हैं कि राज्य व्यवस्थाएँ नागरिक निगरानी तंत्र को बढाकर राज्य की शक्ति में बेहिसाब बढ़ोत्तरी कर रही हैं। इस मामले में वे उसी तकनिकी का सहारा ले रही हैं जिनके सहारे नागरिक अपने अलगाव की संभावित क्षणिक परिस्थिति से लड़ने या उबरने की कोशिश कर रहे हैं। जिनकी इस तकनिकी तक पहुँच है उसका एक बड़ा हिस्सा उबर सकता है लेकिन उनका क्या होगा जिनकी इस तकनिकी तक पहुँच ही नहीं है। जो लोग महानगरों से अपने घरों के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल रहे हैं अगर उनके पास इस तकनिकी तक पहुँच की क्षमता होती तो शायद उनको यह जानकारी होती कि ट्रेन चल रही है और वे चलते हुए थककर ट्रैक पर निश्चिन्त भाव से सोते हुए अपनी जान नहीं गवांते। लोगों का अपने घरों को किसी भी सूरत में पहुँचने की अदम्य इच्छा राज्य व्यवस्था से उनके भरोषे के टूटने के अलावा कुछ भी नहीं है। बहुतेरे दृश्य हैं जिनमे लोग अपनी जगहों पर पहुंचकर वहाँ की धरती को चूमते हुए दिख रहे हैं। इन दृश्यों को मामूली अर्थों में नहीं लिया जा सकता है। दुनिया आज एक ऐसी महामारी से खौफजदा है जिसका कोई चिकित्सकीय हल अभी निकट के दिनों में नहीं दिख रहा है। इसलिए अनुमान है कि इसकी विकरालता और इससे उपजने वाले संकट लंबे समय तक बरक़रार रहेंगे। इसने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था को जन्म दिया है जिसमें हर कोई एक दूसरे को संदेह की नजर से देख रहा है। चाह कर भी लोग अपने परिजनों के प्रति आवयविक ढंग से लगाव और प्यार व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं। इसने एक खास तरह की अलगाववादी भावना को जन्म दिया है। इस अलगाव से लड़ने के तरीके के तौर पर तकनिकी ने  एक माध्यम के रूप में विकल्प मुहैया कराया है। हमें भूलना नहीं चाहिए। यह वही तकनिकी है जिसके बारे में यह कहा जा रहा था कि इसने मनुष्य के बीच कायम भौतिक दूरी को नजदीकी आभास में भले ही बदल दिया है। लेकिन यह आभासी नजदीकी आवयविक भौतिक नजदीकी का विकल्प नहीं हो सकती। इस तकनिकी ने हमारे चिंतन पद्धति को बदल दिया है। फेसबुक जैसे माध्यमों पर किसी विषय विशेष पर मित्र सूची के लोगों के आपसी संवाद की प्रकृति के बारे में लोगों का मूल्यांकन यह होता था कि अपनी प्रतिक्रियाओं में लोग कठोर होते जा रहे हैं। लेकिन वे ही मित्र जब भौतिक रूप से एकदूसरे के आमने सामने होकर संवाद करते हैं तो उस संवाद की प्रकृति और आपसी सद्भाव का स्तर ज्यादा मानवीय होता है। क्या कोरोना काल ने अब उस आभासी कही जाने वाली दुनिया के व्यवहार को भौतिक व्यवहार में बदल दिया है? क्या हम अब इस आभासी कही जाने वाली दुनिया में सहज होते जा रहे हैं? क्या मनुष्य का व्यवहार,उसका स्वाभव पूरी तरह बदल जायेगा? क्या हमारे पुराने किस्म के सामाजिक व्यवहार बीते जमाने की बात हो जायेगे? निःसंदेह दुनिया के एक हिस्से का स्वाभाव और व्यवहार हमेशा के लिए बदल जायेगा। यह अनायास ही नहीं  है कि दुनिया के अनेक चिंतकों ने कोरोना के बाद दुनिया के बदल जाने की बात कही है। लेकिन यह बदली हुई दुनिया कुछ लोगों के आधिपत्य की दुनिया होगी। एक तरफ तकनिकी के बेतहाशा प्रयोग से आधुनिकता के दूसरे चरण की जहाँ पुष्टि होगी वहीँ कुछ लोगों के लिए दुनिया के इतिहास का चक्र पीछे की तरफ घूम जायेगा। दुनिया में पहले से व्याप्त गैरबऱाबरी की गली और चौड़ी हो जायेगी।
फेसबुक से साभार 
यह महज संयोग नहीं है कि दुनिया भर की राज्य व्यवस्थाओं के लिए यह बीमारी एक 'अवसर' लेकर आई है। वे इस अवसर का इतेमाल अपने आप को एकाधिकारवादी ढंग से मजबूत करने में कर रही हैं। अनेकों लोग इस बात को महसूस कर रहे हैं कि राज्य व्यवस्थाएँ नागरिक निगरानी तंत्र को बढाकर राज्य की शक्ति में बेहिसाब बढ़ोत्तरी कर रही हैं। इस मामले में वे उसी तकनिकी का सहारा ले रही हैं जिनके सहारे नागरिक अपने अलगाव की संभावित क्षणिक परिस्थिति से लड़ने या उबरने की कोशिश कर रहे हैं। जिनकी इस तकनिकी तक पहुँच है उसका एक बड़ा हिस्सा उबर सकता है लेकिन उनका क्या होगा जिनकी इस तकनिकी तक पहुँच ही नहीं है। जो लोग महानगरों से अपने घरों के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल रहे हैं अगर उनके पास इस तकनिकी तक पहुँच की क्षमता होती तो शायद उनको यह जानकारी होती कि ट्रेन चल रही है और वे चलते हुए थककर ट्रैक पर निश्चिन्त भाव से सोते हुए अपनी जान नहीं गवांते। लोगों का अपने घरों को किसी भी सूरत में पहुँचने की अदम्य इच्छा राज्य व्यवस्था से उनके भरोषे के टूटने के अलावा कुछ भी नहीं है। बहुतेरे दृश्य हैं जिनमे लोग अपनी जगहों पर पहुंचकर वहाँ की धरती को चूमते हुए दिख रहे हैं। इन दृश्यों को मामूली अर्थों में नहीं लिया जा सकता है।

शुक्रवार, 8 मई 2020

पितृसत्ता की सैद्धांतिकी: लिंडसी जर्मन


लिंडसी जर्मन
पितृसत्ता की सैद्धांतिकी
                 (Spring 1981)
(लिंडसी जर्मन का जन्म लन्दन में सन १९५१ में हुआ था. वह लम्बे समय तक ब्रिटेन की सोसलिस्ट वर्कर्स पार्टी की सदस्य रहीं और इसकी पत्रिका सोसलिस्ट रिव्यू की संपादक रही हैं. इन्होने बहुत सारी चर्चित किताबें लिखी हैं.)
·         मटेरियल गर्ल: वोमेन, मेन एंड वर्क  
·         सेक्स क्लास एंड सोस्लिज्म
·         पीपल्स हिस्ट्री आफ लन्दन                      

·
अंतरराष्ट्रीय समाजवाद2:12, Spring 1981.
Copied with thanks from the 
International Socialism Website. (से साभार )
Marked up by 
Einde O’Callaghan for the Encyclopaedia of Trotskyism On-Line (ETOL)

                                    प्रस्तुत है इस लेख के एक हिस्से का हिंदी अनुवाद 

आज के स्त्री आन्दोलन के इर्दगिर्द सबसे मजबूत और व्यापक सिद्धांत संभवतः पितृसत्ता है. इसके अनेकों रूप हैं लेकिन इसके पीछे के विचार जैसे पुरुष वर्चस्व या लैंगिक भेदभाव ऐसी चीजें हैं जो पूंजीवाद का उत्पाद नहीं हैं लेकिन पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली से बिलकुल अलग और इसके परे होने की बात को इतना व्यापक स्तर पर स्वीकार कर लिया गया है कि यही पूर्ण और मूल बात मान ली गयी है.
इस तरह के सिद्धांतों में यह समझदारी निहित होती है कि  महिलाओं के दमन और परिवार की प्रकृति में कैसे ऐतिहासिक रूप से बदलाव हुए हैं. किसी भी देश में एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के होने वाले दमन में कोई अंतर नहीं होता है. यह अंतिम सत्य है कि महिलाओं के दमन का प्रमुख कारण पितृसत्ता है.

यह बात इसलिए भी सत्य है क्योंकि महिलाओं का दमन पश्चिमी पूंजीवादी देशों के वर्ग आधारित समाजों के आलावा रूस, चीन, क्यूबा, पूर्वी यूरोप जैसे तथाकथित समाजवादी समाजों में भी मौजूद है.  
पितृसत्ता का सिद्धांत महिला आन्दोलन की उस व्यापक स्वीकृत धारणा को बल पहुंचाता है कि महिला आन्दोलन के संघर्षों को अलग अलग चलाना होगा. क्योंकि समाजवाद और मजदूरों का आन्दोलन पूंजीवाद के खिलाफ लड़ता है जबकि महिलाओं का आन्दोलन पितृसत्ता के ख़िलाफ़ अलग लड़ाई लड़ता है. संघर्षों को अलग करने का तर्क भविष्य में हर लिंग के सामाजिक विकास को निर्धारित करेगा. यह वह तर्क है जिसे पितृसत्ता के सिद्धांत को मानने वाला कोई भी व्यक्ति स्वीकार नहीं करेगा. लेकिन अगर वास्तव में पितृसत्ता कोई ऐसी चीज है जिसके कारण सभी पुरुष सभी महिलाओं का दमन करते हैं तब महिलाओं और पुरुषों के एक साथ मिलकर लड़ने से इसे कैसे ख़त्म किया जा सकता है?
इस सन्दर्भ में मैं अलग ढंग से अपना तर्क प्रस्तुत करना चाहती हूँ. मैं पितृसत्त्ता की अवधारणा को ख़ारिज करती हूँ. महिला दमन ( महिला दमन को न व्यक्त कर पाने के सन्दर्भ में) को व्यक्त करने का दावा करने वाला यह शब्द अव्यवस्थित है और यह पूरी तरह से एक आदर्शवादी धारणा को व्यक्त करता है जिसका कोई वस्तुगत आधार नहीं है. मैं यह दिखाना चाहती हूँ कि स्त्रियों के दमन का लाभ पुरुष को नहीं बल्कि पूंजी को होता है. मैं उस तरीके पर विचार करना चाहती हूँ जिसमें परिवार बदल चुका है और इसकी वजह से महिलाओं की अपने बारे में खुद की धारणा बदल चुकी है. इस तरह से देखने पर यह पता चलेगा कि महिलाओं का निरंतर दमन पुरुषों के षड्यंत्र ( या पुरुष मजदूर और पूंजीपति वर्ग के गठजोड़) का परिणाम नहीं है. यह दुनिया के हर हिस्से में वर्ग आधारित समाज की निरंतरता के कारण है. महिलाओं की मुक्ति का दावा करने वाले समाजवादी देशों के समाजों में भी यही बात लागू होती है.
अंतत मैं उस सवाल को स्वीकार करना चाहती हूँ जो समाजवादियों के ऊपर हमेशा थोपे जाते हैं. एंगेल्स और शुरूआती मार्क्सवादियों ने यह माना कि सर्वहारा परिवार (बुर्जुआ परिवार के विपरीत) ख़त्म हो जायेगा क्योंकि यह संपत्ति पर आधारित नहीं है. स्पष्ट तौर पर यह नहीं हुआ. चुकी मैं यह विश्वास नहीं करती हूँ कि इसका कारण पितृसत्ता है. मैं इसके लिए उन चीजों पर विचार करना चाहती हूँ जिसके कारण परिवार बचा हुआ है.

सिद्धांत के विविध रूप
पितृसत्तात्मक सिद्धांत का मजेदार पहलू यह है कि यह सभी लोगों में व्याप्त हर चीज में देखा जा सकता है. यह अस्पष्ट भावनाओं पर आधारित होता है. इसलिए इसके  भौतिकवादी आधारों की व्याख्या के बजाय महिला आन्दोलन के तमाम हिस्सों में इसको मान्यता हासिल है.इसके इतने सारे रूप हैं कि इसके लिए किसी एक पारिभाषिक शब्द का निर्धारण कठिन है.
उदाहरण के तौर पर पितृसत्ता का अर्थ उस विशेष समाज से है जिसमे पिता न केवल महिलाओं पर बल्कि अपने से उम्र में छोटे पुरुषों पर भी शासन करता है. इस तरह का समाज आंशिक तौर पर घरों में किसान या शिल्पी वर्ग के उत्पादन के आधारों पर निर्भर करता है. ‘पिता की सत्ता’ उत्पादित संपत्ति पर उसके अधिकार और जमीन के ऊपर मालिकाना हक़ से प्राप्त होती है. लेकिन अधिकांश मामलों में ऐतिहासिक रूप से विशिष्ट समाज का अर्थ उस पद से नहीं जुड़ता है. यहाँ तक कि पितृसत्ता के सिद्धांतों को मानने वाले भी इस बात को देख सकते हैं कि आज हम इस तरह के किसान समाज में नहीं रहते हैं जिसका मुख्य सरोकार आज के महिला दमन को संचालित करना है.  
सिद्धांत के प्रमुख संस्करणों के दो रूप हैं.
पहला, कुछ लोग हैं जो पितृसत्ता को शुद्ध रूप से वैचारिक पदावली के रुप में देखते हैं. उदाहरण के रूप में जूलिएट मिशेल एक साफ अंतर करती हैं: “ हम दो स्वायत्त क्षेत्रों को लेकर चलते हैं, पूंजीवाद का आर्थिक पहलू और पितृसत्ता का वैचारिक आधार.” शैली अलेक्जेंडर और बारबरा टायलर भी पितृसत्ता के पक्ष में इसी तरह के तर्क देती हैं.
इस तरह के आर्थिक और वैचारिक अलगाव की जांच होनी चाहिए. समाज के आर्थिक आधारों और उस समाज में बनने वाले विचारों के बीच सदैव एक सम्बन्ध होता है. दोनों को अलग-अलग चीज के तौर पर नहीं देखा जा सकता है. जैसा कि मार्क्स ने बहुत पहले उल्लेख किया था कि यदि आप इतिहास को वर्चस्वशाली विचारों या परंपरागत विचारों के परिणाम के रूप में देखेंगे तो समाज के विकास के बारे में कोई भी व्याख्या नहीं कर पायेंगे. कोई विचार अगर वर्चस्व में होता है तो किसलिए? और वर्चस्व वाला विचार बदलता क्यों है?


अगर हम महिलाओं की स्थिति के प्रति जिम्मेदार धार्मिक धारणा को ख़ारिज भी कर दें, तो हमें उस भौतिक परिस्थिति के बारे में विचार करना पड़ेगा जिसने संसार में मनुष्य को एक दूसरे के प्रति खास संबंधों के दायरे में काम करने को प्रेरित किया है. महिलाओं के दमन के उद्भव को इन्हीं चीजों में देखा जाना चाहिए जैसे किसी और सामाजिक परिघटना के उद्भव को देखा जाता है. तभी हम पितृसत्ता और महिला दमन को प्रश्रय देने वाले विचारों और पितृसत्ता के ख़िलाफ़ उठने वाले संघर्षों को हम सार्थक ढंग से समझ सकते हैं.
सन १८४५ में मार्क्स ने जो लिखा, वह समाज में और दूसरी किसी चीज पर जितना लागू होता है उतना ही महिला दमन के सन्दर्भ में भी लागू होता है:
हम चीजों का निर्धारण पुरुषों के कथन,कल्पना और अभिग्रहण से नहीं करते हैं इसके बारे में भी कि आखिर पुरुष के शरीर में बदलाव कैसे आये. दरसल हम सक्रीय मनुष्य के बारे में किसी चीज का निर्धारण सत्य और मनुष्य के वास्तविक जीवन की प्रक्रिया के आधार पर करते हैं और इसी के आधार पर हम उसकी वैचारिक अभिव्यक्तियों और प्रतिध्वनियों के विकास क्रम को भी निर्धारित करते हैं. नैतिकता, धर्म आध्यात्म सभी विचारधाराएँ और इनसे जुड़े हुए चेतना के अनेकों रूप भी अधिक समय तक स्वायत्त रूप में नहीं देखे जा सकते हैं अर्थात ये एक दूसरे से गहरे स्तर पर जुडे हुए हैं. स्वतंत्र रूप से इनका कोई इतिहास नहीं है, कोई विकास नहीं है बल्कि इनका इतिहास और विकास मनुष्य के भौतिक उत्पादन और पदार्थ के साथ मनुष्य के रिश्ते, उसके वास्तविक अस्तित्व, चिंतन और चिंतन के उत्पाद का ही इतिहास है. जीवन चेतना से नहीं बल्कि चेतना जीवन से निर्धारित होती है.  
इसके उलट पितृसत्ता को एक स्वतंत्र ‘विचारधारा’ मानने के लिए यह मानना होगा कि विचार स्वायत्त होते हैं. तब महिलाओं की मुक्ति के लिए चलने वाले संघर्षों का  भौतिक शोषण के ख़िलाफ़ चलने वाले संघर्षों के साथ कोई भी रिश्ता ख़त्म हो जायेगा, जिसके तहत लाखों महिला और मजदूरों के सरोकारों में एकता कायम हो सकती है. यह तो वही बात हो जाएगी जो अलेक्जेंडर और टायलर कहती हैं. उनके अनुसार समाज परिवर्तन के बजाय लोगों के विचारों को बदलने के लिए एक सांस्कृतिक संघर्ष की जरुरत है. इसी से यह पता चलता है कि महिला आन्दोलन की स्वायत्तता का विचार कैसे विकसित होता है. यदि विचार आर्थिक शोषण की प्रक्रिया से स्वायत्त हैं, तो महिलाओं के दमन के ख़िलाफ़ होने वाले संघर्ष स्वायत्त क्यों नहीं?
कुछ महिलाओं ने इसमें अंतर्विरोध देखा है इसलिए हाल ही में पितृसत्ता के  भौतिकवादी सिद्धांत को विकसित करने की कोशिश किया है. उनका तर्क है कि महिलाओं के दमन से पुरुषों को लाभ मिलता है और पुरुषों द्वारा यह दमन इसलिए संभव हो पाता है क्योंकि स्त्री और पुरुष में मूल जैविक अंतर होता है. पितृसत्ता का मूल आधार यहाँ है जैसा कि राबर्ट हेमिल्टन कहती हैं:
पितृसत्ता की विचारधारा के बारे में स्त्रीवादी विश्लेषणों में खुद कहा गया है कि किसी भी समाज का पितृसत्तात्मक ढांचा ही पुरुष वर्चस्व और स्त्री पराधीनता की व्यवस्था को परिभाषित करता है. लेकिन (विचारधारा) पितृसत्ता का आधार स्त्री और पुरुष के बीच के जैविक भिन्नता को माना जाता है. इसी को इसका ऐतिहासिक आधार भी सिद्ध किया जाता है.
क्रिस्टिन डेल्फी ‘द मेन एनमी’ में क्रान्तिकारी नारीवादी दृष्टिकोण से इसी तरह का भौतिकवादी तर्क प्रस्तुत करती हैं. इसी तरह का प्रयास लेकिन मार्क्सवादी श्रेणियों का प्रयोग करते हुए हैदी हार्टमन भी करती हैं. यही वह बात है जिसको बहुत हद तक मैं देखना चाहती हूँ. अगर इस तरह के तर्क गलत दिखाए जायेंगे तो पितृसत्ता के सिद्धांत और मार्क्सवाद के बीच जुड़ाव के सारे प्रयास विफल हो जायेंगे.
 
क्या पुरुष महिलाओं के शोषक हैं?
हार्टमन पितृसत्ता को “पुरुषों के बीच के सामाजिक संबंधों के ऐसे समुच्चय के रूप में परिभाषित करती हैं जिसका भौतिक आधार है, यह वर्चस्ववादी है, आतंरिक परनिर्भरता पैदा करता है या पुरुषों के बीच ऐसी एकजुटता कायम करता है जिसके कारण वे महिलाओं के ऊपर शासन करने में समर्थ हो जाते हैं.” वह आगे कहती हैं “पितृसत्ता का भौतिक आधार मूल रूप से पुरुषों द्वारा महिलाओं के श्रम शक्ति पर कायम नियंत्रण में छुपा हुआ है. यह केवल परिवार में प्रसव की परिस्थिति में ही नहीं छुपा हुआ होता है बल्कि उन सारी सामाजिक संरचनाओं में होता है और इन्हीं से पुरुष महिला श्रम पर नियंत्रण करने में समर्थ हो जाता है.” महिलाओं को उनके जरुरी बुनियादी आर्थिक उत्पादक संसाधनों को न मुहैया कराकर और उनकी यौनिकता को प्रतिबंधित करके ही इस पुरुष नियंत्रण को बरक़रार रखा जाता है.
इन आर्थिक उत्पादन के संसाधनों को महिलाओं को न उपलब्ध कराकर पुरुष पूंजी के साथ एक गठजोड़ तैयार करता है. इसके उदाहरण पूंजीवाद के विकास में दिखाई देते हैं और तब भी जब मजदूर अपनी समस्याओं को हल करने के लिए सुरक्षात्मक कानून और परिवार के भरण-पोषण की मांग करते हैं. तर्क यहं तक जाता है कि इन दोनों अधिकारों के लिए पुरुषों द्वारा हुआ संघर्ष भी पुरुषों के लाभ के लिए ही था ताकि इसी के बहाने महिलाओं को घरों में रखा जा सके ताकि वे पुरुषों की सेवा कर सकें और पुरुष उनकी यौनिकता की निगरानी कर सकें. लेकिन क्या यह दृष्टिकोण ठीक है?
ब्रिटेन में पूंजीवाद के विकास ने वहां के घरेलू उत्पादन को नष्ट कर दिया तथा महिलाओं, बच्चों और पुरुषों को कारखाने की व्यवस्था में ढकेल दिया. मजदूरों के प्रजनन पर इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ा. माताओं के द्वारा घर से घंटों बाहर रहकर काम करने के कारण बच्चों की मृत्यु भीषण स्तर पर पहुँच गयी (जैसा कि मार्क्स ने पूँजी में दिखाया है.) बच्चों को थोडा बड़े बच्चों के सहारे छोड़ दिया जाता था या बच्चों की देखभाल करने वाले सहायक के भरोसे जो खुद ही बच्चों की उपेक्षा करता था और बच्चों को शराब या अफीम के सहारे शांत रखता था. जब वे पर्याप्त बड़े हो जाते थे तो उन्हें भी कारखाने के उत्पादन में लगा दिया जाता था.  जैसा कि मार्क्स ने लिखा है :
श्रम और मजदूरों के बड़े विकल्प के रूप में मशीनों ने जल्द ही मजदूरों के परिवारों के सभी सदस्यों को चाहे स्त्री हो या पुरुष पूंजी के बहाव में दिहाड़ी मजदूर में बदल दिया.”
इन स्थितियों का चित्रण मार्क्स और एंगेल्स द्वारा इंग्लैण्ड में कामगार वर्ग की स्थितियाँ’ किया गया है, जो यह दिखाता है कि कारखाने की शुरूआती व्यवस्था कितनी भयावह थी. नयी व्यवस्था का प्रभाव यह पड़ा कि पूर्व-पूंजीवादी परिवार के सभी सदस्य दिहाड़ी मजदूर में बदल गए. पूंजीवादी शोषण ने अपनी सारी क्रूरताओं के बजाय यह किया कि महिला और पुरुष दोनों को सम्पत्तिहीन वर्ग में बदल दिया, अंततः आपस में समान सर्वहारा वर्ग था. स्त्री और पुरुष दोनों को दिहाड़ी मजदूरी पर ही भरोसा करना था और पुरुषों ने अपनी संपत्ति खो दिया था. यही कारण था कि एंगेल्स ने बुर्जुआ और सर्वहारा परिवारों के बीच के अंतर को चिन्हित किया. कामगार वर्ग के परिवार के अस्तित्व के ख़त्म हो जाने की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी थी. इस सन्दर्भ में एंगेल्स ने उपर्युक्त लेख में जो कहा वह ठीक ही कहा.
 लेकिन एंगेल्स कारखाने की व्यवस्था के पुनरुत्पादन की प्रक्रिया पर पड़ने वाले प्रभाव को नहीं महसूस कर पाए . कारखाने के उत्पादन का संभवतः सबसे उन्नत केंद्र मैनचेस्टर में एक वर्ष से कम उम्र के प्रति एक लाख में 26,125 बच्चों की मृत्यु हो जाती थी और कुछ गैर औद्योगिक क्षेत्रों में तो यह मृत्यु दर तीन गुना हो जाती थी. शासक वर्ग के कुछ दूरदर्शी लोगों ने यह महसूस किया कि कारखानों को श्रमिकों के रूप में होने वाली आपूर्ति नष्ट हो रही है.
इन्हीं परिस्थितियों के कारण सुरक्षात्मक कानून और परिवारिक भत्ता की मांगे अस्तित्व में आयीं. वे पूंजीवाद की बदलती जरूरतों के लिहाज से ढल तो गये लेकिन मजदूर वर्ग के पुरुषों और स्त्रियों के वास्तविक सरोकारों- बेहतर जीवन स्तर, सुरक्षित गर्भ, स्वस्थ बच्चे और स्वच्छ घर आदि के प्रति सजग रहे. 

( अनुवाद : राम नरेश राम )

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