लिंडसी जर्मन
पितृसत्ता
की सैद्धांतिकी
(Spring
1981)
(लिंडसी जर्मन का जन्म लन्दन में सन १९५१ में हुआ था.
वह लम्बे समय तक ब्रिटेन की सोसलिस्ट वर्कर्स पार्टी की सदस्य रहीं और इसकी
पत्रिका सोसलिस्ट रिव्यू की संपादक रही हैं. इन्होने बहुत सारी चर्चित किताबें
लिखी हैं.)
·
मटेरियल
गर्ल: वोमेन, मेन एंड वर्क
·
सेक्स क्लास एंड सोस्लिज्म
·
अंतरराष्ट्रीय
समाजवाद, 2:12, Spring 1981.
Copied with thanks from the International Socialism Website. (से साभार )
Marked up by Einde O’Callaghan for the Encyclopaedia of Trotskyism On-Line (ETOL).
Copied with thanks from the International Socialism Website. (से साभार )
Marked up by Einde O’Callaghan for the Encyclopaedia of Trotskyism On-Line (ETOL).
प्रस्तुत है इस लेख के एक हिस्से का हिंदी अनुवाद
आज के
स्त्री आन्दोलन के इर्दगिर्द सबसे मजबूत और व्यापक सिद्धांत संभवतः पितृसत्ता है.
इसके अनेकों रूप हैं लेकिन इसके पीछे के विचार जैसे पुरुष वर्चस्व या लैंगिक
भेदभाव ऐसी चीजें हैं जो पूंजीवाद का उत्पाद नहीं हैं लेकिन पूंजीवादी उत्पादन
प्रणाली से बिलकुल अलग और इसके परे होने की बात को इतना व्यापक स्तर पर स्वीकार कर
लिया गया है कि यही पूर्ण और मूल बात मान ली गयी है.
इस तरह के सिद्धांतों में यह समझदारी निहित होती है कि महिलाओं के दमन और परिवार की प्रकृति में कैसे ऐतिहासिक
रूप से बदलाव हुए हैं. किसी भी देश में एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के होने वाले
दमन में कोई अंतर नहीं होता है. यह अंतिम सत्य है कि महिलाओं के दमन का प्रमुख
कारण पितृसत्ता है.
यह बात इसलिए भी सत्य है क्योंकि महिलाओं का दमन पश्चिमी पूंजीवादी
देशों के वर्ग आधारित समाजों के आलावा रूस, चीन, क्यूबा, पूर्वी यूरोप जैसे तथाकथित
समाजवादी समाजों में भी मौजूद है.
पितृसत्ता का सिद्धांत महिला आन्दोलन की उस व्यापक स्वीकृत धारणा को
बल पहुंचाता है कि महिला आन्दोलन के संघर्षों को अलग अलग चलाना होगा. क्योंकि
समाजवाद और मजदूरों का आन्दोलन पूंजीवाद के खिलाफ लड़ता है जबकि महिलाओं का आन्दोलन
पितृसत्ता के ख़िलाफ़ अलग लड़ाई लड़ता है. संघर्षों को अलग करने का तर्क भविष्य में हर
लिंग के सामाजिक विकास को निर्धारित करेगा. यह वह तर्क है जिसे पितृसत्ता के
सिद्धांत को मानने वाला कोई भी व्यक्ति स्वीकार नहीं करेगा. लेकिन अगर वास्तव में
पितृसत्ता कोई ऐसी चीज है जिसके कारण सभी पुरुष सभी महिलाओं का दमन करते हैं तब
महिलाओं और पुरुषों के एक साथ मिलकर लड़ने से इसे कैसे ख़त्म किया जा सकता है?
इस सन्दर्भ में मैं अलग ढंग से अपना तर्क प्रस्तुत करना चाहती हूँ. मैं
पितृसत्त्ता की अवधारणा को ख़ारिज करती हूँ. महिला दमन ( महिला दमन को न व्यक्त कर
पाने के सन्दर्भ में) को व्यक्त करने का दावा करने वाला यह शब्द अव्यवस्थित है और
यह पूरी तरह से एक आदर्शवादी धारणा को व्यक्त करता है जिसका कोई वस्तुगत आधार नहीं
है. मैं यह दिखाना चाहती हूँ कि स्त्रियों के दमन का लाभ पुरुष को नहीं बल्कि
पूंजी को होता है. मैं उस तरीके पर विचार करना चाहती हूँ जिसमें परिवार बदल चुका
है और इसकी वजह से महिलाओं की अपने बारे में खुद की धारणा बदल चुकी है. इस तरह से
देखने पर यह पता चलेगा कि महिलाओं का निरंतर दमन पुरुषों के षड्यंत्र ( या पुरुष
मजदूर और पूंजीपति वर्ग के गठजोड़) का परिणाम नहीं है. यह दुनिया के हर हिस्से में
वर्ग आधारित समाज की निरंतरता के कारण है. महिलाओं की मुक्ति का दावा करने वाले
समाजवादी देशों के समाजों में भी यही बात लागू होती है.
अंतत मैं उस सवाल को स्वीकार करना चाहती हूँ जो समाजवादियों के ऊपर
हमेशा थोपे जाते हैं. एंगेल्स और शुरूआती मार्क्सवादियों ने यह माना कि सर्वहारा
परिवार (बुर्जुआ परिवार के विपरीत) ख़त्म हो जायेगा क्योंकि यह संपत्ति पर आधारित
नहीं है. स्पष्ट तौर पर यह नहीं हुआ. चुकी मैं यह विश्वास नहीं करती हूँ कि इसका
कारण पितृसत्ता है. मैं इसके लिए उन चीजों पर विचार करना चाहती हूँ जिसके कारण
परिवार बचा हुआ है.
सिद्धांत के विविध रूप
पितृसत्तात्मक
सिद्धांत का मजेदार पहलू यह है कि यह सभी लोगों में व्याप्त हर चीज में देखा जा सकता
है. यह अस्पष्ट भावनाओं पर आधारित होता है. इसलिए इसके भौतिकवादी आधारों की व्याख्या के बजाय महिला
आन्दोलन के तमाम हिस्सों में इसको मान्यता हासिल है.इसके इतने सारे रूप हैं कि
इसके लिए किसी एक पारिभाषिक शब्द का निर्धारण कठिन है.
उदाहरण के तौर पर पितृसत्ता का अर्थ उस विशेष समाज से है जिसमे पिता
न केवल महिलाओं पर बल्कि अपने से उम्र में छोटे पुरुषों पर भी शासन करता है. इस
तरह का समाज आंशिक तौर पर घरों में किसान या शिल्पी वर्ग के उत्पादन के आधारों पर
निर्भर करता है. ‘पिता की सत्ता’ उत्पादित संपत्ति पर उसके अधिकार और जमीन के ऊपर
मालिकाना हक़ से प्राप्त होती है. लेकिन अधिकांश मामलों में ऐतिहासिक रूप से विशिष्ट
समाज का अर्थ उस पद से नहीं जुड़ता है. यहाँ तक कि पितृसत्ता के सिद्धांतों को
मानने वाले भी इस बात को देख सकते हैं कि आज हम इस तरह के किसान समाज में नहीं
रहते हैं जिसका मुख्य सरोकार आज के महिला दमन को संचालित करना है.
सिद्धांत के प्रमुख संस्करणों के दो रूप हैं.
पहला, कुछ लोग हैं जो पितृसत्ता को शुद्ध रूप से वैचारिक पदावली के
रुप में देखते हैं. उदाहरण के रूप में जूलिएट मिशेल एक साफ अंतर करती हैं: “ हम दो
स्वायत्त क्षेत्रों को लेकर चलते हैं, पूंजीवाद का आर्थिक पहलू और पितृसत्ता का
वैचारिक आधार.” शैली अलेक्जेंडर और बारबरा टायलर भी पितृसत्ता के पक्ष में इसी तरह
के तर्क देती हैं.
इस तरह के आर्थिक और वैचारिक अलगाव की जांच होनी चाहिए. समाज के
आर्थिक आधारों और उस समाज में बनने वाले विचारों के बीच सदैव एक सम्बन्ध होता है.
दोनों को अलग-अलग चीज के तौर पर नहीं देखा जा सकता है. जैसा कि मार्क्स ने बहुत
पहले उल्लेख किया था कि यदि आप इतिहास को वर्चस्वशाली विचारों या परंपरागत विचारों
के परिणाम के रूप में देखेंगे तो समाज के विकास के बारे में कोई भी व्याख्या नहीं
कर पायेंगे. कोई विचार अगर वर्चस्व में होता है तो किसलिए? और वर्चस्व वाला विचार
बदलता क्यों है?
अगर हम महिलाओं की स्थिति के प्रति जिम्मेदार धार्मिक धारणा को ख़ारिज
भी कर दें, तो हमें उस भौतिक परिस्थिति के बारे में विचार करना पड़ेगा जिसने संसार
में मनुष्य को एक दूसरे के प्रति खास संबंधों के दायरे में काम करने को प्रेरित
किया है. महिलाओं के दमन के उद्भव को इन्हीं चीजों में देखा जाना चाहिए जैसे किसी
और सामाजिक परिघटना के उद्भव को देखा जाता है. तभी हम पितृसत्ता और महिला दमन को
प्रश्रय देने वाले विचारों और पितृसत्ता के ख़िलाफ़ उठने वाले संघर्षों को हम सार्थक
ढंग से समझ सकते हैं.
सन १८४५ में मार्क्स ने जो लिखा, वह समाज में और दूसरी किसी चीज पर जितना लागू होता है
उतना ही महिला दमन के सन्दर्भ में भी लागू होता है:
हम चीजों का निर्धारण पुरुषों के कथन,कल्पना और अभिग्रहण
से नहीं करते हैं इसके बारे में भी कि आखिर पुरुष के शरीर में बदलाव कैसे आये.
दरसल हम सक्रीय मनुष्य के बारे में किसी चीज का निर्धारण सत्य और मनुष्य के
वास्तविक जीवन की प्रक्रिया के आधार पर करते हैं और इसी के आधार पर हम उसकी
वैचारिक अभिव्यक्तियों और प्रतिध्वनियों के विकास क्रम को भी निर्धारित करते हैं.
नैतिकता, धर्म आध्यात्म सभी विचारधाराएँ और इनसे जुड़े हुए चेतना के अनेकों रूप भी
अधिक समय तक स्वायत्त रूप में नहीं देखे जा सकते हैं अर्थात ये एक दूसरे से गहरे स्तर
पर जुडे हुए हैं. स्वतंत्र रूप से इनका कोई इतिहास नहीं है, कोई विकास नहीं है
बल्कि इनका इतिहास और विकास मनुष्य के भौतिक उत्पादन और पदार्थ के साथ मनुष्य के
रिश्ते, उसके वास्तविक अस्तित्व, चिंतन और चिंतन के उत्पाद का ही इतिहास है. जीवन
चेतना से नहीं बल्कि चेतना जीवन से निर्धारित होती है.
इसके
उलट पितृसत्ता को एक स्वतंत्र ‘विचारधारा’ मानने के लिए यह मानना होगा कि विचार
स्वायत्त होते हैं. तब महिलाओं की मुक्ति के लिए चलने वाले संघर्षों का भौतिक शोषण के ख़िलाफ़ चलने वाले संघर्षों के साथ
कोई भी रिश्ता ख़त्म हो जायेगा, जिसके तहत लाखों महिला और मजदूरों के सरोकारों में
एकता कायम हो सकती है. यह तो वही बात हो जाएगी जो अलेक्जेंडर और टायलर कहती हैं.
उनके अनुसार समाज परिवर्तन के बजाय लोगों के विचारों को बदलने के लिए एक
सांस्कृतिक संघर्ष की जरुरत है. इसी से यह पता चलता है कि महिला आन्दोलन की
स्वायत्तता का विचार कैसे विकसित होता है. यदि विचार आर्थिक शोषण की प्रक्रिया से
स्वायत्त हैं, तो महिलाओं के दमन के ख़िलाफ़ होने वाले संघर्ष स्वायत्त क्यों नहीं?
कुछ महिलाओं ने इसमें अंतर्विरोध देखा है इसलिए हाल ही में पितृसत्ता
के भौतिकवादी सिद्धांत को विकसित करने की
कोशिश किया है. उनका तर्क है कि महिलाओं के दमन से पुरुषों को लाभ मिलता है और
पुरुषों द्वारा यह दमन इसलिए संभव हो पाता है क्योंकि स्त्री और पुरुष में मूल
जैविक अंतर होता है. पितृसत्ता का मूल आधार यहाँ है जैसा कि राबर्ट हेमिल्टन कहती
हैं:
“ पितृसत्ता की विचारधारा के बारे में स्त्रीवादी विश्लेषणों में खुद
कहा गया है कि किसी भी समाज का पितृसत्तात्मक ढांचा ही पुरुष वर्चस्व और स्त्री
पराधीनता की व्यवस्था को परिभाषित करता है. लेकिन (विचारधारा) पितृसत्ता का आधार
स्त्री और पुरुष के बीच के जैविक भिन्नता को माना जाता है. इसी को इसका ऐतिहासिक आधार
भी सिद्ध किया जाता है.
क्रिस्टिन
डेल्फी ‘द मेन एनमी’ में क्रान्तिकारी नारीवादी दृष्टिकोण से इसी तरह का भौतिकवादी
तर्क प्रस्तुत करती हैं. इसी तरह का प्रयास लेकिन मार्क्सवादी श्रेणियों का प्रयोग
करते हुए हैदी हार्टमन भी करती हैं. यही वह बात है जिसको बहुत हद तक मैं देखना चाहती
हूँ. अगर इस तरह के तर्क गलत दिखाए जायेंगे तो पितृसत्ता के सिद्धांत और
मार्क्सवाद के बीच जुड़ाव के सारे प्रयास विफल हो जायेंगे.
क्या पुरुष महिलाओं के शोषक हैं?
हार्टमन
पितृसत्ता को “पुरुषों के बीच के सामाजिक संबंधों के ऐसे समुच्चय के रूप में
परिभाषित करती हैं जिसका भौतिक आधार है, यह वर्चस्ववादी है, आतंरिक परनिर्भरता
पैदा करता है या पुरुषों के बीच ऐसी एकजुटता कायम करता है जिसके कारण वे महिलाओं
के ऊपर शासन करने में समर्थ हो जाते हैं.” वह आगे कहती हैं “पितृसत्ता का भौतिक
आधार मूल रूप से पुरुषों द्वारा महिलाओं के श्रम शक्ति पर कायम नियंत्रण में छुपा
हुआ है. यह केवल परिवार में प्रसव की परिस्थिति में ही नहीं छुपा हुआ होता है
बल्कि उन सारी सामाजिक संरचनाओं में होता है और इन्हीं से पुरुष महिला श्रम पर
नियंत्रण करने में समर्थ हो जाता है.” महिलाओं को उनके जरुरी बुनियादी आर्थिक
उत्पादक संसाधनों को न मुहैया कराकर और उनकी यौनिकता को प्रतिबंधित करके ही इस
पुरुष नियंत्रण को बरक़रार रखा जाता है.
इन आर्थिक उत्पादन के संसाधनों को महिलाओं को न उपलब्ध कराकर पुरुष
पूंजी के साथ एक गठजोड़ तैयार करता है. इसके उदाहरण पूंजीवाद के विकास में दिखाई
देते हैं और तब भी जब मजदूर अपनी समस्याओं को हल करने के लिए सुरक्षात्मक कानून और
परिवार के भरण-पोषण की मांग करते हैं. तर्क यहं तक जाता है कि इन दोनों अधिकारों
के लिए पुरुषों द्वारा हुआ संघर्ष भी पुरुषों के लाभ के लिए ही था ताकि इसी के
बहाने महिलाओं को घरों में रखा जा सके ताकि वे पुरुषों की सेवा कर सकें और पुरुष
उनकी यौनिकता की निगरानी कर सकें. लेकिन क्या यह दृष्टिकोण ठीक है?
ब्रिटेन में पूंजीवाद के विकास ने वहां के घरेलू उत्पादन को नष्ट कर
दिया तथा महिलाओं, बच्चों और पुरुषों को कारखाने की व्यवस्था में ढकेल दिया.
मजदूरों के प्रजनन पर इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ा. माताओं के द्वारा घर से घंटों
बाहर रहकर काम करने के कारण बच्चों की मृत्यु भीषण स्तर पर पहुँच गयी (जैसा कि
मार्क्स ने पूँजी में दिखाया है.) बच्चों को थोडा बड़े बच्चों के सहारे छोड़ दिया
जाता था या बच्चों की देखभाल करने वाले सहायक के भरोसे जो खुद ही बच्चों की
उपेक्षा करता था और बच्चों को शराब या अफीम के सहारे शांत रखता था. जब वे पर्याप्त
बड़े हो जाते थे तो उन्हें भी कारखाने के उत्पादन में लगा दिया जाता था. जैसा कि मार्क्स ने लिखा है :
“श्रम और मजदूरों के बड़े विकल्प के रूप में मशीनों ने जल्द ही मजदूरों
के परिवारों के सभी सदस्यों को चाहे स्त्री हो या पुरुष पूंजी के बहाव में दिहाड़ी
मजदूर में बदल दिया.”
इन
स्थितियों का चित्रण मार्क्स और एंगेल्स द्वारा इंग्लैण्ड में कामगार वर्ग की
स्थितियाँ’ किया गया है, जो यह दिखाता है कि कारखाने की शुरूआती व्यवस्था
कितनी भयावह थी. नयी व्यवस्था का प्रभाव यह पड़ा कि पूर्व-पूंजीवादी परिवार के सभी
सदस्य दिहाड़ी मजदूर में बदल गए. पूंजीवादी शोषण ने अपनी सारी क्रूरताओं के बजाय यह
किया कि महिला और पुरुष दोनों को सम्पत्तिहीन वर्ग में बदल दिया, अंततः आपस में
समान सर्वहारा वर्ग था. स्त्री और पुरुष दोनों को दिहाड़ी मजदूरी पर ही भरोसा करना
था और पुरुषों ने अपनी संपत्ति खो दिया था. यही कारण था कि एंगेल्स ने बुर्जुआ और
सर्वहारा परिवारों के बीच के अंतर को चिन्हित किया. कामगार वर्ग के परिवार के
अस्तित्व के ख़त्म हो जाने की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी थी. इस सन्दर्भ में एंगेल्स
ने उपर्युक्त लेख में जो कहा वह ठीक ही कहा.
लेकिन एंगेल्स कारखाने की
व्यवस्था के पुनरुत्पादन की प्रक्रिया पर पड़ने वाले प्रभाव को नहीं महसूस कर पाए .
कारखाने के उत्पादन का संभवतः सबसे उन्नत केंद्र मैनचेस्टर में एक वर्ष से कम उम्र
के प्रति एक लाख में 26,125 बच्चों की मृत्यु हो जाती थी और कुछ गैर औद्योगिक
क्षेत्रों में तो यह मृत्यु दर तीन गुना हो जाती थी. शासक वर्ग के कुछ दूरदर्शी
लोगों ने यह महसूस किया कि कारखानों को श्रमिकों के रूप में होने वाली आपूर्ति
नष्ट हो रही है.
इन्हीं परिस्थितियों के कारण सुरक्षात्मक कानून और परिवारिक भत्ता की
मांगे अस्तित्व में आयीं. वे पूंजीवाद की बदलती जरूरतों के लिहाज से ढल तो गये
लेकिन मजदूर वर्ग के पुरुषों और स्त्रियों के वास्तविक सरोकारों- बेहतर जीवन स्तर,
सुरक्षित गर्भ, स्वस्थ बच्चे और स्वच्छ घर आदि के प्रति सजग रहे.
( अनुवाद : राम नरेश राम )



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