लोकतंत्र और हिंदुत्व का दर्शन- हिंदू सांप्रदायिक बहुमत के जहरीले दांत तोड़ने के लिए भावी
संविधान मे प्रावधान न किए जाने पर भारत लोकतंत्र के सुरक्षित नहीं रह पाएगा ।बाबा
साहब की यह टिप्पड़ी हिंदु समाज मे व्याप्त सांप्रदायिक प्रवृत्ति की विध्वंशकरी भूमिका को ही रेखांकित करती है ।लोकतंत्र
का अर्थ सिर्फ राजनीतिक लोकतंत्र नहीं होता वल्कि सामाजिक लोकतंत्र भी होता है और
मुझे लगता है की बाबा साहब की बात मे यह निहित है।सामाजिक लोकतंत्र का स्वरूप राजनीतिक
लोकतंत्र को निर्मित करता है।यदि कोई समाज गैर-बराबरी पर टीका हुआ है तो उसमे
लोकतंत्र तो हो ही नहीं सकता। जाति व्यवस्था हिंदु धर्म की आत्मा है।इसीलिए भारतीय
समाज मे व्याप्त गैर-बराबरी के दार्शनिक मान्यताओं का आलोचनात्मक विश्लेषण डा।अम्बेडकर
ने बहुत ही तार्किक और वैज्ञानिक तरीके से किया । वह भारत मे हिंदु सांप्रदायिक
चेतना की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करते हैं । इसके पीछे उनका जो उदेश्य था ।
वह भारत को एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र बनाने का था और वह सांप्रदायिकता को चुनौती
दिये बगैर संभव नहीं था इसलिए उनका संपूर्ण अध्ययन भारतीय समाज और राजव्यवस्था को
लोकतान्त्रिक बनाने के लिए आवश्यक उपायों पर केंद्रित था । उनकी दृष्टि मे न्याय
सबसे महत्वपूर्ण मानदंड है जिस पर ही किसी समाज और व्यवस्था के लोकतान्त्रिक स्तर
को मापा जा सकता है उनके यहाँ न्याय का अर्थ स्वतंत्रता ,समानता
और बंधुत्व था । जाहिर है यह नारा फ़ांसीसी क्रांति की देंन है जिससे आंबेडकर गहरे
प्रेरित दिखाई देते हैं ।जब न्याय को कसौटी बनाकर भारतीय समाज का अध्ययन किया जाता
है तो उसमे बहुस्तरीय पूर्वाग्रह और दमनकारी दर्शन दिखाई देता है । हिदुत्व एक
दमनकारी ,वर्चस्ववादी चेतना है और अब वह व्यवस्थित विचार
धारा बन चुकी है । जिसका नेतृत्व कुछ पार्टियाँ घोषित रूप से और कुछ अघोषित रूप से
कतरी हैं । उनका राजनीतिक दर्शन कई बार उनके सामाजिक दर्शन के विपरीत होता है आंबेडकर
का राजनीतिक दर्शन अपने समय के लोकप्रिय राजनीतिक दर्शन को चुनौती देता है और
हिंदुत्व के दर्शन को धरण करने वाली कांग्रेस पार्टी के अगुआ गांधी से वे बहस करके
दरअसल यह दिखाना चाहते हैं की कंगेस पार्टी दलितों की हितैषी नहीं है क्योंकि
गांधी का दर्शन हिंदुत्व का दर्शन है अर्थात गांधी वर्णव्यवस्था मे विश्वास करते
थे । इस तरह अम्बेडकर भारत को एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र बनाने की लड़ाई लड़ रहे थे ।
इतनी सचेत लड़ाई के बाद भी भारत अभी भी एक लोकतांत्रिक राष्ट्र नहीं बन पाया है ।
वैसे कहने को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है ।
उत्तर प्रदेश ,गुजरात महाराष्ट्र या यूँ
कहा जय की पूरा भारत ही हिंदुत्ववादियों के लिए प्रयोग स्थली बन चुका है धर्मनिरपेक्ष
और समाजवादी उसूलों का दावा करने वाली सपा सरकार भी केवल राजनीतिक मजबूरी मे ही
मुशलिम सवाल उठती है ।उसने सत्ता मे आने से पहले जो वादा किया था उसको पूरा नहीं
कर पाई । उत्तर प्रदेश के मुशलिम नौजवान राजकीय आतंक से सबसेन ज्यादा असुरक्षित
हैं किसी भी वक्त गायब कर दिये जाने ,आतंकी घोषित किए जाने या फर्जी मुटभेड़ के शिकार हो
जाने के लिए अभिशप्त हैं । सपा जो मुशलिम समर्थक पार्टी मानी जाती है वह भी उनके साथ न्याय नहीं कर पाई । यह
कैसा समाजवाद है की उसी के समर्थक दंगों
मे आगे बढ़कर उसको अंजाम देते है । उत्तर प्रदेश ने इस बार अपना जनादेश एक युवा को
दिया उसमे अपना विशास जताया है की सायद एक युवा युवाओं का दर्द समझे लेकिन इस्थिति
ठीक उलट है । वह युवा युवा नहीं शासक है और शासक की उम्र उसकी साशकीय नीति को
निर्धारित नहीं करती । एक प्रदेश का युवा मुख्यमंत्री युवाओं के सपनों का सौदागर
बनने की कगार पर है । आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुये उत्तर प्रदेश मे राजनीतिक
माहौल तेज हो गया है । मायावती जी भी अपनी खोई हुई शक्ति पाने के लिए ब्राह्मण सम्मेलन
कर रही है । उन्होंने तो स्वतंत्रता ,समानता और बंधुत्व का नारा ही लगाना बंद ही कर दिया
है। अब समरसता का नारा लगा रही हैं ,जो केवल ब्राह्मण और दलित एकता मे ही उनको दिखाई
देती है । बसपा की पुरानी सोसल इंजीनियरिंग असफल होती नजर आ रही है । समरसता का
सामाजिक जमीनी यथार्थ बहुत कड़वा है । इस समीकरण मे अवसरवादिता है । मायावती हो या
मुलायम (अखिलेश)दोनों के ही दलों की आर्थिक और सांस्कृतिक नीति लगभग एक जैसी है ।
परियोजनाओं का नामकरण भर बादल जाने से असलियत नहीं
दल
जाती है । नई सरकार आने पर जो महत्वपूर्ण दिख रहा है वह है समाजवादी स्वास्थ्य
सेवा के तहत अस्पतालों मे अंबुलेंस की उपलब्धता । लेकिन सवाल यह है की जब
अस्पतालों मे बुनियादी सुविधाएँ ही नहीं होंगी ,दवाएँ नहीं होंगी ,नियमित
डाक्टर और कर्मचारी नहीं होंगे तो यह योजना सिर्फ दूरदराज के इलाक़ों से मरीजों को
अस्पतालों तक पाहुचा भर सकती है । आबादी और भौगोलिक विस्तार के हिसाब से अस्पतालों की
संख्या बढ़नी चाहिए लेकिन इसकी चिंता किसी को नहीं है । इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश
मे छात्र नौकरियों के नाम पर कंगाल और कर्ज मे फँसते जा रहे हैं । एक मित्र ने फोन
पर बताया की उसने विशिष्ट बी टी सी के लिए चालीस फार्म भरा प्रत्येक फार्म के
हिसाब से उसने बीस हजार रुपये का कर्जदार है इसी अनुपात मे और भी छात्र होंगे जो
सरकारी लूट के शिकार हो जाते हैं उत्तर प्रदेश मे गोरखपुर ,आजमगढ़,महराजगंज
जैसे जिलोन मे सांप्रदायिक संगठनों का नेटवर्क बढ़ा है । मराजजीले के परतवाल बाजार
के चौराहे पर ‘हिंदु युवा वाहिनी का एक बोर्ड लगा है जिस पर लिखा
हुआ है-हिंदुत्व एक स्ंचेतना इस पर प्रहार महाप्रलय को आमंत्रण है ‘।
यह एक तरह से आदित्य नाथ की पारिभाषिक धमकी वाला वक्तव्य है जो हिंदुत्व के रास्ते
अलग चलने वालों और हिंदुत्व की आत्मा वर्णव्यवस्था पर प्रहार करने वालों को सबक
सीखने की धमकी है । यह है दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक राज्य की तस्वीर जहाँ
खुलेआम सांप्रदायिक उन्माद भड़काने वालों की गिरफ्तारी नहीं होती है जबकि संदेह के
आधार पर किसी खास धर्म विशेष के नौजवानों को वीणा किसी सबूत के उठा लिया जाता
है। आंबेडकर अपनी किताब हिंदुत्व का दर्शन
मे जिस हिंदुत्व की आलोचनात्मक विवेचना करते हैं वह बादल चुका है उसमे लचीलपन आ
गया है पहले जैसी रूढ़िवादिता नहीं रही । उसकी
दार्शनिक मान्यताओं थोड़ा सुधार हुआ है या यूँ कहें की चालाकी आयी है उसका दर्शन
जिन जातियों ,समुदायों ,धर्मों और लिंग के खिलाफ है उसी के बीच वह अपनी
वैधता की तलाश करता है और उनके ही बीच से प्रचलित मिथकों को आधार बनाकर उनको जोड़ने
का प्रयास करता है गोरक्षनाथ पीठ मे केवल सवर्ण बच्चे नहीं पढ़ते हैं वलकी दलित
बच्चे भी हैं जिनका छुआ भोजन आज भी गाँवों मे नहीं खाया जाता है जिनके माता –पिता
किसी सवर्ण समुदाय मे सहभोज नहीं कर सकते । भारतीय राजनीति मे सत्ता के कड़े होने
के संकेत मिलने लगे हैं राहुल गांधी ने हल ही मे कार्पोरेट घरानों को यह विश्वास
दिलाने और मोदी की कड़ी छवि का विकल्प बनाने की इच्छा के साथ यह कहा कि-मेरा आदर्श
मेरी माँ नहीं मेरी दादी इन्दिरा हैं ‘। यह कहकर उन्होने कई संदेश दिये हैं उनकी माँ
विदेशी मूल कि भले ही हों लेकिन राहुल कि बात अलग है । दूसरा यह कि उनको मनमोहन कि
तरह उदार न समझा जाय वलकी दादी इन्दिरा कि तरह कठोर समझा जाय जिसकी आज शासक वर्ग
जरूरत है ।कौन नहीं जनता है कि इन्दिरा गांधी अपने तानाशाही रवैये के कारण जानी
जाती हैं । तो ऐसे मे राहुल का यह वक्तव्य गौर करने लायक है इसमे एक आलोकतांत्रिक
भारत कि तस्वीर कैद है । आंबेडकर इसी चिंता को लेकर भारतीय समाज कि व्याख्या कर रहे
थे । ( राम नरेश राम )
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