आज बहुत सारे लेखकों - कवियों ने प्रचीन तथा मध्यकालीन भाव बोध और आधुनिक काल के बीच की विभाजक रेखा को खत्म कर दिया है।
विशेष कर संघियों ने सामंती सोच तथा मूल्यों को स्थापित करने के लिए इस भाव को खूब हवा दी है। उनके लेखन में निरंतर राजा-प्रजा-धर्म - युद्ध और सामंती व्यवस्था तथा सामंती समाज के मूल्यों के प्राचीन तथा मध्यकालीन उदाहरण ही मिलते हैं।
आज किसी भी व्यवस्था के मूल्यांकन का आधार सूत्र बराबरी, आजादी और भाईचारा ही होगा। यह भाव किसी भी प्राचीन - मध्यकालीन सामंती व्यवस्था में संभव नहीं है।
हमारे दोनों महाकाव्यों में, जहां रामायण में राज्य त्याग तथा बंधुत्व का संदेश है वहीं महाभारत में राज्य सत्ता के लिए भाई भाई के बीच भयावह संघर्ष की गाथा कही गई हैं। लेकिन बराबरी और आजादी का कोई संदर्भ नहीं है।
सच तो यह है कि समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व आधुनिक लोकतंत्रिक मूल्य हैं। सामंती व्यवस्था तथा चिंतन के भीतर इसे किसी भी तरह से हासिल नहीं किया जा सकता है।
इस लिए चार हजार वर्षों की भारतीय परम्परा में आजादी और बराबरी नहीं बल्कि इसे सीमित करने का विचार ही मिलता है। कहीं भी स्त्रियों और शूद्रों के लिए, भक्ति काव्य के अतिरिक्त सिर्फ निषेध के सूत्र मिलते हैं। इस संदर्भ में सभी धर्मों में एकता है। क्या होना चाहिए अधवा क्या करना चाहिए के स्थान पर क्या नहीं करना चाहिए पर विशेष बल दिया जाता है।
इस लिए अपने चिंतन के केंद्र में हमें आधुनिक युग के लोकतांत्रिक, बराबरी, आजादी और बधुत्व के मूल्यों को स्थापित करना चाहिए और उसी के आधार पर सही और ग़लत का फैसला करना चाहिए।
न्याय - अन्याय को भी प्राचीन- मध्यकालीन बदले की भावना से नहीं बल्कि आधुनिक लोकतंत्रिक मूल्यों से तय करना चाहिए।
निषेध नहीं करणीय पर विचार हो।
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