दिवस-
मेनस्ट्रीम बॉलीवुड की एक समस्या यह है कि यहाँ स्टार अभिनेता स्क्रिप्ट के आधार पर अभिनय नहीं करता बल्कि अभिनेता के स्टार्डम के आधार पर स्क्रिप्ट तैयार की जाती है यही वजह रही की सारे अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के दमदार काम, बैकग्राउंड स्कोर,कैची लिरिक्स के बावजूद 'दंगल' में शुरू से अंत तक अलबत्ता जहाँ ज़रूरत नहीं थी तब भी आमिर खान फ़िल्म में पूरी तरह हावी रहते हैं..शायद यही वजह रही होगी फ़िल्म में एक दोष अनजाने ही पैदा हो गया है..
अकादमी से प्रशिक्षित होकर गीता अपने पिता को तो हरा सकती है लेकिन अन्य कुश्तियों में हार रही है..यहाँ पिता की उम्र का तर्क लचर है..बेशक खेल अकादमियों में ज़बर्दस्त भ्रष्टाचार है..लेकिन कोई कोच अपनी प्रतिष्ठा दावँ पर लगाकर अपने द्वारा प्रशिक्षित खिलाड़ी को हारने के लिये खेलने को क्यों कहेगा यह तर्क भी समझ से परे है..स्क्रिप्ट में यहीं से स्टार्डम को डील करने का दबाव आना शुरू हो जाता है..जहाँ महावीर फोगाट के किरदार में आमिर खान को केंद्र में बनाये रखने के लिये स्क्रिप्ट अतार्किकता से समझौता कर लेती है..
बेशक आमिर ने महावीर फोगाट के किरदार को अद्भुत रूप से जिया है लेकिन यदि अपने हिस्से का काम करने के बाद या तो वो परिदृश्य में न रहते या किन्हीं दूसरे स्तरों पर उनके किरदार को विकसित किया जा सकता था..मसलन अपनी बेटियों को अपने स्वप्न को पूरा करने के टूल के रूप में इस्तेमाल करने की वजह से पैदा हुई द्वंद्वात्मकता को विकसित किया जाता जिसे की फ़िल्म में बहुत हल्के ढंग से छूकर छोड़ दिया गया है और बाक़ी काम को खेल अकादमियों में व्याप्त अनियमितताओं, ज्यादतियों,भ्रष्टाचार वहाँ होने वाले महिला खिलाड़ियों के यौनशोषण आदि को दर्ज करते हुये कोच और खिलाड़ियों पर छोड़ा जा सकता था..तब बहुत दावा तो नहीं किया जा सकता लेकिन अन्दाज़ ज़रूर लगाया जा सकता है कि 'दंगल' का मीटर कुछ और होता..कहना चाहिये कि बॉलीवुड की इस ख़तरनाक प्रवृत्ति ने एक बार फिर हमेशा हमेशा के लिये गर्व कर सकने वाली फ़िल्म बना पाने का अवसर छीन लिया..
गुड़िया सुशीला
दंगल फिल्म की आलोचना या समीक्षा कतई नही करना चाहुगी क्यू की कुछ दृश्य देखते ही मन दुख से भर जाता है सुरुआत के दृश्यों को देख कर लोग ठहाका लगाने मे थोड़ा भी संकोच नही किये जब की यह सब पल मेरे लिए बड़ी दुख का समय था फिल्मों के जरिये किसी की बायोग्राफी बड़ी आसानी से दिखा दी जाती है जबकी यह आसान नही होता फिर भी यह एक माध्यम है लोगों तक लोगों के संघर्ष को पहुचाने की जिसकी सराहना होनी ही चाहिये |
इस फिल्म को देखने के दौरान एक कविता याद आती रही की “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झासी वाली रानी थी” इसका अर्थ सीधे सीधे यही निकलता है की औरत कभी भी पूर्ण एक स्वतंत्र नागरिक नही थी न ही अभी भी है लोग अपनी बेटियों को यही वाक्य बोल कर उत्साह बढ़ातें हैं कि तुम लडकों से कम हो क्या. किसी भी पुरुष व्यक्ति का काम हमारे लिए प्रेणना ना होकर उनकी जेंडर, उनका सेक्स ही प्रेणना बन कर रह जाता है. म्हारी छोरियां छोरों से कम हे के यह एक वाक्य नही है यह एक पुरी जेंडर संस्कृति है जिसे बड़े गर्व से लोग समाज मे पीढ़ी दर पीढ़ी स्थान्तरित कर रहें हैं | पुरे फिल्म मे यह एक संवाद मुझे बड़ा झकझोरते रहा मै सहज हो कर भी सहज नही हो पा रही थी क्यू की मुझे गीता का श्रम और संघर्ष इस सवांद के कारण छोटा नज़र आ रहा था |
यह अलग बात है की यह लोगों के लिए मसला नही है भले यह मसला नही हो लेकिन यह एक डिस्कोर्स जरुर है |
राष्ट्र देश की भी अपनी एक राजनीति होती है जो समय और व्यक्ति के हिसाब से तय होती है उसी के आधार पर व्यक्ति का अपना नजरिया तय होता है जिसका एक हिस्सा लड़कियों के पहनावे के सन्दर्भ मे है जो गीता और बबिता के संघर्ष में नजर आया | मैडल लाने के बाद गीता बबिता सायद ही उस छीटा कसी को भूल पायी होंगी | ब्राह्मनिकल समाज में जिस तरह से ज्ञान को दो धड़ा में बाट रखा है एक उपयोगी ज्ञान और दुसरा अनुपयोगी ज्ञान उसी तरह से महिलाओं के कपड़े को भी बाट रखा है जैसे ही देश की मैडल की बात आती है तो वो जो संघर्ष है वह शुन्य हो जाता है |
बाकी जो फिल्म है अच्छी है |
मेनस्ट्रीम बॉलीवुड की एक समस्या यह है कि यहाँ स्टार अभिनेता स्क्रिप्ट के आधार पर अभिनय नहीं करता बल्कि अभिनेता के स्टार्डम के आधार पर स्क्रिप्ट तैयार की जाती है यही वजह रही की सारे अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के दमदार काम, बैकग्राउंड स्कोर,कैची लिरिक्स के बावजूद 'दंगल' में शुरू से अंत तक अलबत्ता जहाँ ज़रूरत नहीं थी तब भी आमिर खान फ़िल्म में पूरी तरह हावी रहते हैं..शायद यही वजह रही होगी फ़िल्म में एक दोष अनजाने ही पैदा हो गया है..
अकादमी से प्रशिक्षित होकर गीता अपने पिता को तो हरा सकती है लेकिन अन्य कुश्तियों में हार रही है..यहाँ पिता की उम्र का तर्क लचर है..बेशक खेल अकादमियों में ज़बर्दस्त भ्रष्टाचार है..लेकिन कोई कोच अपनी प्रतिष्ठा दावँ पर लगाकर अपने द्वारा प्रशिक्षित खिलाड़ी को हारने के लिये खेलने को क्यों कहेगा यह तर्क भी समझ से परे है..स्क्रिप्ट में यहीं से स्टार्डम को डील करने का दबाव आना शुरू हो जाता है..जहाँ महावीर फोगाट के किरदार में आमिर खान को केंद्र में बनाये रखने के लिये स्क्रिप्ट अतार्किकता से समझौता कर लेती है..
बेशक आमिर ने महावीर फोगाट के किरदार को अद्भुत रूप से जिया है लेकिन यदि अपने हिस्से का काम करने के बाद या तो वो परिदृश्य में न रहते या किन्हीं दूसरे स्तरों पर उनके किरदार को विकसित किया जा सकता था..मसलन अपनी बेटियों को अपने स्वप्न को पूरा करने के टूल के रूप में इस्तेमाल करने की वजह से पैदा हुई द्वंद्वात्मकता को विकसित किया जाता जिसे की फ़िल्म में बहुत हल्के ढंग से छूकर छोड़ दिया गया है और बाक़ी काम को खेल अकादमियों में व्याप्त अनियमितताओं, ज्यादतियों,भ्रष्टाचार वहाँ होने वाले महिला खिलाड़ियों के यौनशोषण आदि को दर्ज करते हुये कोच और खिलाड़ियों पर छोड़ा जा सकता था..तब बहुत दावा तो नहीं किया जा सकता लेकिन अन्दाज़ ज़रूर लगाया जा सकता है कि 'दंगल' का मीटर कुछ और होता..कहना चाहिये कि बॉलीवुड की इस ख़तरनाक प्रवृत्ति ने एक बार फिर हमेशा हमेशा के लिये गर्व कर सकने वाली फ़िल्म बना पाने का अवसर छीन लिया..
गुड़िया सुशीला
दंगल फिल्म की आलोचना या समीक्षा कतई नही करना चाहुगी क्यू की कुछ दृश्य देखते ही मन दुख से भर जाता है सुरुआत के दृश्यों को देख कर लोग ठहाका लगाने मे थोड़ा भी संकोच नही किये जब की यह सब पल मेरे लिए बड़ी दुख का समय था फिल्मों के जरिये किसी की बायोग्राफी बड़ी आसानी से दिखा दी जाती है जबकी यह आसान नही होता फिर भी यह एक माध्यम है लोगों तक लोगों के संघर्ष को पहुचाने की जिसकी सराहना होनी ही चाहिये |
इस फिल्म को देखने के दौरान एक कविता याद आती रही की “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झासी वाली रानी थी” इसका अर्थ सीधे सीधे यही निकलता है की औरत कभी भी पूर्ण एक स्वतंत्र नागरिक नही थी न ही अभी भी है लोग अपनी बेटियों को यही वाक्य बोल कर उत्साह बढ़ातें हैं कि तुम लडकों से कम हो क्या. किसी भी पुरुष व्यक्ति का काम हमारे लिए प्रेणना ना होकर उनकी जेंडर, उनका सेक्स ही प्रेणना बन कर रह जाता है. म्हारी छोरियां छोरों से कम हे के यह एक वाक्य नही है यह एक पुरी जेंडर संस्कृति है जिसे बड़े गर्व से लोग समाज मे पीढ़ी दर पीढ़ी स्थान्तरित कर रहें हैं | पुरे फिल्म मे यह एक संवाद मुझे बड़ा झकझोरते रहा मै सहज हो कर भी सहज नही हो पा रही थी क्यू की मुझे गीता का श्रम और संघर्ष इस सवांद के कारण छोटा नज़र आ रहा था |
यह अलग बात है की यह लोगों के लिए मसला नही है भले यह मसला नही हो लेकिन यह एक डिस्कोर्स जरुर है |
राष्ट्र देश की भी अपनी एक राजनीति होती है जो समय और व्यक्ति के हिसाब से तय होती है उसी के आधार पर व्यक्ति का अपना नजरिया तय होता है जिसका एक हिस्सा लड़कियों के पहनावे के सन्दर्भ मे है जो गीता और बबिता के संघर्ष में नजर आया | मैडल लाने के बाद गीता बबिता सायद ही उस छीटा कसी को भूल पायी होंगी | ब्राह्मनिकल समाज में जिस तरह से ज्ञान को दो धड़ा में बाट रखा है एक उपयोगी ज्ञान और दुसरा अनुपयोगी ज्ञान उसी तरह से महिलाओं के कपड़े को भी बाट रखा है जैसे ही देश की मैडल की बात आती है तो वो जो संघर्ष है वह शुन्य हो जाता है |
बाकी जो फिल्म है अच्छी है |
