मित्रों आज का यह व्याख्यान *नयी दुनिया का स्वप्न और हिंदी साहित्य* विषय पर केंद्रित है।
मित्रों इस प्रस्तावित विषय से ऐसा लगता है कि हम जिस दुनिया मे रह रहे हैं उसमें कुछ ऐसी चीजें हैं जिनके कारण इसको बदलने की बात की जाती है। लेकिन दुनिया को बदलने की बात करने से पहले क्या हमें इस बात पर विचार नहीं करना चाहिए कि हम इस इस दुनिया को बदलने की शक्ति और क्षमता रखते भी हैं या नहीं । अगर यह दुनिया ईश्वर की निर्मिति है तो जाहिर है इसको बदलना मनुष्य क्षमता के बाहर है। ऐसी स्थिति में यह विषय अपनी संभावना खो देता है। क्योंकि पारंपरिक धारणा के अनुसार इस दुनिया को मनुष्य बदल ही नहीं सकता। इस परंपरागत धारणा के बाद भी साहित्य के परिसर में दुनिया को हमेशा बदलने और बेहतर बनाने के लिए चिंतन होता रहा है। भले ही इस चिंतन में यह भी मान्यता रही है कि यह दुनिया दरअसल किसी सर्वसत्ता की इच्छाओं का परिणाम है। हिंदी साहित्य का मध्यकाल इस अंतर्विरोधी चिंतन से भरा हुआ है। संत कवियों की कविताओं में देखा और महसूस किया जा सकता है। ये कवि आत्मा की मुक्ति के चिंतन के साथ ही सामाजिक मुक्ति की भी कामना करते हैं। उनका यह सामाजिक मुक्ति का चिंतन ही उनको सामाजिक संरचना के भीतर व्याप्त दुखों के कारणों पर निगाह डालने के लिए प्रेरित करता है और यही कारण है कि उनका चिंतन उदात्त मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं से भर उठता है। और अन्ततः वे आधात्मिक कम भौतिक सामाजिक चिंतक के रूप में उभरने लगते हैं । यह सामाजिक मुक्ति की उनकी चिंता ही उनको इस विश्वास की तरफ ले जाती है कि इस दुनिया को बदला जा सकता है। मध्यकाल के अनेकों संत कवियों की कविताओं में वैकल्पिक दुनिया का स्वप्न उनके इसी विश्वास का परिणाम है । यह 'ईश्वर निर्मित दुनिया' को उनके द्वारा सायास चुनौती भले न हो लेकिन चुनौती तो है ही।
दुख की अनुभूति और उससे मुक्ति की आकांक्षा से ही नयी दुनिया का स्वप्न आकार लेता है। दुख की इसी अनुभूति ने साहित्य की दुनिया को स्वप्नदर्शी बनाया है। हिंदी साहित्य में नई दुनिया का स्वप्न या वैकल्पिक दुनिया का मॉडल सबसे पहले कबीर की कविताओं में दिखता है- उदाहरण के लिए इस पद को देखा जा सकता है-
जहंवा से आयो अमर वह देसवा।
पवन पानी न धरती अकसवा चाँद न सूर न रैन दिवसवा।
ब्राह्मण छत्री न सुद बैसवा, मुग़ल पठान न सयद सेखवा।
आदि जोत नहिं गौर गनेसवा , ब्रह्मा बिस्नु महेस न सेसवा।
जोगी न जंगम मुनि दरवेसवा , आदि न अंत न काल कलेसवा।
दास कबीर ले आये संदेसवा , सार सबद गहि चलो वा देसवा।
कबीर का यह पद एक ऐसे देस की परिकल्पना प्रस्तुत करता है जिसमें मनुष्य की पहचान का आधार उसका धर्म उसकी जाति नहीं होगी। मनुष्यता के निर्मल व्यक्तित्व में ये 'निर्मित' पहचानें बाधा उत्पन्न करती हैं। ऐसा देश या समाज परिकल्पित है जिसमे कोई ब्राहम्ण क्षत्रिय सूद्र वैश्य मुगल पठान जैसी पहचानें नहीं रहेंगी। गौरी गणेश ब्रह्मा विष्णु महेश और कोई दरवेश भी नहीं होगा। ऐसा देश या समाज जहां पर किसी तरह का फसाद नहीं होगा।
भले ही कबीर के इस पर अप्रामाणिक* माना गया हो लेकिन उन्हीं के पद के रूप में यह प्रचलित है। सवाल यह है कि कबीर को वैकल्पिक समाज-देश या दुनिया की परिकल्पना क्यों करनी पड़ी। दरसल इसका जवाब यही है कि मनुष्य के दुखों का बड़ा कारण विभाजनकारी सांस्कृतिक मूल्यों पर खड़ी मनुष्य की पहचानें हैं। इसके विलोप के बिना मनुष्य मुक्त नहीं हो सकता। आलोचक और चिंतक रामजी यादव ने एक जगह लिखा है कि 'कबीर के अमरदेसवा को किसी और लोक का आलम मत समझिए और इसका सार समझिए कि कबीर दास जो संदेसवा लाये हैं कि ‘सार सबद गहि चलो ओहि देसवा’ का मतलब कोई और लोक नहीं है। ‘जहवाँ से आयो अमर वह देसवा’ मतलब जो आदिम कम्यून है, जिसकी वकालत कार्ल मार्क्स ने की और वर्गविहीन समाज को भी उसी के बिलकुल परिष्कृत रूप में देखते हैं। इसीलिए सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने अपनी किताब ‘कबीर हैं कि मरते नहीं’ में लिखते हैं कि ‘कबीर सर्वहारा के साथ खड़े हैं’ ‘वे जातिवादी और छुआछूत वाली दुनिया बदलना चाहते हैं।’ कबीर कहते हैं कि उस अमर देसवा में छलावे और धूर्तता से भरी गप्पों और कहानियों की कोई जगह नहीं होगी। वहां भोग उड़ाने वाले धूर्तों और चित्र-विचित्र देवताओं की कोई जगह न होगी। यह वास्तव में वही अमर देसवा है जिसकी कल्पना भारत के बहुसंख्य आंदोलनों का प्रस्थान बिन्दु है। क्या बिना उस अमर देसवा को बनाए समता, समानता, बंधुता और न्याय का राज्य बन सकता है?'
मध्यकाल के ही एक दूसरे महत्त्वपूर्ण संत कवि रैदास ने भी बेगमपूरा के रूप में नई दुनिया का स्वप्न देखा है। उनकी परिकल्पना को कुछ विद्वानों ने तो आधुनिक राज्य के पहले मॉडल के रूप में रेखांकित किया है।
बेगमपुरा सहर को नाउ, दुखु-अंदोहु नहीं तिहि ठाउ।
ना तसवीस खिराजु न मालु, खउफुन खता न तरसु जुवालु।
अब मोहि खूब बतन गह पाई, ऊहां खैरि सदा मेरे भाई।
काइमु-दाइमु सदा पातिसाही, दोम न सोम एक सो आही।
आबादानु सदा मसहूर, ऊहाँ गनी बसहि मामूर।
तिउ तिउ सैल करहिजिउ भावै, महरम महल न को अटकावै।
इस पद यह अर्थ कंवल भारती जी ने इस रूप में किया है- मेरे भाइयो! मैंने ऐसा घर खोज लिया है यानी उस व्यवस्था को पा लिया है, जो हालांकि अभी दूर है; पर उसमें सब कुछ न्यायोचित है। उसमें कोई भी दूसरे–तीसरे दर्जे का नागरिक नहीं है; बल्कि, सब एक समान हैं। वह देश सदा आबाद रहता है। वहां लोग अपनी इच्छा से जहां चाहें जाते हैं। जो चाहे कर्म (व्यवसाय) करते हैं। उन पर जाति, धर्म या रंग के आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं है। उस देश में महल (सामंत) किसी के भी विकास में बाधा नहीं डालते हैं। रैदास चमार कहते हैं कि जो भी हमारे इस बेगमपुरा के विचार का समर्थक है, वही हमारा मित्र है।’ इस पद में रैदास एक राजनीतिक दार्शनिक की तरह दिखाई देते हैं। यह अनायास नहीं है कि भारतीय संविधान के शिल्पी डॉ. अम्बेडकर उनकी इसी संकल्पना के कारण उनको अपना गुरु मानते थे।
भारतीय राज्य व्यवस्था का जो भी आधुनिक और मानवीय कल्याणकारी स्वरूप मिलता है उसमें इन चिंतकों का बड़ा योगदान है।
*अपने चिन्तको के सांस्कृतिक विकृतिकरण से बचाना है*
कबीर का वैष्णवीकरण
रैदास का हिंदुत्व के रक्षक के रूप में चित्रण
घर में था क्या कि तेरा ग़म उसे ग़ारत करता
वो जो रखते थे हम इक हसरते तामीर सो है!