दुनिया के बादशाह की हकीकत उर्फ़ कोरोना काल में नस्लीय भेदभाव: द ब्लैक प्लेग
(किंगा यामहत्ता टायलर अमेरिकी विद्वान् लेखिका हैं. वह अमेरिका के प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में अफ्रीकन-अमेरिकन स्टडीज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. उन्होंने 'ब्लैक लाइव मास्टर टू ब्लैक लिबरेशन' शीर्षक से एक किताब भी लिखी है और इस किताब के लिए सन २०१६ में लंनन फाउंडेशन की ओर से 'कल्चरल फ्रीडम अवार्ड' भी दिया गया था. इनका ' द ब्लैक प्लेग' शीर्षक यह लेख 16 अप्रैल को न्यू यॉर्ककर में छपा था. इस लेख में अमेरिकी चिकित्सा प्रणाली और वहां के समाज में व्याप्त नस्लीय भेदभाव को चिन्हित किया गया है.)
यह लेख 'न्यू यॉर्ककर ' से साभार प्रकाशित किया जा रहा है.
किंगा यामहत्ता टायलर
(अनुवाद : राम नरेश राम)
पुरानी
अफ्रीकन-अमेरिकन कहावत है “ जब स्वेत अमेरका को ठण्ड लगती है तो अश्वेत
अमेरिका को न्यूमोनिया हो जाता है” अब यह कुछ इस तरह हो गयी है “ श्वेत अमेरिका को
जब नावेल कोरोना हो रहा है तो अश्वेत अमेरिका मर रहा है.”
कोरोना
वायरस से हजारों श्वेत अमेरिकी भी मर चुके हैं लेकिन जिस पैमाने पर
अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों की मौतें हो रही हैं उसने यहाँ की स्वास्थ्य व्यवस्था को
नस्लीय और वर्गीय गैरबराबरी के मामले में एक सबक की चीज बना दिया है. रायटर्स की
रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में किसी और समूह की तुलना में अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों
की मौतें ज्यादा हो रही हैं. यह कोरोना संकट की शुरूआती स्थिति है, इसलिए यह आंकड़ा
अभी अधूरा है लेकिन अमेरिका में नस्लीय भेदभाव की स्थिति को समझने के लिए यह
पर्याप्त है.
उत्तरपूर्व
और मध्यपश्चिम के बाहर लुसियाना में संक्रमितों की संख्या इक्कीस हजार से ज्यादा
बताई गयी है. जब राज्य के गवर्नर जॉन बेल एडवर्ड्स ने हाल ही में घोषणा किया कि वे
जिनकी मृत्यु हुई है उनसे जुड़े हुए नस्लीय और स्थानिक आंकड़े जल्द ही उपलब्द्ध
कराना शुरू करेंगे, उन्होंने अपनी घोषणा में दुखद जानकारी यह दिया कि लुसियाना की
कुल आबादी का ३३ प्रतिशत अफ्रीकन-अमेरिकन हैं जबकि यहाँ कोरोना से हुई कुल मौतों
का ७० प्रतिशत इन्हीं में से है.
जार्जिया का छोटा शहर अल्बनी जो साऊथ अटलांटा से
दो सौ मील दूर है, वह १९६० के दशक में शहर के अश्वेत निवासियों और श्वेत पुलिस
अधिकारियों के बीच नागरिक अधिकारों पर व्यापक संघर्ष का केंद्र बन गया था. आज 12 सौ से अधिक लोग इस क्षेत्र(काउंटी) में
कोरोना से संक्रमित पाए गए हैं और कम से कम ७८ लोगों की मौत हो गयी है. हाल ही में
जारी रिपोर्ट के अनुसार ८१ प्रतिशत मौतें अफ्रीकन-अमेरिकन की हुई हैं.
मिशिगन
में अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों की संख्या राज्य की कुल जनसँख्या का 14 प्रतिशत है इनमे
से 30 प्रतिशत लोग संक्रमित हो गए हैं, जबकि 40 प्रतिशत लोगों की मौत हो चुकी है.
राज्य में कुल संक्रमितों का 26 प्रतिशत और कुल मौत का २५ प्रतिशत डेट्रॉइट शहर
में है जहाँ ७९ प्रतिशत अफ्रीकन-अमेरिकन की संख्या है. इसके उपनगर में जहाँ अश्वेत
लोंगों की संख्या ज्यादा है वहां भी कोविड-१९ तबाही मचा रहा है.
वायरस
ने सिकागो में अफ्रीकन-अमेर्रिकन लोगों को हिला कर रख दिया है जहाँ के कुल
संक्रमित लोगों की संख्या का ५२ प्रतिशत ये ही लोग हैं और कुल मौत का ७२ प्रतिशत
भी इन्हीं लोगों का है. इस शहर में भी इनकी संख्या का अनुपात सबसे ज्यादा है.
जैसा की पहले से ही लोग जानते हैं कि अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों का
स्वास्थ्य की परिस्थितियां पहले से ही बहुत ख़राब हैं यही कारण है भयंकर बीमारी
उन्हीं के लिए ज्यादा खतरनाक साबित हो रही
है. यह बिलकुल सत्य है. सुगर, अस्थमा, ह्रदय रोग और मोटापा जैसी बीमारियों की
परिस्थियाँ ही इनके लिए खतरनाक कारण बन रही हैं. जैसा कि विद्वान् रूथी विल्सन
गिलमोर कई वर्षों से इस बात को कहती हैं कि अमेरिका में लम्बे समय से व्याप्त
नस्लीय भेदभाव ने उनके असमय मृत्यु दर को बढ़ा दिया है. अमेरिकन गुलामी के रूप में
नस्लीय भेदभाव ने लगभग सभी अफ्रीकन-अमेरिकन लोगों के जीवन की सभी संभावनाओं को कम
कर दिया है. काले लोग सबसे गरीब हैं और उनमें से बहुत सारे लोगों के पास कोई
रोजगार नहीं है, ख़राब घरों में रहने को मजबूर हैं और उनको उनकी नस्ल के कारण सबसे
ख़राब स्वास्थ्य सुविधाएँ मिल पाती हैं. इसी से पता चलता है कि स्वेत अमेरिकन की
तुलना में 60 प्रतिशत अफ्रीकन-अमेरिकन लोग सुगर के शिकार क्यों हैं और स्वेत
महिलाओं की तुलना में 60 प्रतिशत अश्वेत महिलाएँ उच्च रक्त चाप की बीमारी से
ग्रसित क्यों हैं. इस तरह की स्वास्थ्य विषमता, सामूहिक कैद जैसी जिंदगी या आवासीय
सुविधाओं में भेदभाव जैसी चीजें नस्लीय भेदभाव के सबसे बड़े सबूत हैं.
अफ्रीकन
अमेरिकन लोगों की इस असंतुलित स्वास्थ्य सुविधाओं की परिस्थियों के कारण यह समझना
आसान है कि आखिर अमेरिका में इनकी मृत्यु दर बढ़ने के कारण क्या हैं. लेकिन यह भी
जानना जरुरी है कि खासतौर पर अश्वेत लोगों की मौतें इसलिए ज्यादा हो रही हैं
क्योंकि कोरोना के मामले में संघीय सरकार का रवैया लगातार उपेक्षापूर्ण है. जितना
बड़ा नरसंहार ट्रम्प के अमेरिका में हो रहा है उतना कभी नहीं हुआ. कोविड-19 की जाँच
बेहद असंगत ढंग से हो रही है और अनुपलब्द्ध भी है इसीलिए इसका प्रभाव संभावित सीमा
रेखा को भी पार कर गया है. फिलाडेल्फिया में ड्रेक्सेल यूनिवर्सिटी के एक
वैज्ञानिक ने पाया कि ज़िप कोड्स में ‘कम अनुपात वाले अल्पसंख्यकों और ऊँची आया वाले
लोगों की’ सबसे ज्यादा संख्या में जाँच की गयी. जबकि ज़िप कोड्स में बेरोजगार और
बिना बिमा वाले निवासियों की संख्या सबसे ज्यादा है लेकिन उनका सबसे कम टेस्ट किया
गया. उच्च आय वाले पड़ोसियों की जाँच गरीबों की तुलना में छः गुना ज्यादा हुई है.
असंगत
ढंग से जाँच और इस वायरस के खतरे को वाइट हॉउस की तरफ से लगातार इंकार करने के
कारण इस तबाही से निपटने की तैयारी में कमी रह गयी. इस संकट से पूरी क्षमता के साथ
लड़ने के लिए शुरू में ही अस्पतालों में आवश्यक उपकरण और पर्याप्त संख्या में
कर्मचारियों की व्यवस्था होनी चाहिए थी. अब इसके परिणाम विनाशकारी हो गए हैं.
डेट्रॉइट क्षेत्र में जहाँ बीमारी बढ़ रही है, अस्पताल के 15 सौ कर्मचारी जिसमें
मिशीगन की सबसे बड़ी अस्पताल व्यवस्था बौमोंट हेल्थ की 5 सौ नर्स भी शामिल हैं,
कोरोना वायरस के लक्षणों के चलते नौकरी पर नहीं हैं. संकट के शुरुआत में न्यू
यॉर्क शहर के माउंट सिनाई हॉस्पिटल की नर्सें अपनी सुरक्षा के लिए कूड़ा फेंकने
वाली पोलीथिन पहनने के लिए मजबूर हुईं. पूरे देश में स्वास्थ्य कर्मचारियों को
अपना चेहरा और पूरे शरीर को ढंकने के लिए कहा जा रहा है इसी उपलब्द्ध विकल्प के
कारण इन कर्मचारियों के संक्रमण में आश्चर्यजनक रूप से इजाफ़ा हो रहा है और जिसके
चलते पहले से ही मरीजों से भरे हुए अस्पतालों पर दबाव बढ़ता जा रहा है.

दुर्लभ सामग्री उपलब्ध कराने हेतु शुक्रिया। अनुवाद भी सहज और पठनीय है। आभार ! नरेश सर।
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