सोमवार, 29 जुलाई 2013

शासन की अराजकता


                  शासन की अराजकता

  अराजकता राज्य के नियमों का उलंघन है. इस आधार पर अपने समय के सवालों से टकराने वाले अक्सर अराजकतावादी घोषित कर दिए जाते हैं. लेकिन क्या यह सोचने का विषय नहीं है कि राज्य भी कभी अराजक हो सकता है. मै समझता हूँ कि जनता के खिलाफ राज्य का व्यवहार उसको इस श्रेणी में डाल देता है . राज्य की सत्ता मनुष्य की सत्ता के बिना संभव नहीं है या यूँ कहें कि मनुष्य ही राज्य की सत्ता का अभिकर्ता है. कहा जाता है कि अपने समय में गाँधी भी अराजक थे वे ब्रिटिश शासन के नियमों को नहीं मानते थे. भगत सिंह को तो उस समय के अराजकतावादी गाँधी समेत अंग्रेज भी अराजक मानते थे. लेकिन जब एक अराजक दूसरे अराजक को अराजक कहता है तो उस समय पहला दूसरे के सापेक्ष राज्य का समर्थक हो जाता है.ऐसी स्थिति में गाँधी अंग्रेजी शासन वाले राज्य का समर्थक ठहरते हैं.

  किसी समाज में अपराध उसकी संरचना और नागरिकों के राज्य पर विश्वास पर निर्भर करता है. यदि नागरिक अपने राज्य व्यवस्था में जीवन की न्यूनतम नागरिक सेवाएं नहीं पाता है तो वह असंतोष से भर उठता है,लेकिन इसका यह अर्थ विल्कुल नहीं है कि नागरिक अपराधी हो जाता है वल्कि इसके उलट नागरिकों को राज्य द्वारा बाधित किया जाता है कि वे अपराध करें. कई बार तो यह उसके  व्यापार और अर्थ नीति के जीवन के लिए जरुरी होती है.अक्सर बौद्धिक समाज द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि अमुक इलाके में अपराध या अराजकता इसलिए बढ़ रही है कि वहा विकास नहीं है. दरसल विकास न करना क्या अपराध की श्रेणी में नहीं आता है ? यदि आता है तो नागरिकों का ‘अपराध’ राज्य प्रायोजित अपराध के खिलाफ नए राज्य-निर्माण की आकांक्षा की अभिव्यक्ति ही मानी जाएगी. भारतीय राज्य की अराजकता चौतरफा बढ़ रही है वह अपने नागरिकों में असुरक्षा की भावना भर रहा है .यह अराजकता अपराधिक अराजकता है . वह नागरिकों को उनकी स्थानीय और सामाजिक असमानता के आधार पर आपस में ही लड़ाता है और अपने किये का दोष किसी दूसरे सामाजिक समुदाय पर डाल कर आसानी से नागरिक युद्ध का मजा लेता है. और अक्सर तो वह खुद ही आक्रान्ता बन कर अपने ही नागरिकों के पैसे से तैयार व्यवस्था का प्रयोग कर उनको सबक सिखाता है .जैसे  पहले प्राथमिक शिक्षा में निवेश को कम कर वहा अध्यापकों की भारती न कर उसने उनकी व्यवस्था को रौंद दिया . विद्यालयों में नियमित और प्रशिक्षित अध्यापक नहीं दिया  बुनियादी सुविधाओं का आभाव रखा . फिर जब बिहार में मिड डे मिल खाकर बच्चों की मौत होती है तो दोष एक महिला कर्मचारी पर आता है और वह गिरफ्तार कर ली जाती है . क्या यह महज संयोग है कि पुरे देश में मिड डे मिल खाने से बच्चों की मौतें हो रही हैं और वे बिमार पड़ रहे हैं . क्या इसके लिए मात्र एक महिला या पुरुष जिम्मेदार है या राज्य व्यवस्था ? इस स्थिति में मुकदमा सरकार के खिलाफ चलना चाहिए या नागरिक के खिलाफ,  क्या यह शासन की अराजकता नहीं है?

 प्राथमिक विद्यालयों की यह स्थिति उत्तर प्रदेश में भी है. प्रदेश शासन पर सवाल करिए तो कहा जायेगा कि यह तो केंद्र का मामला है लेकिन जो राज्य का मामला है उसमे भी इससे कम अराजकता नहीं है. चुनावी गणित भी अपराध और अराजकता के गतिविज्ञान को निर्धारित करती है. उत्तर प्रदेश एक बार फिर मंडल विरोधी आग में जल रहा है जिसका केंद्र इलाहाबाद बना हुआ है इसकी झलकियाँ दिल्ली में भी दिख जाती है वैसे तो कई बार दिल्ली ही इसकी अगुआई कर चुकी है. आरक्षण के खिलाफ समाज में  विरोध छुपे स्तरों पर रहता है जो समय – समय  पर हिंसक रूप में अभिव्यक्त होता रहता है . कुछ समुदायों  का मानना है कि यदि  आरक्षण का लाभ उठाने वाले किसी सामाजिक समुदाय की स्थिति सवर्ण के बराबर हो गयी है तो उसको ‘ओपन फाइट’ के लिए आरक्षण से वंचित कर दिया जाना चाहिए.लेकिन आजादी के पैंसठ सालों बाद भी जब जातिवाद का स्तर संस्थाबद्ध हो तो ऐसे में आरक्षण को ख़त्म करना सामाजिक रूप से पिछड़े या दलित लोगों के लिए क्या घातक नहीं हो सकता ? दरसल नौकरियों के लिए कम होते अवसर के कारण लोगों में असुरक्षा की भावना जन्म लेती जा रही है . सवर्णों को लगता है कि यदि आरक्षण ख़त्म कर दिया जाय तो उनकी नौकरी के अभाव का सवाल हल हो जायेगा .जबकि सच्चाई यह नहीं है. नौकरियों का घटना तो सरकारों की नीतियों के कारण है. सरकार भी यह जानती है कि हल यह नहीं है लेकिन वह  जान- बुझकर यह संघर्ष की स्थिति पैदा करती है. उत्तर प्रदेश में यही हो रहा है . वैधानिक स्थिति यह है कि जिसको ‘सामान्य’ पद कहा जाता है वह तो सभी वर्गों के लिए खुली प्रतियोगिता के लिए होता है . लेकिन असुरक्षा और वर्चस्व के शिकार उसकी व्याख्या ऐसे करते हैं मानो सामान्य का अर्थ सवर्ण हो .स्थिति कुछ भी हो राज्य इसमें दोषी है वह समुदायों का संघर्ष कराकर अपने वोट बैंक का ध्रुवीकरण कर रहा है. कुछ लोगों को लग सकता है कि अखिलेश सरकार यादवों या पिछड़ों की भलाई कर रही है लेकिन भलाई तो तब होगी जब समाज के सारे नौजवानों को रोजगार मिल सके उनकी असुरक्षा कम हो सके. अखिलेश सरकार को पिछड़ों का हितैसी तब माना जाता जब वह नोएडा में मजदूरों के ऊपर फर्जी मुकदमे नहीं लादती ,उनको जेलों में नहीं ठुसती, क्या कोई सपा समर्थक यह बताएगा कि उन मजदूरों में कितने पिछड़ी सामाजिक पृष्ठभूमि वाले हैं जिनको फक्तारियों में न्यूनतम मानवीय परिस्थिति भी नहीं उपलब्द्ध है जिसमे वे पेशाब तक करने का अवकाश नहीं पा  सकते. यह कौन सा पिछड़ा प्रेम है कि  उनको न्यूनतम मजदूरी की भी गारंटी नहीं की जा सकती है . ऐसा ही है तो केंद्र सरकार को ऐसे मुद्दों पर समर्थन क्यों जिनसे पिछड़ों का अहित हो रहा है?

  उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा की कमोबेस वही स्थिति है जो केंद्र में कांग्रेस और भाजपा की है, फर्क सिर्फ इतना है कि सपा – बसपा अपने अपने दम पर सरकार बना रही हैं जबकि कांग्रेस- भाजपा गठबंधन सरकार चलाते हैं .इनके माध्यम से शासकीय अराजकता अपने-अपने शासन क्षेत्रों में मिसाल कायम कर रही है. उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार के पहले मायावती जी के शासन काल में शासकीय अराजकता का आलम यह था कि अगले विधान सभा चुनाव में उनको हराकर जनता ने सबक सिखा दिया.लेकिन सपा सरकार के बनते ही राज्य भर में आपराधिक ग्राफ ऊँचा हो गया. हाल ही में सगड़ी विधान सभा जिला आजमगढ़ के सपा के ही पूर्व विधायक की हत्या हो गयी . मिडिया में हत्या के कई कारण बताये जा रहे हैं. प्रतापगढ़ में जियाउल हक़ की हत्या के ज्यादे दिन नहीं बीते हैं. इन हत्याओं ने आम नागरिकों में दहसत पैदा किया होगा कि यदि सी.ओ और विधायक तक जिस राज्य में सुरक्षित नहीं हैं उसमे आम नागरिकों का क्या होगा? लगता है जनता की संपत्ति की लुट और उस पर वर्चस्व की लड़ाई में कुछ हत्याए जनता के लिए सबक सन्देश भी हैं.अखिलेश सरकार उत्तर प्रदेश में दलितों ,गरीब पिछड़ों और अल्पसंख्यको के सवालों पर असफल सिद्ध हुई है . खालिद की हत्या का मामला अभी चल ही रहा है .  सरकार ने लैपटॉप बांटकर सोचा था कि वह छात्रों को उनके मूल सवालों से भटका देगी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. विद्वानों का मानना है कि पूजी अपने साथ अपनी संस्कृति भी लाती है और भारत में आने वाली पूंजी लम्पट है आक्रामक है जो भारत में आते ही ब्राह्मणवादी मूल्यों से समझौता कर खूंखार हो उठती है. इस पूंजी ने राजनीति का अपराधीकरण किया है. मिसाल के तौर पर भारत में विकास के नाम पर आने वाली विदेशी पूंजी यहाँ के सामाजिक ताने –बाने को नष्ट कर विकासमान बनाने के बजाय वह दमन कर रही है. भूमि अधिग्रहण का मामला इसका सबसे बड़ा उदहारण है . क्या अखिलेश सरकार वर्तमान आर्थिक नीति की आलोचना करती है ? यदि नहीं तो वह पिछड़ों की क्या उत्तर प्रदेश के आम नागरिकों की हितैसी नहीं हो सकती . आगामी लोकसभा चुनाव में जनता किस तरह से हिसाब लेगी  कहना मुस्किल है. कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश देश कि राजनीति की दिशा निर्धारित करता है क्या यह आगामी नयी दिशा देश और प्रदेश के गरीबों के लिए कोई ख़ुशी लेकर आएगी . ऐसे समय में जब यू.पी.ए सरकार भाजपा और अमेरिका के दबाव और निर्देशन में देश को गर्त में ले जा रही है और देश के नागरिकों से युद्ध (आपरेशन...) कर रही है ताकि उनका भौतिक अस्तित्व ही मिटा दे तो यह सवाल और भी मौजू हो जाता है कि जनता के साथ कौन है ?

 

 

 

 

                                                    राम नरेश राम
                                                    शोध छात्र
                                                    हिंदी विभाग
                                            दिल्ली विश्वविद्यालय ,दिल्ली

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