आदिवासी साहित्य
विमर्श की अवधारणा
अब तक विक्सित आलोचना की कोई भी दृष्टि इस बात का
दावा नहीं कर सकती कि उसने साहित्य के सारे पहलुओं और हिस्सों की व्याख्या के औजार
विकसित कर लिए हैं .यही करण है कि हिंदी आलोचना की स्थापित पद्धतियों और
प्रतिमानों ने साहित्य के बहुत सारे हिस्सों को अपने केंद्र में नहीं रखा. लगातार
साहित्यिक लोकतंत्र की बढ़ती मांग और आवश्यकता ने नविन आलोचना दृष्टियों के उदय को
प्रस्तावित किया है . हर आलोचना दृष्टि अपने पूर्ववर्ती से संघर्ष करती हुई नकारती
हुई और ग्रहण करती हुई अपने अस्तित्व की अनिवार्यता को सिद्ध करती है .इसी
प्रक्रिया में हिंदी की परंपरागत आलोचना पद्धति के इतर दलित ,स्त्री और अब आदिवासी
साहित्य विमर्श के रूप में नयी आलोचना दृष्टि का उदय हुआ है . अभी हाल ही में
अनामिका प्रकाशन से प्रकाशितगंगा सहाय मीणा की सम्पादित पुस्तक इसी की एक कड़ी है .
यह पुस्तक अब तक प्रचलित आलोचना दृष्टि और साहित्यिक अवधारणा को उनकी सीमाओं के
करण प्रश्नांकित करती है और आदिवासी साहित्य विमर्श को पूरक के रूप में स्थापित
करती है . एनी अस्मिताओ से पार्थक्य दिखाते हुए गंगा जी लिखते हैं , ‘स्त्री और
दलित साहित्य से भिन्न आदिवासी साहित्य की एक प्रमुख प्रवृत्ति इसमें अन्य अस्मिताओं
के के प्रति सहयोगी का भाव है. यह समूह और सहयोग का साहित्य है . स्त्रवादी
साहित्य ने जाति के प्रश्न की जटिलताओं को नहीं समझा और दलित साहित्य ने स्त्री के
सवालों को तरजीह नहीं दी ,जिसके फलस्वरूप ‘दलित स्त्री विमर्श’ अस्तित्व में आया.
चुकी आदिवासी समाज में श्रम में भागीदारी के करण स्त्री अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति
में रही है , इसलिए साहित्य में भी बड़ी संख्या में स्त्री रचनाकारों ने अपनी उपस्थिति
दर्ज कराई है’ गंगा जी का लेख ‘आदिवासी : अवधारणा और अर्थ’ आदिवासी साहित्य की
अवधारणा को स्थापित करने की प्रक्रिया में आदिवासी के वैश्विक से लेकर भारतीय और
वह भी हिंदी के अर्थ पर अधिक केन्द्रित लगता है. यह और भी बेहतर हो सकता था यदि
भारतीय भाषाओँ में भी आदिवासी के अर्थों को देखने का प्रयास किया जाता. रमणिका
गुप्ता का लेख ‘ आदिवासी लेखन : एक उभरती चेतना’ आदिवासी साहित्य लेखन के लिए उत्तरदायी
परिस्थितियों को वाहरु सोनवरे की कविता ‘स्टेज’ के माध्यम से रेखांकित करता है.
जिस तरह से स्त्री, दलित और दलित स्त्री को कर्ता (अभिव्यक्ति और नेतृत्व के
सन्दर्भ में ) की भूमिका से हमेशा बहिष्कृत किया जाता रहा और उसने इसको अपनी
जोरदार उपस्थिति से पूरा किया वैसे ही बहिष्करण की रणनीति को पहचानकर आदिवासी
साहित्य ने भी अपनी अलग जगह बनाई. इस भाव को बहरू की कविता अभिव्यक्त करती है- ‘हम
स्टेज पर गए ही नहीं /जो हमारे नाम पर बनाई गयी थी /हमे बुलाया भी नहीं गया /ऊँगली
के इशारे से /हमारी जगह हमें दिखा दी गयी /हम वहीँ बैठ गए /हमे खूब शाबासी मिली
/और ‘वे’स्टेज पर खड़े होकर /हमारा दुःख हमें ही बताते रहे/ ‘हमरा दुःख अपना ही रहा
/ जो कभी उनका हुआ ही नहीं’... यह कविता सहानुभूति और स्वानुभूति की बहस के लिए
पर्याप्त जगह देती है . इस विन्दु पर आदिवासी साहित्य विमर्श अपने उदय की
परिस्थिति के स्तर पर दूसरी उपेक्षित अस्मिताओं से मिल जाता है .
पुस्तक
में बहुमुखी चिंताएं खासकर भषा संरक्षण की चिंता उसको एक ऐसे विन्दु पर ला खड़ा
करती है जहाँ भाषा का अस्तित्व समाज के अस्तित्व के लिए आवश्यक और जरुरी बन जाता
है. निर्मला पुतुल के लेख ‘ वैश्वीकरण के भवंर में आदिवासी भाषा-साहित्य’ में यह
चिंता जाहिर होती है – ‘ दरसल भाषा की मौत व्यक्ति से भी बड़ी परिघटना है. भाषा एक
सामाजिक संपत्ति है , सामूहिक विरासत है . इसलिए किसी भाषा की मौत का अर्थ है एक
जाति ,एक समुदाय एक समूह के पुरे वजूद की समाप्ति . भाषा की मौत के साथ ही उस जाति
,समुदाय ,समूह का इतिहास ,भूगोल सांस्कृतिक मूल्य ,सौन्दर्य चेतना का अंत हो जाता
है जिसका निर्माण सदियों –सदियों में बड़ी मुश्किल से होता है’. यह पुस्तक नए
सौन्दर्यशास्त्र की आवश्यकता ,उपनिवेशवाद विरोध में आदिवासियों की भूमिका के
रेखांकन , भाषा संरक्षण ,संस्कृति संरक्षण , नवसाम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के
विरोध की आवश्यकता को प्रस्तावित करती है- ‘ औपनिवेशिक युग में जितने भी विद्रोह
आदिवासियों ने किये हैं, उतने भारत के किसी जाति ने नहीं किये हैं. इसका कारण था
कि औपनिवेशिक सत्ता ने आदिवासियों के जंगल, जमीन का वास्तविक आधार ही छीन लिया था.
वंदना टेटे अपने लेख में कहती हैं –‘ दुनिया की किसी आदिवासी भाषा में ‘गाली’ अथवा इंसानी गरिमा को कमतर करने
वाला एक भी शब्द मौजूद नहीं है.’ आदिवासी भाषाओँ में लिंगभेद न हो लेकिन वह मानती
हैं-‘ लेखकों को समझना होगा कि भारत के हिन्दू समाज की अपेक्षा आदिवासी समाज में
महिलाओं की स्थिति भिन्न है . यह भिन्नता सामाजिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक लगभग सभी
स्तरों पर देखि जा सकती है.इसके बावजूद आदिवासी महिलाएं वैसी ही हैं जैसी कि अन्य
भारतीय महिलाएं .’ पुस्तक में वीरेंदर मीणा का लेख ‘साहित्य आलोचना के संदर्भ में सबाल्टर्न
दृष्टि की प्रासंगिकता’ में आदिवासी साहित्य और आलोचना को ‘अपनी ढपली अपना राग’ के
आत्मघाती राह पर न जाने के लिए आगाह करते हैं-‘ मैं आदिवासी साहित्य और आलोचना को
अन्य समस्त वर्गों और उपवर्गों के सन्दर्भ में ही स्थापित करने का पक्षधर हूँ .
यदि आदिवासी साहित्य और आलोचना ‘अपनी ढपली अपना राग’ वाली कहावत पर चलेगी तो यह
हमारे समाज में विसंगति के आलावा और कोई भूमिका अदा नहीं कर सकती .’
अस्मितावादी साहित्य विमर्श के ऐतिहासिक अनुभवों
से जो दिशा मिली है उसने परवर्ती आलोचना दृष्टियों को पूर्ववर्ती खतरों से सचेत
किया है.इस पुस्तक के अधिकांश लेखक इस बात से सचेत दिखाई देते हैं . इसलिए इसमें सर्वसमावेशी
और संवादी होने की पूरी सम्भावना है. चूकी आदिवासी समाज अपनी मौलिक संस्कृति में
हिन्दू संस्कृतियों की विसंगति से बहुत हद तक मुक्त है. और उनका सीधा सीधा ग्रामीण
भारत के जाति संरचना वाले समाज से उस तरह का रिश्ता नहीं है जिस तरह से दलितों का
है इसलिए उनके अनुभव जातीय दंश और छुआछूत वाले नहीं हैं जबकि दलित अस्मिता जाति
समाज के भीतर है और इसीलिए अभिव्यक्ति में ब्राह्मणवाद का विरोध केन्द्रीय स्थान
प्राप्त कर लेता है . जबकि आदिवासी साहित्य में यह सवाल गौड़ रह जाता है. दोनों
तीनो अस्मिताएं –आदिवासी ,दलित ,स्त्री किसी न किसी रूप में स्थानीय सामाजिक
वर्चस्ववादी सत्ता , राज सत्ता या साम्राज्यवादी सत्ता से दमित हैं इसलिए इन सब के
दमन के खिलाफ एक साझी आलोचनात्मक दृष्टि भी बन सकती है .और यहीं सबके साझी मुक्ति
का रास्ता भी हो सकता है नहीं तो अस्मिताओं के प्रतिक्रियावाद में बदल जाने और
उसका इस्तेमाल कर लिए जाने से कोई नहीं बचा सकता है . अनुभव यदि साझे हैं तो
मुक्ति का रास्ता भी साझा ही होगा.
राम नरेश राम