सोमवार, 29 जुलाई 2013

दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय पाठ्यक्रम पर


                

                          शिक्षा: सामाजिक यथार्थ और सामाजिक सरोकार

“और आप की शिक्षा !क्या वह भी सामाजिक नहीं है और उन सामाजिक अवस्थाओं से ,जिनमे आप शिक्षा देते हैं,स्कूलों के जरिये समाज के,प्रत्यक्क्ष या परोक्ष ,हस्तक्षेप आदि से निर्धारित नहीं होती ?शिक्षा में समाज का हस्तक्षेप कम्युनिस्टों  की ईजाद नहीं है ; कम्युनिस्ट तो केवल इस हस्तक्षेप के स्वरूप को बदलना और शिक्षा का शासक  वर्ग के प्रभाव से उद्धार करना चाहते हैं. ’’ शिक्षा को शासक वर्ग की प्रेत छाया से मुक्त करने की यह  बात सन १९४८ में कमुनिस्ट घोषणा पत्र में कही गई थी . इसी तरह की प्रेत छाया हिन्दुस्तान को भी सता रही है जिसमे प्राथमिक शिक्षा हो या उच्च शिक्षा हर जगह इस प्रेत का प्रभाव दिखाई दे रहा है . शासक वर्ग शिक्षा को हमेशा अपनी विचारधारा को प्रचारित करने का माध्यम मानता रहा है . इसलिए शिक्षा प्रणाली में वह अपने हित में बदलाव भी करता रहा है .उसका शिक्षा के सामाजिक सरोकारों से बहुत लेना-देना नहीं होता है. उसके लिए शिक्षा ज्ञान निर्माण का माध्यम न होकर ‘मॉल’ होती है अथवा खरीद-फरोख्त की वस्तु जिसके माध्यम से फायदा कमाया  जा सके . ऐसे में शिक्षा के सामाजिक सरोकार वाले पहलू को धक्का पहुँचता है ,सामाजिक सरोकार को धक्का पहुँचने का अर्थ है किसी ऐसे समुदाय विशेष को नुकसान होना जो समाज की मुख्या धारा में शामिल ही नहीं था .ऐसा नहीं है कि शासक वर्ग जिस शिक्षा को निर्धारित करता है उसका कोई सामाजिक सरोकार होता ही नहीं है लेकिन उस सामाजिक सरोकार का उद्देश्य वह नहीं होता जो वास्तव में होना चाहिए.

    ज्ञान मुक्ति का साधन भी है और वर्चस्व का माध्यम भी.इसीलिए ज्ञान पर भी कब्जे की लड़ाई चलती रहती है और वर्चस्ववादी हमेशा अपने ज्ञान को श्रेष्ठ घोषित करता रहता है ताकि उसका प्रतिपक्षी उसके वर्चस्व को स्वीकार कर ले  . वर्चस्ववादी ज्ञान निर्माण के साथ-साथ संहिता का भी निर्माण करता है जिसमे यह नियम होता है कि उसके द्वारा निर्मित ज्ञान कौन से लोग  हासिल करने के अधिकारी हैं . ज्ञान पर कब्जे के संघष का वैश्विक सन्दर्भ भी है और स्थानीय भी .अंग्रेजों के भारत आने से पहले यहाँ ज्ञान पर स्थानीय वर्चस्ववादियों का कब्ज़ा था लेकिन उनके भारत आने के बाद वर्चस्वा के स्वरुप और उसकी भौगोलिकता में बदलाव आगया . अब ब्रिटिश ज्ञान ने भारतीय ज्ञान की वैधता को ख़ारिज कर दिया और अपनी श्रेष्ठता साबित कर भारतीय ज्ञान तंत्र को अपने अधीन कर लिया या एक तरह से दोनों ही ज्ञानों के बिच संश्रय कायम हुआ जिसमे ब्रिटिश ज्ञान अग्रणी भूमिका में था . दोनों ही ज्ञानों की प्रकृति में इस बात में अंतर था कि जहाँ ब्रिटिश ज्ञान की सामाजिकता अपने राष्ट्र की सीमा पार कर अपने राष्ट्र के हित में दूसरे राष्ट्र और समुदाय का दमन करने की प्रवृत्ति रखती थी वहीँ भारतीय ज्ञान पद्धति और तंत्र स्थानीय दमन की प्रवृत्ति में निपुण था . दोनों की एक उभयनिष्ठ विशेषता सामाजिकता का नकार और सामूहिकता का दमन था . ज्ञान की इस प्रवृत्ति में कोई बदलाव दिखाई नहीं देता है वल्कि ज्ञान के असमाजीकरण की प्रवृत्ति और बढ़ी है . इस तरह शिक्षा के मूल्यगत और उद्देश्यगत स्वरूपों में  कोई खास बदलाव नहीं दिखता. सरकार  शिक्षा में व्यापक बदलाव के माध्यम से गरीब और वंचित तबकों को ज्ञान हासिल करने के अधिकार से रोक रही है .

 अध्यापक और शिक्षा ; सरकार की नीतियों ने अध्यापक जैसे पदों को ही नहीं वल्कि और भी दूसरे क्षेत्र के पदों के सम्मानजन स्तर को गिरा दिया है जिसके कारण अध्यापन सहित सारी नौकरियों  का स्तर प्रभावित हुआ है . नौकरियों के ठेकाकरण के कारण , उनमे स्थायित्व की भावना नहीं है जिसका परिणाम ज्ञान निर्माण की प्रकिया पर भी पड़ता है,काम की गुणवत्ता पर भी  . तो यही हो रहा है उच्च शिक्षा में भी . इस सब का शिकार समाज के सबसे गरीब और सामाजिक ,आर्थिक रूप से पिछड़े हुए दलित,,पिछड़े , अल्पसंख्यक पृष्ठभूमि के लोग हो रहे हैं . भारत में प्राथमिक शिक्षा का जो हाल है उसका शिकार कौन सबसे ज्यादा हुआ है ? नौकरियों में निजीकरण और अंग्रेजी के प्रभाव के कारण लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी निजी विद्यालयों में पढाना पसंद कर रहे है जहाँ बड़े पैमाने पर फ़ीस वसूली जाती है . जिसके पास पैसा है वो ही इनमे अपने बच्चों को पढ़ा सकता है .गरीबों दलितों आदिवासियों और अल्पसंख्यकों तथा महिलाओं के लिए फिर क्या बचता है. उनके लिए तो टूटी हुई इमारतों में उपेक्षित विद्यालय ही नसीब होगें . कुल मिलाकर वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में वंचितों के लिए जगह नहीं है . वे  हर संस्थान से खदेड़े जा रहे हैं .इतना ही नहीं वर्तमान शिक्षा किस तरह सामाजिक गैरबराबरी को बढ़ावा दे रही है इसका उदहारण कोठारी आयोग की रिपोर्ट में मौजूद है “यह शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि विभिन्न सामाजिक तबकों और समूहों को नजदीक लाये और इस प्रकार समता मूलक एवं एकजुट समाज के उभरने में मददगार हो . लेकिन वर्तमान में ऐसा करने के बजाय शिक्षा स्वयं ही सामाजिक भेदभाव और वर्गों के बीच फासले को बढा  रही है ... यह स्थिति गैर लोकतान्त्रिक है और समतामूलक समाज के आदर्श से मेल नहीं खाती है .यह केवल गरीब बच्चों के लिए ही नहीं वरन संपन्न व् सुविधाभोगी समूहों के बच्चों के लिए भी ख़राब है .”

  विश्वविद्यालय ऐसी जगहें हैं जहा सृजनात्मकता ,आलोचनात्मक विवेक अपनी उन्मुक्तता के साथ जीवन पाता है . वहाँ  ज्ञान का निर्बाध विस्तार होता है जहा ज्ञान की द्वंद्वात्मकता अपने चरम पर होती है ,जहा उपदेशात्मकता ,नैतिकता तर्क के आगे पानी भरते हैं और वैज्ञानिकता खुले आसमान के नीचे साँस लेती है लेकिन अफ़सोस की इन पर सत्ता के घने बादल घिर रहे हैं और ज्ञान की उर्वरता को नष्ट करने की तैयारी में हैं . आजकल दिल्ली विश्वविद्यालय के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है जो नई शिक्षा नीति की प्रयोग स्थली बन गया है. दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग पुरे देश से हर सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि के विद्यार्थी आते हैं; बिहार हो उत्तर प्रदेश हो या देश के सुदूर राज्य. यहाँ केवल उच्च आयवर्ग के ही विद्यार्थी नहीं आते हैं वल्कि गरीब और उपेक्षित सामाजिक आर्थिक समुदायों के विद्यार्थी भी आते हैं. बहुत सारे विद्यार्थी तो पार्ट टाइम नौकरी करते हुए पढने की लालसा के साथ आते हैं लेकिन इन सब के बीच विश्वविद्यालय ने चार वर्षीय पाठ्यक्रम लाकर जैसे छात्रों का भविष्य ही उनसे छीन लिया है .समस्या यह नहीं है की तीन साल के स्नातक पाठ्यक्रम की जगह चार साल का कर दिया गया . वल्कि चार साल के पाठ्यक्रम को जिस तरह से बनाया गया है उसकी वजह से शिक्षा की गुणात्मकता प्रभावित हो रही है . इसमें कई ऐसे प्रावधान हैं जिसका इस्तेमाल गरीब और वंचित तबकों और छात्राओं के साथ भेदभाव के लिए किया जा सकता  है .विश्वविद्यालय में भेदभाव के ढेरों उदहारण मिल जायेंगे . जिस संस्थान को वैज्ञानिक और जनपक्षधर माहौल तैयार करना चाहिए वह ब्राह्मणवाद की प्रयोग स्थली बना हुआ है और चार वर्षीय पाठ्यक्रम इसको मजबूत और संस्थागत कर देगा .नए पाठ्यक्रम के हिसाब से विद्यार्थी अब दो साल, तीन साल और चार साल के किसी भी पड़ाव पर शिक्षा बंद कर सकता है और प्रशासन के अनुसार उसको दो साल में छोड़ने पर डिप्लोमा ,तीन साल पर स्नातक और चार पर ऑनर्स की डिग्री मिलेगी जिससे बिच में ही पढाई छोड़ने पर उनको खाली हाथ नहीं लौटन पड़ेगा . विश्वविद्यालय के अनुसार वह यह सब छात्रों के हित में कर रहा है लेकिन सच्चाई इसके ठीक विपरीत है .सबसे पहले तो यह बदलाव राष्ट्रिय शिक्षा नीति के खिलाफ है . यह पैसे वाले लोगों के लिए एक तरह से शिक्षा को आरक्षित करना ही हुआ . यह सब लोकतंत्र के मूल्यों का गला घोटने की शर्त पर हो रहा है जिसमे सरकार, न्यायपालिका और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग सब शामिल हैं . जब सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की गई तब राज्य मंत्री शशि थरूर ने अध्यापकों और बुद्धिजीवियों तथा छात्रों को यह कहकर शर्मिंदा किया कि वे सरकार को विश्वविद्यालय की स्वायत्तता भंग करने का न्योता दे रहे हैं . ऊपर से देखने पर यह बहुत ही मामूली बात जैसी लग सकती है कि तीन साल से बढाकर चार साल ही तो कर दिया गया लेकिन यह जीतनी सरल है उतनी ही कठिन और जनविरोधी भी .आखिर इस पर इतना हो हल्ला क्यों? इससे कौन लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे ?जाहिर सी बात है दलितों ,महिलाओं ,पिछड़ों तथा आदिवासियों पर ही इसकी गाज गिरेगी. बीच में शिक्षा छोड़ने की दर इन्ही समुदायों से सबसे ज्यादा होती है सबसे ज्यादे डिप्लोमाधारी ये ही लोग होंगे .इसका अर्थ  यह हुआ कि दिल्ली विश्वविद्यालय अनुपयोगी डिप्लोमा धारियों का कारखाना बनने जा रह है. ऐसे में कौन उपयोगी डिप्लोमा की जगह अनुपयोगी डिप्लोमा लेना चाहेगा . भारतीय समाज अभी भी जिस तरह से पुरुषवादी आग्रहों से भरा पड़ा है ऐसे में छात्राओं के लिए चार साल तक स्नातक कौन करने देना चाहेगा ,जहाँ अधिकांश अभिभावकों को  जितनी जल्दी हो अपने सर का बोझ हल्का करना होता है . पुत्र मोह भी छात्राओं के इस चार साला डिग्री लेने में बाधा पैदा करेगा .

   पूरे देश में शिक्षा का स्तर बहुत गिर रहा है ऐसे में सरकार की जो शिक्षा नीति है वही इसके लिए जिम्मेदार है .वह शिक्षकों की नियमित भर्ती पर मौन साधे हुए है इस मसले पर उसको विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की याद नहीं आती है . दरसल यह प्रक्रिया शिक्षा को बेचने की तैयारी का हिस्सा है जिसमे शिक्षा तो बिकेगी लेकिन सरकार जो चाहेगी . अब मानविकी और आलोचनात्मक ज्ञान निर्माण वाले विषयों पर खतरा बढ़ रहा है . उनको विश्वविद्यालयों से खदेड़ने का अर्थ है प्रश्न करने वालों और उसकी संस्कृति को खदेड़ना . कठिनाई उनके लिए सबसे ज्यादा है जिस समुदाय की अभी पहली पीढ़ी के लोग ही प्रतीकात्मक प्रतिधित्व के रूप में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे .इन समुदायों के लिए अधिकतर तो मानविकी के विषय ही सर्वसुलभ और आवश्यक हैं . क्योंकि विज्ञानं ,वाणिज्य और बाजार के दूसरे विषय उनके लिए खरीद क्षमता में नहीं आता यदि आता भी है तो इस पृष्ठभूमि के खरीददारों का प्रतिशत बहुत कम है  . इस तरह भारतीय शिक्षा व्यवस्था एक बड़े सदमे से गुजर रही है. दिल्ली विश्वविद्यालय में जो हो रहा है उसकी खामियों की  आलोचना करने पर सरकार ने उसको हल करने के बजाय  उल्टा इसको देश के सारे ही विश्वविद्यालयों में लागू करने का माहौल बना रही है .जब सरकार या दूसरी कोई संस्था चार साल का पाठ्यक्रम अन्य विश्वविद्यालयों में लागू करने की सलाह देती है तब क्या वह एनी विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का दमन नहीं कर रही होती है? शिक्षा की सर्वसुलभता तो खतरे में है ही उसकी सामाजिक सरोकारों वाली अंतर्वस्तु सबसे ज्यादा खतरे में है .    

   दरसल सरकार अपने ही नागरिकों के खिलाफ साजिस रच रही है उनको वह बाजार के छेनी हथौड़ी से बाजार लायक खरीदार तराश रही है इसलिए वह उनको एटीएम चलाने लायक , नेट मार्केटिंग करने लायक बनाना चाहती है लोग हैं की बनने  को तैयार ही नहीं हैं. एक महोदय की माने तो देश के प्रशासक  लायक अब पाठ्यक्रम आया है मानो जो ५४ हजार जिन  छात्रों का दाखिला होने वाला है उनमे सारे के सारे  लोग आईएएस ही बनना चाहते हों और सरकार इनके लिए पद सृजित करके बैठी हुई हो .

     

   

2 टिप्‍पणियां:

  1. ज्ञान मुक्ति का साधन भी है और वर्चस्व का माध्यम भी.इसीलिए ज्ञान पर भी कब्जे की लड़ाई चलती रहती है और वर्चस्ववादी हमेशा अपने ज्ञान को श्रेष्ठ घोषित करता रहता है ताकि उसका प्रतिपक्षी उसके वर्चस्व को स्वीकार कर ले.
    यह बात तो आपने लाख पते की सही खी है भाई .......
    ब्लॉग के लिये बधाई हो बढिया लिख रहे हो...............

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