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| (फेसबुक से साभार ) |
दुनिया आज एक ऐसी महामारी से खौफजदा है जिसका कोई चिकित्सकीय हल अभी निकट के दिनों में नहीं दिख रहा है। इसलिए अनुमान है कि इसकी विकरालता और इससे उपजने वाले संकट लंबे समय तक बरक़रार रहेंगे। इसने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था को जन्म दिया है जिसमें हर कोई एक दूसरे को संदेह की नजर से देख रहा है। चाह कर भी लोग अपने परिजनों के प्रति आवयविक ढंग से लगाव और प्यार व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं। इसने एक खास तरह की अलगाववादी भावना को जन्म दिया है। इस अलगाव से लड़ने के तरीके के तौर पर तकनिकी ने एक माध्यम के रूप में विकल्प मुहैया कराया है। हमें भूलना नहीं चाहिए। यह वही तकनिकी है जिसके बारे में यह कहा जा रहा था कि इसने मनुष्य के बीच कायम भौतिक दूरी को नजदीकी आभास में भले ही बदल दिया है। लेकिन यह आभासी नजदीकी आवयविक भौतिक नजदीकी का विकल्प नहीं हो सकती। इस तकनिकी ने हमारे चिंतन पद्धति को बदल दिया है। फेसबुक जैसे माध्यमों पर किसी विषय विशेष पर मित्र सूची के लोगों के आपसी संवाद की प्रकृति के बारे में लोगों का मूल्यांकन यह होता था कि अपनी प्रतिक्रियाओं में लोग कठोर होते जा रहे हैं। लेकिन वे ही मित्र जब भौतिक रूप से एकदूसरे के आमने सामने होकर संवाद करते हैं तो उस संवाद की प्रकृति और आपसी सद्भाव का स्तर ज्यादा मानवीय होता है। क्या कोरोना काल ने अब उस आभासी कही जाने वाली दुनिया के व्यवहार को भौतिक व्यवहार में बदल दिया है? क्या हम अब इस आभासी कही जाने वाली दुनिया में सहज होते जा रहे हैं? क्या मनुष्य का व्यवहार,उसका स्वाभव पूरी तरह बदल जायेगा? क्या हमारे पुराने किस्म के सामाजिक व्यवहार बीते जमाने की बात हो जायेगे? निःसंदेह दुनिया के एक हिस्से का स्वाभाव और व्यवहार हमेशा के लिए बदल जायेगा। यह अनायास ही नहीं है कि दुनिया के अनेक चिंतकों ने कोरोना के बाद दुनिया के बदल जाने की बात कही है। लेकिन यह बदली हुई दुनिया कुछ लोगों के आधिपत्य की दुनिया होगी। एक तरफ तकनिकी के बेतहाशा प्रयोग से आधुनिकता के दूसरे चरण की जहाँ पुष्टि होगी वहीँ कुछ लोगों के लिए दुनिया के इतिहास का चक्र पीछे की तरफ घूम जायेगा। दुनिया में पहले से व्याप्त गैरबऱाबरी की गली और चौड़ी हो जायेगी।
यह महज संयोग नहीं है कि दुनिया भर की राज्य व्यवस्थाओं के लिए यह बीमारी एक 'अवसर' लेकर आई है। वे इस अवसर का इतेमाल अपने आप को एकाधिकारवादी ढंग से मजबूत करने में कर रही हैं। अनेकों लोग इस बात को महसूस कर रहे हैं कि राज्य व्यवस्थाएँ नागरिक निगरानी तंत्र को बढाकर राज्य की शक्ति में बेहिसाब बढ़ोत्तरी कर रही हैं। इस मामले में वे उसी तकनिकी का सहारा ले रही हैं जिनके सहारे नागरिक अपने अलगाव की संभावित क्षणिक परिस्थिति से लड़ने या उबरने की कोशिश कर रहे हैं। जिनकी इस तकनिकी तक पहुँच है उसका एक बड़ा हिस्सा उबर सकता है लेकिन उनका क्या होगा जिनकी इस तकनिकी तक पहुँच ही नहीं है। जो लोग महानगरों से अपने घरों के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल रहे हैं अगर उनके पास इस तकनिकी तक पहुँच की क्षमता होती तो शायद उनको यह जानकारी होती कि ट्रेन चल रही है और वे चलते हुए थककर ट्रैक पर निश्चिन्त भाव से सोते हुए अपनी जान नहीं गवांते। लोगों का अपने घरों को किसी भी सूरत में पहुँचने की अदम्य इच्छा राज्य व्यवस्था से उनके भरोषे के टूटने के अलावा कुछ भी नहीं है। बहुतेरे दृश्य हैं जिनमे लोग अपनी जगहों पर पहुंचकर वहाँ की धरती को चूमते हुए दिख रहे हैं। इन दृश्यों को मामूली अर्थों में नहीं लिया जा सकता है। दुनिया आज एक ऐसी महामारी से खौफजदा है जिसका कोई चिकित्सकीय हल अभी निकट के दिनों में नहीं दिख रहा है। इसलिए अनुमान है कि इसकी विकरालता और इससे उपजने वाले संकट लंबे समय तक बरक़रार रहेंगे। इसने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था को जन्म दिया है जिसमें हर कोई एक दूसरे को संदेह की नजर से देख रहा है। चाह कर भी लोग अपने परिजनों के प्रति आवयविक ढंग से लगाव और प्यार व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं। इसने एक खास तरह की अलगाववादी भावना को जन्म दिया है। इस अलगाव से लड़ने के तरीके के तौर पर तकनिकी ने एक माध्यम के रूप में विकल्प मुहैया कराया है। हमें भूलना नहीं चाहिए। यह वही तकनिकी है जिसके बारे में यह कहा जा रहा था कि इसने मनुष्य के बीच कायम भौतिक दूरी को नजदीकी आभास में भले ही बदल दिया है। लेकिन यह आभासी नजदीकी आवयविक भौतिक नजदीकी का विकल्प नहीं हो सकती। इस तकनिकी ने हमारे चिंतन पद्धति को बदल दिया है। फेसबुक जैसे माध्यमों पर किसी विषय विशेष पर मित्र सूची के लोगों के आपसी संवाद की प्रकृति के बारे में लोगों का मूल्यांकन यह होता था कि अपनी प्रतिक्रियाओं में लोग कठोर होते जा रहे हैं। लेकिन वे ही मित्र जब भौतिक रूप से एकदूसरे के आमने सामने होकर संवाद करते हैं तो उस संवाद की प्रकृति और आपसी सद्भाव का स्तर ज्यादा मानवीय होता है। क्या कोरोना काल ने अब उस आभासी कही जाने वाली दुनिया के व्यवहार को भौतिक व्यवहार में बदल दिया है? क्या हम अब इस आभासी कही जाने वाली दुनिया में सहज होते जा रहे हैं? क्या मनुष्य का व्यवहार,उसका स्वाभव पूरी तरह बदल जायेगा? क्या हमारे पुराने किस्म के सामाजिक व्यवहार बीते जमाने की बात हो जायेगे? निःसंदेह दुनिया के एक हिस्से का स्वाभाव और व्यवहार हमेशा के लिए बदल जायेगा। यह अनायास ही नहीं है कि दुनिया के अनेक चिंतकों ने कोरोना के बाद दुनिया के बदल जाने की बात कही है। लेकिन यह बदली हुई दुनिया कुछ लोगों के आधिपत्य की दुनिया होगी। एक तरफ तकनिकी के बेतहाशा प्रयोग से आधुनिकता के दूसरे चरण की जहाँ पुष्टि होगी वहीँ कुछ लोगों के लिए दुनिया के इतिहास का चक्र पीछे की तरफ घूम जायेगा। दुनिया में पहले से व्याप्त गैरबऱाबरी की गली और चौड़ी हो जायेगी।
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| फेसबुक से साभार |
यह महज संयोग नहीं है कि दुनिया भर की राज्य व्यवस्थाओं के लिए यह बीमारी एक 'अवसर' लेकर आई है। वे इस अवसर का इतेमाल अपने आप को एकाधिकारवादी ढंग से मजबूत करने में कर रही हैं। अनेकों लोग इस बात को महसूस कर रहे हैं कि राज्य व्यवस्थाएँ नागरिक निगरानी तंत्र को बढाकर राज्य की शक्ति में बेहिसाब बढ़ोत्तरी कर रही हैं। इस मामले में वे उसी तकनिकी का सहारा ले रही हैं जिनके सहारे नागरिक अपने अलगाव की संभावित क्षणिक परिस्थिति से लड़ने या उबरने की कोशिश कर रहे हैं। जिनकी इस तकनिकी तक पहुँच है उसका एक बड़ा हिस्सा उबर सकता है लेकिन उनका क्या होगा जिनकी इस तकनिकी तक पहुँच ही नहीं है। जो लोग महानगरों से अपने घरों के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल रहे हैं अगर उनके पास इस तकनिकी तक पहुँच की क्षमता होती तो शायद उनको यह जानकारी होती कि ट्रेन चल रही है और वे चलते हुए थककर ट्रैक पर निश्चिन्त भाव से सोते हुए अपनी जान नहीं गवांते। लोगों का अपने घरों को किसी भी सूरत में पहुँचने की अदम्य इच्छा राज्य व्यवस्था से उनके भरोषे के टूटने के अलावा कुछ भी नहीं है। बहुतेरे दृश्य हैं जिनमे लोग अपनी जगहों पर पहुंचकर वहाँ की धरती को चूमते हुए दिख रहे हैं। इन दृश्यों को मामूली अर्थों में नहीं लिया जा सकता है।


आईडिया शानदार लग रहा है। पूरा लेख पढ़कर ही राय दूंगा। फिलहाल बधाई स्वीकारें।
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