मंगलवार, 1 मई 2018

आज मजदूर दिवस है। पूरी दुनिया इसको उत्सव की तरह मना रही है। लेकिन अगर हम विचारधाराओं के आधार पर विश्व क्रम को देखें तो पता चलता है कि दुनिया इस मामले में एक तरफ झुकती जा रही है। दुनिया भर में मजदूर विरोधी सरकारें कायम हो रही हैं। अब पूंजीवादी लोकतंत्र के भीतर जितनी जगह मिल सकती थी उसको भी ख़त्म किया जा रहा है। लेकिन अभी भी एक बात बची हुई है वह यह कि समाजवादी मूल्यों की बात अप्रासंगिक नहीं हुई है। पूंजी के प्रबल पक्षधर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि जिन मुहावरों में बात करते दिखते हैं वे निश्चित रूप से समाजवादी समाज का सपना देखने वाले और उसके लिए जमीनी संघर्ष करने वाले लोगों द्वारा स्थापित लोक कल्याणकारी मूल्यों की जीत का ही प्रतीक है। लेकिन इसके बाद भी यह सवाल बना हुआ है कि मजदूरों की नैतिक सांस्कृतिक जीत के बाद भी मजदूरों का अपना संघर्ष मुखर रूप में दिखाई नहीं देता। क्या इसके पीछे एक वजह यह भी है कि मीडिया और अन्य प्रचार माध्यमों ने मजदूर संस्कृति और उनके सवालों की घनघोर उपेक्षा की है। एक प्रमुख सवाल यह तो है ही कि जमीनी संघर्षों के बावजूद भी उनको कोई जगह नहीं मिलती है। लेकिन उनके 'न दिखने' के पीछे क्या सिर्फ यही कारण है? ऐसा लगता है कि मजदूरों का बड़ा हिस्सा इस तरह की सांस्कृतिक परिस्थिति का शिकार है कि वह इस बात को महसूस ही नहीं कर पा रहा है कि वह मजदूर है। इस बात को समझने के लिए हम यह कह सकते हैं कि नब्बे के दशक में पैदा होने वाली पीढ़ी एक ऐसे सांस्कृतिक हमले का शिकार हुई है कि वह मजदूर होते हुए भी उसके भीतर मजदूर की सामाजिक पहचान स्थापित करने वाली संस्कृति से एक खास तरह की नफरत है। वह 6 हजार से लेकर 20 हजार रूपये महीने की तनख्वाह पर काम करता है लेकिन अपने आप को मजदूर से श्रेष्ठ समझता है। आखिर इस मामले की जड़ कहाँ है। ऐसा होता क्यों है? इसका कारण पूंजीवादी संरचना में कार्यपद्धति के स्तर पर श्रेष्ठतावादी संस्कृति को दी गयी सहज स्वीकृति है। यह ब्राह्मणवादी कार्यसंस्कृति है। इसलिए यहाँ काम करने वाले को अपने से नीचे के व्यक्ति पर शासन करने की लालसा जागती है। इस लालसा के पीछे का अर्थ विज्ञानं कुछ इस तरह है कि हर ऊपर वाला अपने अधीन काम करने वाले के श्रम के शोषण से अपनी आय को बढ़ाना चाहता है। भले ही वह अंततः पूंजीपति के लाभ को ही बढ़ा रहा होता है। कुछ लोग कह सकते हैं कि इस तरह के सांस्कृतिक हमले पहले भी होते रहे हैं। पहले भी मजदूर को सांस्कृतिक गुलामी में जकड़ा जाता रहा है। लेकिन उस गुलाम बनाने वाली इस संस्कृति के खिलाफ इतिहास में संघर्ष हो चुके हैं। इसको शायद संस्कृति के भीतर चलने वाला वर्ग संघर्ष कह सकते हैं। यहीं पर अपने आप में चेतना और अपने लिए चेतना की धारणा को समझना जरूरी हो जाता है। ऐसे में ही किसी सचेत क्रांतिकारी राजनीतिक दल की भूमिका बढ़ जाती है। वही इस बात का एहसास कराएगा कि दरसल ये मजदूर जैसे न दिखने वाले लोग भी मजदूर ही हैं और इन्हें अपने लिए मजदूर वर्ग की चेतना हासिल करनी है। तभी कोई मुकम्मल बदलाव संभव है।
    आज देश के लगभग हर हिस्से में मजदूरों का मार्च हुआ है। इसी कड़ी में दिल्ली में भी रामलीला मैदान से लेकर टाउन हॉल चांदनी चौक तक मार्च हुआ। पिछले दो सालों से इसमें हिस्सा ले रहा हूँ लेकिन देखता हूँ कि मजदूरों के शहर दिल्ली में मजदुर दिवस पर मार्च में भागीदारी बेहद कम रहती है। ऐसा क्यों है? क्या हमें इस पर नहीं विचार करना चाहिए कि जिन्हें हम मजदूर कह रहे हैं दरसल वे अपने आप को मजदूर मानते ही नहीं । यही कारण है कि संगठित क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों का सिर्फ एक हिस्सा अपने आप को मजदूर मानता है। भारत में असंगठित क्षेत्र का लगातार विस्तार हो रहा है। और असंगठित क्षेत्र के लोग अपने आप को या तो मजदूर मानते नहीं या मजदूरों की राजनीति करने वाले दल उन तक पहुँच ही नहीं पाते। एक बात तो समझ में आती है कि संगठित क्षेत्र की संरचना ऐसी होती है कि वहां सामूहिकता की गुंजाइश होती है। जबकि असंगठित क्षेत्र में घोर प्रतियोगी माहौल और बुनियादी सुविधाओं की कमी उनके भीतर एक तरह के व्यक्तिवाद को देते हैं। यही कारण है कि उनकी सामूहिक कार्यपद्धति विभाजित प्रकृति की होती है। उनके भीतर अपनी नौकरी को बचाने के लिए सबसे समर्पित कार्यकर्त्ता होने का दबाव काम करता है। यही कारण है कि वहां संगठन नहीं बन पाता है। लक

नयी दुनिया का स्वप्न और हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन

राजीव गांधी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित इस दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के इस दूसरे दिन के दूसरे सत्र के अध्यक्ष आदरणीय कम...