अवधी कविता पर विचारोत्तेजक यह लेख बृजेश द्वारा लिखा गया है. बृजेश ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएच.डी किया है.समकालीन अवधी कविता के बहाने उन्होंने हिंदी आलोचना में छाये दृष्टिगत कुहासे की ओर ध्यान आकृष्ट किया है. चर्चा के लिए पेश है.
सीरीफोर्ट में 28 मई को समकालीन अवधी कविता पर चर्चा हुई, अवधी काव्यपाठ हुआ, छोटी-सी जुटान हुई, आयोजक गण बधाई के पात्र हैं।
हम यहां इस ज़रूरी तथ्य की तरफ आप सबका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं कि अवधी जुबान में रचना और सृजन की श्रेष्ठता के जितने मान हैं, वे सब अ-समानता से पोषित अवतारवाद के मूल्यों का संवहन कर रहे हैं। यह काम परिवार संस्था के, विवाह संस्था के निजी कंधों पर सवार होकर चल रहा है। इन्हीं मूल्यों से रचकर हिंदू धर्म बना है। इन्हीं मूल्यों के आधार पर हमारी सामूहिक चेतना का, हमारे आलोचनात्मक बोध का नीति नियमन हो रहा है। क्षमा, दया, त्याग, संयम, परोपकार वगैरह इन्हीं आत्मघाती मूल्यों की धात्री होने से भारतीय संस्कृति को ‘महान’ बताया जाता है।
इन-इक्चलिटी की विशेषता यह है कि दोनों फरीक इससे त्रस्त हैं-इसका लाभार्थी भी, इसका वंचित भी। तमाशा यही है कि दोनों अपने अपने ढंग से अपनी मनुष्यता का हनन करने में खुद नधे हुए हैं। पर वंचित का आत्मघात यहां विशेष तौर पर ध्यातव्य है। भेदभाव के केस वंचित का आत्मघात ही रचना की, समूह की, कला की रंगभूमि है।
मान लीजिए कि महानता की जरूरत है लेकिन अगर वह अ-समानता के कंधों पर सवार होकर आ रही है तो? इस अंधेरगर्दी को देखकर और इससे खबरदार रहकर ही चिंतन मंथन आगे बढ़े तो बेहतर! विचार व दर्शन के क्षेत्र में हमें इस पूरे मामले को साफ करना होगा, राजनीति व एक्टिविटी में जिनको लाना है ले आएंगे। साथियो! यह हमारी सामूहिक चेतना का अवतारवादी झोल ही है जो इस अंधेरगर्दी को पहचानने नहीं दे रहा, जबकि कवि को तो इस अंधेरे का सच बोलना था। (इतना ही नहीं, अ-समानता और अवतारवाद की असल कारस्तानी यह है कि आरक्षण नौकरी तरक्की उन्नति के चक्रांत में उलझे जा रहे लोग खुद अपने ही सबऑर्डिनेशन को सेलिब्रेट करने में शामिल हुए जा रहे हैं।) ध्यान दें कि इसी अंधेरे में अखण्डता का, छुआछूत और ऊंचनीच का बसेरा है। इन-इक्वलिटी की पैदाइश यह ‘महानता’ अपनी हर गतिविधि में, अपने प्रत्येक क्रिया-व्यापार में इन-इक्वलिटी प्रोड्यूस कर रही है। इस झोल की, इस धुंध की बनावट गौरतलब है। सांप्रदायिक आधारों से पोषित हिंदी चेतना ने इस अंधेरे को सघन करके अवधी रचनात्मकता के संकट को और जटिल बना दिया है।
अब यह एक खुली हुई स्थिति है कि ‘शक्ति, शील और सौन्दर्य’ के मान सामने रखकर न तो अवधी की उत्कृष्ट रचना की जा सकती है, न किसी रचना की कोई विशेषता पहचानी जा सकती है। जिस जबान के लोग तुलसीदास को अवधी का सबसे महत्वपूर्ण कवि मानते हैं, उनकी वैचारिक मानसिक दृष्टिहीनता गौरतलब है। हमें हमारी सामूहिक चेतना की इस समस्या पर गौर करना होगा कि ‘संयम, त्याग और समर्पण’ की हांड़ी में सीझी चेतना अपने कहे के अर्थ अनर्थ से भी ठीक ठीक वाकिफ नहीं है, नहीं हो सकती! इसमें कवि / रचनाकार का व्यक्तिगत कोई कुसूर नहीं है। वह इस सामाजिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली को आरपार नहीं देख पा रहा - उसका कुसूर बस इतना ही है। यह कुसूर, गुनाह में तब तब्दील हो जाता है जब कवि (दृष्टिहीनता के वशीभूत अनजाने ही) अपनी रचना में प्रभुत्वशाली विचार की प्रस्तुति कर बैठता है। वंचित समुदाय से आनेवाले कवि के लिए यहीं आत्मघात घटित होता है। (कहना न होगा कि नरेंद्र मोदी इस आत्मघात का, इसी अंधेरे के बहुमत का नेता है।)
उदाहरण के तौर पर, चीजों के गायब होने की उसकी चिंता सही है पर इस चिंता के ज्ञानात्मक संदर्भों तक जाने के बजाय वह वस्तुओं के नाम गिनाने में ही कविता कर डाल रहा है। ‘बचाने’ के प्रश्न पर भी कविता हो ही सकती है, पर कवि को यह ज्ञात होना पड़ेगा कि जिस बचे हुए को वह बचाना चाहता है, वह ‘चीज़’ अब तक बची कैसे रह रही है, कि उसे किसने बचाया है, और यह कि बचाने का अर्थ वास्तव में क्या है? वह वस्तुओं के संबंधों में चल रही उठापटक और धड़कते जीवन की दिशा में बढ़ता तो किसी भी नुक्ते को पकड़कर तीनों लोक चौहदो भुवन थहाये जा सकते थे! स्पष्ट है कि बचाने की बात तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक यह न बताया जाए कि करप्ट क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है; वह क्या परिस्थिति है जिसमें चीज़ों को बचाने की ज़रूरत खड़ी हो रही है? यहां आप देखें कि कवि की दृष्टि, उसका आलोचनात्मक बोध किस भांति काव्य-अभिव्यक्ति को संकुचित किये दे रहा है और वह अपनी ही बात को अधूरा छोड़ देने व चीजों के नाम गिनाने में मशगूल हो जाने को अभिशप्त है।
इस प्रकार कविता में जो कहना था, वह तो उससे छूट ही रहा है; दृष्टिहीनता के कारण आदर्शवादी मूल्य-बोध कवि से वह उगलवा ले रहा है जो सबसे पहले खुद उसी के खिलाफ है। कविता में क्या कहना है, इस संबंध में भ्रम भटकन हो सकती है पर किसी भी कवि को हर हाल में यह मालूम होना पड़ेगा कि कविता में उसे क्या नहीं कहना है। यहां से आप समझ सकते हैं कि अवधी के कवि की समस्या दरअसल कितनी विकराल है। सीरीफोर्ट में सुनाई गई कविताओं तक इस दृष्टिहीनता की व्याप्ति है। टिप्पणीकार भी इसी कॉमन सेंस में रह रहे हैं।
संस्कृति के नीति नियमन को, मूल्यों की कार्यप्रणाली को, भेदभाव के वैधीकरण पर टिकी सामाजिक व्यवस्था की गतिकी को देखना इसलिए ज़रूरी है ताकि कवि को यह ठीक ठीक पता चल सके कि जो वह कह रहा है सो क्या है और अवधी से बढ़कर उसकी रचना सबसे पहले खुद उसी के खिलाफ क्यों है; कि कविता में उसे दरअसल कहना क्या था!
समीक्षक को यह देखना होगा कि क्षमा दया के मूल्यों से पोषित अवतारवादी मूल्य प्रणाली अ-समानता की, इन-इक्वलिटी की पद्धति का अनुगमन कर रही है। ़अवधी समाज की रीतियों, रिवाजों, संस्कारों, मान्यताओं, कहावतों और लोकोक्तियों में भी इन-इक्वलिटी का ऑरपेशन चल रहा है। किसी भी संदर्भ में हर समय पॉजिटिव पक्ष भी मौजूद है - यह बात उस संदर्भ के क्रिया-व्यापार को, उसकी प्रोसेस को देखकर ही समझी जा सकती है। इसलिए दास्य भाव के संस्कारों से पीडि़त अवधी के समीक्षक व रचनाकार को मूल्य व्यवस्था, परिवार व्यवस्था और निजी संपत्ति की सामाजिक प्रणाली को ध्यान से समझने की ज़रूरत है। दृष्टि-विकास हुए बिना काव्य विकास नहीं हो सकता! सामाजिक बोध का स्तर अभी ऊपर उठाने की जरूरत है।
कविता की भाषा में छपकोरिया मारने वाले देखें कि दृष्टि व दर्शन का छल-बल, भौतिक परिस्थिति का ही छल-बल है। अ-समानता की क्षय बोलकर ही महानता की जय बोली जा सकती है-यह दोनों बातें एक साथ जिसके बोध में नहीं है, वह कवि, कविता व समीक्षक तीनों आत्मघात का शिकार होने को अभिशप्त होंगे और आखिरकार लोक विरोधी प्रवृत्तियों का घर भरेंगे। अवधी समाज का सच बोलना कितना चुनौतीपूर्ण है, यह आप देख लीजिए। अवधी बोली में लिखी जाकर भी कोई कविता अवधी विरोधी हो सकती है - इसे देखना होगा समीक्षक को।
दास्य भाव को हिंदी आलोचना के केंद्र में स्थापित करने का काम रामचंद्र शुक्ल का है। साहित्य में भक्ति, भजन ने यह काम किया। तीसरी सदी के कलि संकट के बाद मध्यदेश में अग्रहार दे-देकर बड़ी तादाद में ब्राह्मणों को बसाये जाने से समाज की भौतिक परिस्थिति में दास्य भाव को जड़ जमाने का मौका मिला। (देखें, राम शरण शर्मा, अर्ली मेडिवल इंडिया)। भक्ति, भेद का भाव है। भक्ति की पोषक संस्थाओं के क्रिया-व्यापार को अगर अनदेखा किया जाएगा तो अवधी की वास्तविक रचनाशीलता तो आंख से ओझल होगी ही, समाज विरोधी रचनाओं को ही सामूहिक अभिव्यक्ति की तरह पेश कर दिया जाएगा। हद यह है कि शुक्ल जी तुलसीदास की विशेषता भी ठीक से नहीं बता सके हैं। तुलसी की कविता के महत्वपूर्ण स्थलों को देखने के लिए दास्य भाव व अवतारवाद की संकुचित दुनिया से निकलकर पदार्थवादी चिंतन की दिशा में बढ़ना होगा। यह अवतारवादी दर्शन की सीमा व अंतर्विरोध है कि वह लम्पट ही विकसित कर सकता है जो हर सूरत में दृष्टिहीन ही होगा। नरेंद्र मोदी इस विचार का सबसे चमकदार उदाहरण है। ‘इसमें जो दमक रहा वो शर्तिया काला है’ (वीरेन डंगवाल)। शुक्ल जी के फैलाये आलोचनात्मक भ्रष्टाचार से बाहर निकले बगैर जन मन की चित्त गति पल्ले नहीं पड़ सकती।
अवधी की किसी कविता में सारे तामझाम के बावजूद लोक गायब रह सकता है और खड़ी बोली की किसी रचना में बहुतेरी सादगी के साथ भी लोक की निभ सकती है। साहित्य और काव्य के संदर्भ में मुख्य प्रश्न दृष्टि व विचार का है। लोक को समूह की सतह पर, ज्ञान के धरातल पर ही पकड़ा जा सकता है। वस्तुओं, स्थितियों और संबंधों को आर-पार लखकर ज़मीन, जीवन और जुबान के ऑल टाइम ट्रुथ को बोलने की दिशा में जो रचना जितना आगे बढ़ेगी, वह लोक के उतना ही निकट चलती चली जा सकती है। ऐसे में उसका श्रृंगार भी लौकिक हो सकता है और उक्ति-वैत्रित्य भी आत्मविश्वास युक्त हो सकता है।
अवतारवाद और परिवारवाद के दायरे से बाहर निकलकर कैसी रचना हो सकती है, इसके उदाहरण के लिए सहदेव वर्मा का यह पद देखिए-
तीनय बचनिया निभाया तबय तू बैरागी कहाया
धरती कै हंडा अकासे कै ढकना
बिना जल खिचड़ी पकाया तबय तू बैरागी सजनवां
चांद कै सब्जा सुरुज कै फोंफी
सुकवा कै नग धरवाया तबय तू वैरागी कहाया
पवन कै साया बताय कै साड़ी
बदरा कै चोलिया सिआया तबय तू बैरागी कहाया ....।
तीनय बचनिया निभाया तबय तू बैरागी कहाया
धरती कै हंडा अकासे कै ढकना
बिना जल खिचड़ी पकाया तबय तू बैरागी सजनवां
चांद कै सब्जा सुरुज कै फोंफी
सुकवा कै नग धरवाया तबय तू वैरागी कहाया
पवन कै साया बताय कै साड़ी
सहदेव की दुनिया में भेद का अधिष्ठान कोई भगवान नहीं है इसलिए शक्ति, शील और सौन्दर्य के मानकों की कोई जरूरत नहीं है, यहां किसी को निष्ठावान और दयावान होने का कोई काम नहीं है, किसी को भजन कीर्तन करने की कोई जरूरत नहीं है। कहां से कहां तक प्रकृति को अढ़ाई चाल में नाधकर कोई कविता कैसे उत्कृष्ट बनती है, इसकी मिसाल देख लीजिए यहां। यह श्रमशील मनुष्य की समूहवाची ज्ञानात्मक परंपरा से पोषण प्राप्त कर रही है। भक्ति का भ्रष्टाचार अभी यहां तक नहीं पहुंच सका है, जबकि वैराग्य की बात की जा रही है। यह लोक की कविता है। यह अवधी की कविता है।
अवधी में ऐसी रचनाओं की कमी नहीं है मगर अवतारवादी अंधेरे के आरपार ‘देखेगा’ कौन? जबकि पूरा मैदान खाली पड़ा है।
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