रविवार, 14 अगस्त 2016

कवंल भारती जी हिंदी आलोचना के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। हिंदी  और हिंदी के बाहर उनको बड़ी गंभीरता से सुना और पढ़ा जाता है । जब नई चमकदार लेकिन हवाबाज शासन सरकार के आगे दलित मुक्ति कई तथाकथित बुद्धिजीवी घुटने टेक रहे हैं। ऐसे में कवंल भारती देश की जनता के साथ खड़े हैं। ऐसा नहीं है कि उनका यह खड़ा होना कोई नई बात है। जब बथानी और बाथे नरसंहार पर दलित साहित्यकार चुप थे तब ये कँवल भारती ही थे जो खुलकर लिख रहे थे। उनका लेखन और जीवन दोनों में बहुत दू नहीं है। ब्राह्मणवाद के खिलाफ उनकी कविता समानांतर नए जीवन दर्शन को प्रस्तावित करती है, दलित मुक्ति की ,आजादी की नयी परिभाषा गढ़ती है। 15 अगस्त के अवसर के लिए लिखी उनकी महत्वपूर्ण कविता प्रस्तुत है। कविता का शीर्षक भी पंद्रह अगस्त ही है:
तुम बोलते हो महात्मा गांधी की जय
पंद्रह अगस्त पर
और भूल जाते हो डा0 अम्बेडकर को
जिन्होंने स्वाधीनता का मार्ग प्रशस्त किया था।

तुम अभिनन्दन करते हो
खुदीराम,सुखदेव,आजाद और भगत सिंह का
जिन्हें अंग्रेजों के अत्याचारों ने बनाया था विद्रोही
लेकिन नहीं खौलता था, जिनका खून
हिंदुओं के अत्याचारों से
जो वे ढाते थे दलितों पर।

तुम याद करते हो
अंग्रेजों के काले कानूनों को
जिन्होंने बनाया था करोड़ों इंसानों को गुलाम।

तुम्हे याद आती है लक्ष्मी बाई
जो अंग्रेजों से बचकर भागी थी चोर दरवाजे से
और झाँसी की रक्षा में शहीद होने वाली
दलित वीरांगना झलकारी बाई को
तुम भूल जाते हो।

तुम्हारी स्मृति में चौरी चौरा के शहीद नहीं आते
तुम्हे याद आते हैं जालियां वाला बाग़ के शहीद
और भूल जाते हो
दलित वीर ऊधम सिंह को
जिसने डायर को मार कर बदला लिया था।

तुम स्मरण आते हो मंगल पांडे को
पंद्रह अगस्त पर
और नाम तक नहीं लेते
मातादीन भंगी का
जिसने गदर का मंत्र दिया था
पाण्डे को।

तुम गर्व करते हो
देश की राजनीतिक स्वतंत्रता पर
हम आज भी जरुरी समझते हैं
सामाजिक स्वतंत्रता को
हमारे लिए अर्थहीन है उस देश की आजादी
जहाँ करोड़ों मनुष्य जीते हैं गुलामी की जिंदगी

हम चेतावनी देते हैं
इस पंद्रह अगस्त पर
यदि जीवित रखना है लोकतंत्र को
देश की राजनीतिक स्वतंत्रता को
तो नष्ट कर दो जाति के दम्भ को
वर्ण की सोच को
बनो समता के पक्षधर
उठो जाति-वर्ग विहीन समाज के निर्माण के लिए
एक और स्वतंत्रता संग्राम लड़ने के लिए। (10.08.91)

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